aadhi aabadi

  • Feb 18 2020 4:17PM

जोहार परियोजना : अंडा उत्पादन से बदल रही महिलाओं की जिंदगी

जोहार परियोजना : अंडा उत्पादन से बदल रही महिलाओं की जिंदगी

पंचायतानामा टीम
जिला : गुमला

गुमला जिले का बसिया प्रखंड इन दिनों अंडा उत्पादन में अपनी अलग पहचान बना रहा है. प्रखंड की करीब तीन सौ महिलाएं इससे जुड़ी हैं. इससे महिलाओं को प्रतिमाह औसतन साढ़े चार हजार रुपये की आमदनी हो रही है. अंडा उत्पादन से जुड़ी सभी महिलाएं जेएसएलपीएस द्वारा संचालित महिला समूह की दीदियां हैं. पहले ये खेती-बारी से जुड़ी थीं, लेकिन जब से इन्हें पॉल्ट्री फॉर्म की जानकारी मिली, तब से इस काम से जुड़ गयी हैं. पहले इन दीदियों के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं था, लेकिन जोहार परियोजना ने इन दीदियों को मुर्गी पालन से जोड़ कर आत्मनिर्भर बनाने में मदद की. मुर्गियों को खरीदने के लिए इन्हें पैसे दिये. झारखंड महिला स्वावलंबी पॉल्ट्री सहकारी संघ लिमिटेड, रांची द्वारा तकनीकी सहयोग प्रदान किया गया. ग्रामीण अंडा उत्पादक स्वावलंबी सहकारी समिति, गुमला द्वारा अंडा बेचने की व्यवस्था की गयी. इस तरह से इन दीदियों के जीवन में बदलाव लाने की कोशिश की गयी. आज इसका असर साफ दिखने लगा है.

पांच करोड़ 91 लाख 60 हजार रुपये लाभुकों को मिले

अंडा उत्पादन के लिए मुर्गी पालन को लेकर सबसे पहले प्रखंड के उत्पादक समूह की महिलाओं को चुना गया. इसके लिए तीन सौ महिला लाभुकों का चयन किया गया. शेड बनाने के लिए लाभुक को एक लाख बीस हजार रुपये दिये गये. इसके अलावा मुर्गियां खरीदने, चारा खरीदने और अन्य खर्च के लिए 77 हजार 200 रुपये लाभुकों को दिये गये. कुल मिला कर 300 लाभुकों के बीच पांच करोड़ 91 लाख 60 हजार रुपये दिये गये. बसिया प्रखंड के 15 गांवों और दो टोलों के लाभुकों का चयन किया गया. लाभुक का चयन करने के लिए मानक तय किये गये थे, जिनके आधार पर उनका चयन हुआ. इन गांवों में कुल 15 उत्पादक समूह थे. इन गांवों में कुल सात कलस्टर हैं. कलस्टर में साप्ताहिक बैठक होती है. इस दौरान मुर्गी पालन में आ रही समस्याओं को लेकर चर्चा की जाती है. ग्रामीण अंडा उत्पादक स्वावलंबी सहकारी समिति के साथ सभी अंडा उत्पादक जुड़े हुए हैं. सहकारी समिति द्वारा महिलाओं को तकनीकी सहयोग और प्रशिक्षण दिया गया.

कैसे होता है काम

सहकारी समिति द्वारा सभी अंडा उत्पादक महिलाओं को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है. अंडा देने वाली मुर्गी और दवा भी समिति द्वारा ही दी जाती है. समय-समय पर मुर्गियों की जांच की जाती है. उन्हें दवाएं दी जाती हैं. समिति द्वारा मुर्गियों का चारा भी दिया जाता है. महिलाओं को चारा खिलाने के बारे में बताया जाता है. शेड की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा जाता है. शेड के अंदर पिंजरे में मुर्गियां रहती हैं. महिलाओं का काम सिर्फ अंडों को चुनना होता है. इसके साथ ही शेड की देख-रेख और सफाई करनी होती है. अंडा जमा करने के बाद महिलाएं उसे अपने गांव में बने गोदाम में जमा करती हैं, जहां अंडा गिन कर उन्हें एक पर्ची दी जाती है. इसके बाद उन अंडों को बसिया की सहकारी समिति अपने गोदाम में लाती है. फिर यहां से उसे बाहर के बाजारों में भेजा जाता है. फिलहाल उत्पादित अंडे बसिया, कामडारा, सिमडेगा, रांची और पालकोट के बाजारों में भेजे जाते हैं. इसके अलावा आंगनबाड़ी और स्कूलों में भी भेजा जाता है. महीने के अंत में कुल अंडे का दाम जोड़ कर महिलाओं के खाते में भेज दिया जाता है. महिलाओं को उत्पादन शुल्क काट कर अंडा का दाम दिया जाता है. एक अंडे में 30 से 45 पैसे तक की बचत होती है. अंडा का दाम राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति (एनइसीसी), रायपुर प्रक्षेत्र द्वारा निर्धारित दाम के आधार पर तय होता है, जो हर दिन तय किया जाता है.

बरती जाती है पारदर्शिता

सहकारी समिति के तहत बोर्ड का गठन किया गया है. प्रत्येक महीने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक होती है. एजीएम की बैठक में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का चयन किया जाता है. बोर्ड मेंबर्स के नीचे भी सदस्य होते हैं, जो उत्पादन का काम देखते हैं. यह सभी कार्य महिलाएं ही देखती हैं. इसकी निगरानी सहकारी समिति द्वारा की जाती है. इसके अलावा अंडा जमा करते समय एक रजिस्टर महिलाएं अपने साथ लेकर आती हैं, जिसमें अंडे की संख्या गिनकर लिखी जाती है. इसके साथ ही एक पर्ची गांव के गोदाम में रखी जाती है और एक पर्ची बसिया स्थित सहकारी समिति के ऑफिस में जमा की जाती है, ताकि किसी भी स्तर पर हिसाब-किताब में गड़बड़ी की आशंका नहीं रहे.

प्रतिदिन 60 हजार अंडे का उत्पादन

पहले फेज में प्रत्येक शेड के लिए महिलाओं को 400 मुर्गियां दी गयी थीं. इनमें से कुछ मुर्गियां मर गयीं. लेयर बर्ड फार्मिंग में बीभी 300 नस्ल की मुर्गी का इस्तेमाल होता है, जो 91 सप्ताह तक अंडे दे सकती है. फिलहाल सभी के शेड में 275 से 300 मुर्गियां होती हैं, जिससे औसतन हर रोज 240-250 अंडे होते हैं. अपने जीवन काल में एक मुर्गी 300 से 330 अंडे देती है. इसके बाद मुर्गी को स्थानीय बाजार में बेच दिया जाता है. इन अंडे को बसिया स्थित गोदाम में लाने के बाद उसकी ग्रेडिंग की जाती है. इसके बाद इन अंडों को ग्रामीण अंडा उत्पादक स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड, गुमला द्वारा बाजार में भेजा जाता है.

केस स्टडी-1

अंडा उत्पादन से हो रहा है फायदा : बुधमनिया उरांव

सोलंगबीरा बरटोली गांव की लेयर प्रोड्यूसर्स ग्रुप की सदस्य बुधमनिया उरांव गुलाब आजीविका सखी मंडल की सदस्य हैं. कहती हैं कि अंडा उत्पादन से जुड़ने के बाद काफी मुनाफा हुआ है. पैसों की भी बचत हो रही है. पहले खेती-बारी में पैसों की बचत नहीं हो पाती थी. अब बचत हो रही है. इससे बच्चे समेत परिवार की अच्छी तरह से देखभाल हो पा रही है.

केस स्टडी-2

एक साल में 40 हजार रुपये मिले : देवंती देवी

कमल आजीविका सखी मंडल की सदस्य देवंती देवी ने बताया कि एक साल में उन्हें 40 हजार रुपये की आमदनी हुई है. इस काम में सुबह-शाम मिला कर दो घंटे देने पड़ते हैं. इसके अलावा खेती-बारी के लिए भी समय निकाल लेती हैं. अच्छी आमदनी होने से बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पा रही हैं. पहले की तुलना में अब परिवार काफी खुश है.

केस स्टडी-3

कुपोषण से लड़ने में मिली मदद : सरिता उरांव

नेहरू आजीविका सखी मंडल की सदस्य सरिता उरांव कहती हैं कि घर में अंडा उत्पादन होने से कई लाभ मिल रहे हैं. अब वो हर रोज अपने बच्चों को अंडा खिला रही हैं. समिति की ओर से बच्चों को प्रतिदिन दो अंडे खिलाने की छूट है. इससे बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. एक साल में इससे उन्हें 41 हजार रुपये की आमदनी हुई है.

महिलाओं को बेहतर व्यवस्था दी जा रही है : अनिर्बन मुखर्जी

ग्रामीण अंडा उत्पादक स्वावलंबी सहकारी समिति में कार्य करने वाले अनिर्बन मुखर्जी बताते हैं कि सारा काम महिलाएं ही करती हैं. समिति द्वारा उनकी मदद की जाती है. बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाएं ही हैं. इससे ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि उन्हें आजीविका का साधन भी मिल रहा है. जोहार परियोजना के तहत जेएसएलपीएस के उत्पादक समूह को फंडिंग की गयी थी. सहकारी समिति इसकी निगरानी करती है. ग्रामीण महिलाओं को इसका लाभ मिल रहा है.