aadhi aabadi

  • Jan 27 2017 8:44AM

झारखंडी आहार, खाएं बार-बार, राष्ट्रीय खादी व सरस महोत्सव में आजीविका दीदी का कैफे

झारखंडी आहार, खाएं बार-बार, राष्ट्रीय खादी व सरस महोत्सव में आजीविका दीदी का कैफे
राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में राष्ट्रीय खादी एवं सरस महोत्सव चल रहा है. 17 दिसंबर 2016 से शुरू हुआ यह मेला आठ जनवरी 2017 तक चलेगा. इस मेले में देश के लगभग हर राज्यों की सहभागिता दिखी. मेले के शुरुआती दिनों में करीब पांच सौ स्टॉल थे, लेकिन बढ़ते-बढ़ते स्टॉलों की संख्या 650 तक जा पहुंची. इस मेले में खरीदारी से लेकर स्वादिष्ट व्यंजनों का लुफ्त उठा सकते हैं. आजीविका दीदी कैफे नाम से कुल नौ स्टॉल लगाये गये हैं. 
 
जिसे स्वयं सहायता समूह की महिलाएं चला रही हैं. इन स्टॉलों पर झारखंड के हर लजीज व्यंजन का स्वाद आपको मिल जायेगा. 10-20 रुपये का कूपन लेकर आइये और हर तरह के व्यंजन का लुफ्त उठाइये. इन स्टाॅलों में खास बात यह देखने को मिली िक इन स्टॉलों को वो ग्रामीण महिलाएं संचालित कर रही हैं, जो कभी आर्थिक रूप से कमजोर थीं. मजदूरी और हड़िया बेच कर अपना जीवनयापन कर रही थीं. अपने परंपरागत गुणों को एक नये आयाम देतीं इन महिलाओं के चेहरे की चमक सबकुछ बयां कर रही है. एसएचजी महिलाओं की आर्थिक स्थिति और उनके अनुभवों को आपके साथ साझा करता यह आलेख.
 
दिनेश कुमार
 
रा ष्ट्रीय खादी और सरस मेला में आजीविका समूह की महिलाओं ने नौ स्टॉल लगाये हैं. सभी स्टॉलों में खानपान का उत्तम व्यवस्था है और इस व्यवस्था का बीड़ा उठाया है ग्रामीण परिवेश में रहने वाली महिलाओं ने. इन महिलाओं का स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और एक नये आयाम गढ़ने में झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी का अहम योगदान रहा है. 
 
स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद बढ़ा हौसला : चंद्रवती
 
रांची जिला के बुंडु प्रखंड स्थित भोरगाडीह गांव निवासी चंद्रवती देवी सरस्वती जागृति महिला समूह की सदस्य है. वर्ष 2014 में समूह से जुड़ने के बाद सक्रिय महिला प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों के लिए चंद्रवती देवी खाना बनाती थी. इन कार्यक्रमों को जेएसएलपीएस के सहयोग से आयोजन हो रहा था. एक बार इन्होंने 50 लोगों के लिए खाना बनाया. इन्होंने बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाया. इसके बाद जब भी इस तरह के कार्यक्रम होते थे, चंद्रवती को खाना बनाने के लिए बुलाया जाने लगा. क्या इनके खाना बनाने की कला को आजीविका का माध्यम बनाया जा सकता है? इसी सोच के साथ चंद्रवती देवी को खाना बनाने का तीन दिनों का प्रशिक्षण दिया गया. प्रशिक्षण रांची में दिया गया. प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद चंद्रवती देवी के खाना बनाने की कला में और निखार आया. अब वह तरह-तरह के व्यजंन बना सकती है. 
 
रांची सरस मेला में अपने इसी गुण को चंद्रवती देवी अपने फूड स्टॉल के जरिये प्रदर्शित कर रही हैं. इनके साथ चार अन्य सदस्य स्टॉल पर काम करती है. स्टॉल से अच्छी आमदनी हो रही है. साथ ही सरस मेला में काम करके एक नया अनुभव प्राप्त कर रही है. चंद्रवती देवी कहती हैं कि इस मेले में स्टॉल चलाकर जो सिखने को मिला है, उसका उपयोग मैं तब करूंगी जब मैं खुद का खाने-पीने का दुकान खोलूंगी. सरस मेला में पहली बार शिरकत कर रही चंद्रवती देवी थोड़ा नर्वस भी है, लेकिन उम्मीद जता रही है कि जैसे- जैसे मेले में समय बीतेगा, उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी और स्टॉल को और अच्छे से चला पायेगी.
 
सरस मेले में स्टॉल चलाना गर्व की बात : पूनम देवी
 
पूनम देवी कुटे गांव (प्रखंड-नगड़ी, जिला- रांची) की रहने वाली है. रांची सरस मेला में आजीविका दीदी कैफे के जिस स्टॉल को पूनम देवी संचालित कर रही है उसका नाम है गणेश लक्ष्मी कैटरिंग ग्रुप. पूनम कहती हैं कि महिलाएं सबसे अधिक खर्च दो चीजों पर करती हैं. 
 
पहला श्रृंगार और दूसरा खाना पर. यह भी सही है कि महिलाएं अच्छा खाना बनाती है, जिस कारण मेले में आने वाले लोग हमारे स्टॉल पर अधिक आना पसंद करेंगे और करते भी हैं. यही वजह है कि आजीविका दीदी कैफे पर भीड़ हर दिन बढ़ती है. लघु उद्योग सलाहकार(एमइसी) के सुझाव के बाद वर्ष 2016 में पूनम देवी समूह से जुड़ी. हर सप्ताह 10 रुपये से बचत करना शुरू किया. समूह से जुड़कर अपने पैसों का उपयोग करना सीखी. समूह से ऋण लेकर अपना छोटा व्यवसाय शुरू किया. पूनम कहती हैं कि कुटे गांव में जेएसएलपीएस के सहयोग से समूह की महिलाओं को बुककीपिंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा था. तभी मुझे प्रशिक्षण में हिस्सा ले रहे सभी लोगों के लिए खाना बनाने का काम दिया गया. 
 
प्रशिक्षण दे रही मैडम ने मेरे खाने को पसंद किया. इससे मेरा साहस बढ़ा. मैं अपने खाना बनाने की कला को व्यवसायिक रूप देना चाहती थी. फलस्वरुप कुटे चौक (नगड़ी प्रखंड) पर 10 नवंबर 2016 को एक होटल खोले हैं. समूह की पांच महिलाएं होटल में काम करती है. 
 
साथ ही गणेश लक्ष्मी कैटरिंग ग्रुप के नाम से बैंक में खाता भी खोला गया है. होटल से होनेवाली आमदनी को बैंक में जमा करती है. सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक होटल खुला रहता है. प्रतिदिन आय बढ़ रही है. पूनम कहती हैं कि अब आर्थिक तौर पर मजबूत हो रहे हैं. पिछला अनुभव काम आ रहा है. गर्व महसूस होता है कि गांव में रहने वाली महिला आज इतने बड़े मेले में अपना हुनर दिखा रही है. 
 
सरस मेला में स्टॉल चलाना एक नया अनुभव है : प्रिया देवी
 
प्रिया देवी, कुटीआतु गांव (नामकुम प्रखंड, जिला-रांची) की रहने वाली है. प्रिया ममता कैटरिंग ग्रुप से जुड़ी है. इनके स्टॉल पर विभिन्न प्रकार का व्यंजन रखा है. बड़ी संख्या में लोग प्रिया देवी के स्टॉल पर रखे व्यंजनों का आन्नद उठा रहे थे. झारखंड के नये-पुराने सभी व्यंजनों का यहां लुफ्त उठाया जा सकता है. प्रिया देवी की इच्छा है कि उनके स्टॉल पर लोगों की संख्या सबसे अधिक हो. कहती हैं कि हमारे स्टॉल पर शत प्रतिशत शुद्ध सामान से बना व्यंजन है. शायद लोग महिलाओं पर आज भी अधिक विश्वास करते हैं इसीलिए लोग आजीविका दीदी कैफे के स्टॉलों पर आ रहे हैं. हमारी अच्छी आमदनी हो रही है. प्रिया कहती हैं कि यहां काम करने से पहले हम सभी को जेएसएलपीएस की ओर से तीन दिवसीय प्रशिक्षण मिला है. कहती हैं कि एसएचजी से जुड़कर पैसों का बचत और काम का महत्व समझ में आया. आज भी प्रिया कई कार्यालयों में खाना पहुंचाती है, जिससे उसकी अच्छी आमदनी भी हो जा रही है. 
 
आजीविका दीदी को शामला का सहयोग
 
सरस मेला के आजीविका कैफे पर काम करने वाली सभी ग्रामीण महिलाएं आज जो भी हैं, उसके पीछे शामला शुकुर की बहुत बड़ा योगदान है. शामला केरल की रहने वाली है और जेएसएलपीएस के लिए काम करती है. केरल की होते हुए भी हिंदी अच्छी बोलती है. कुछ महिलाए जब कोल्लम सरस मेला में स्टॉल लगायी थी तब भी उन्होंने इन महिलाओं को काफी मदद की थी.
 
भाषा से लेकर कैश संभालने तक में मदद करती थी. रांची सरस मेला में जब कोई ग्राहक कुछ नहीं समझ पाते या महिलाएं उन्हें नहीं समझा पाती, तो शामला ग्राहक को अच्छी तरह से समझाती है यानी आजीविका दीदी कैफे को संचालित करने वाली सभी सदस्यों के लिए मेंटर की भूमिका निभा रही है शामला शुकुर.
 
रांची जिला के सिल्ली प्रखंड निवासी शीला देवी लक्ष्मी महिला कैटरिंग ग्रुप, सिल्ली से जुड़ी है. अपने स्टॉल पर शीला व उसका समूह कई तरह का व्यंजन बनाती है. प्रमुख व्यंजनों में गुड़ पीठा, मूढ़ी लड्डू, नीमकी, दही बूंदिया, छेना जलेबी, चाय, लेमचा, पकौड़ी, ब्रेड चॉप, पापड़ चॉप शामिल है. मेले में आने वाले लोग बड़े चाव से इन व्यजंनों का लुफ्त उठाते हैं. इन व्यंजनों का कीमत भी 10-20 रुपये के बीच है. इनके स्टॉल पर मिलने वाले व्यंजनों का लुफ्त उठाने से पहले आपको रसीदनुमा टोकन लेना होगा. व्यंजन बनाने में इस्तेमाल होने वाले सभी रॉ मेटेरियल का इंतजाम शीला और उनके समूह की तीन अन्य सदस्य खुद करती है. एक दिन में अधिकतम करीब पांच हजार रुपये का व्यवसाय कर चुकी है. 
 
शीला आज अपने गांव सिल्ली से निकलकर एक नये जीवन का आंनद ले रही है, जहां वह अपने पाक कला को और निखार रही है. इनके जीवन का एक दूसरा पहलू भी है जो बीत चुका है. शीला के चार बच्चे हैं, जिनमें तीन बेटी और एक बेटा है. शीला देवी कहती हैं कि पहले बच्चों के लालन-पालन समेत अच्छी शिक्षा कैसे दें, इसकी चिंता सताते रहती थी. आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी. स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद जेएसएलपीएस के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में लोगों के लिए खाना बनाना शुरू किया. 
 
सबों को खाना बहुत पसंद आया. मुझे तीन दिनों का खाना बनाने का प्रशिक्षण दिया गया. तभी सितंबर 2016 में केरल के कोल्लम में आयोजित सरस मेले में कैटरिंग का स्टॉल लगाने का मौका मिला. कोल्लम में झारखंड स्टॉल का नाम निवाला फूड कोर्ट था. इस स्टॉल का प्रतिनिधित्व करती शीला के साथ कुल पांच महिलाएं थी. वहां की भाषा को समझने में जेएसएलपीएस की प्रतिनिधि शामला शुकुर ने मदद की. पहले दिन इनके स्टॉल का व्यवसाय अच्छा नहीं रहा, लेकिन दूसरे दिन शीला व उनके समूह ने सत्तू पराठा, मेथी पराठा आदि जैसे पकवान बनाये और अच्छा व्यवसाय किया. कोल्लम सरस मेले में कुल एक लाख 52 हजार का व्यवसाय किया तथा प्रत्येक सदस्य ने 18,444 रुपये का लाभ कमाकर लौटी. यहां से बदली शीला व अन्य सदस्यों की जिंदगी. कोल्लम सरस मेला में भाग लेने से इनका आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है. इसी का परिणाम है कि रांची सरस मेला में शीला देवी झारखंड के व्यंजनों को परोस कर अच्छी कमाई कर रही है. 
 
हड़िया बेचना बीते िदनों की बात, आजीविका दीदी कैफे से िमली नयी पहचान : संचरिया
 
कटुआतु गांव की है संचरिया देवी. 45 वर्ष की उम्र में सरस मेला में कैटरिंग स्टॉल चलाना एक नया अनुभव है. खाना बहुत ही स्वादिष्ट बनाती है. अभी तक तीन समूहों को खाना बनाने का प्रशिक्षण दे चुकी है. 
 
मेले में स्टॉल चलाकर आर्थिक रूप से मजबूत हुई है, लेकिन पहले संचरिया देवी अपने गांव में हड़िया बेचती थी. इनकी जिंदगी सड़क किनारे हड़िया बेचकर गुजरबसर कर रही थी. एक बार तो इन्होंने आत्महत्या करने तक की सोची, लेकिन आंध्र प्रदेश से आये प्रशिक्षकों के प्रोत्साहन से एसएचजी से जुड़ी. 20 रुपये सप्ताहिक जमा करके समूह में बचत करने लगी. अशिक्षित होने के कारण कई स्थानों पर खाना बनाने का काम करने लगी. अच्छा खाना बनाने के कारण ही सरस मेला में स्टॉल चलाने का मौका मिला. संचरिया देवी कहती हैं कि इतना बड़ा मेला मैंने कभी नहीं देखा, पहली बार देख रही हूं. मेरे लिए यह एक नयी दुनिया है. देखकर अच्छा लग रहा है. स्टॉल से प्रतिदिन तीन से चार हजार तक का सामान बेच रही है संचरिया देवी. 
 
तीन समूह मिलकर चलाती है रातु रोड में अपना होटल : बसंती तिर्की 
 
रांची जिला के नगड़ी प्रखंड स्थित मठटोली गांव निवासी बसंती तिर्की निवाला कैटरिंग ग्रुप, नगड़ी से जुड़ी है. इन्होंने अपने गांव में कई समूह बनाया है. तीन समूह मिलकर रातु रोड में कैटरिंग खोली है. झारखंड स्थापना दिवस के अवसर पर समारोह स्थल पर तीन दिन तक स्टॉल लगायी थी. उस समय भी उसकी अच्छी आमदनी हुई थी. बसंती कहती हैं कि सरस मेला में हिस्सा लेना इनके लिए एक नया अनुभव है और यह अनुभव उनके होटल संचालन में बहुत काम आयेगा.