aadhi aabadi

  • Feb 16 2017 9:39AM

ऐसे बना दी जाती हैं डायन, अशिक्षा व अंधविश्वास की बलि चढ़ती महिलाएं

ऐसे बना दी जाती हैं डायन, अशिक्षा व अंधविश्वास की बलि चढ़ती महिलाएं
विश्वास और मिथ्या पर आधारित डायन जैसी सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने के लिए जन-जागरण बहुत जरूरी है. जागरूकता के अभाव में विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को निशाना बनाया जाता है. 
 
डायन प्रथा निषेध अधिनियम, 2001 को राज्य में लागू किया गया. कानून बनने के बाद भी राज्य में डायन-बिसाही प्रथा के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने, गांव से निकालने और महिलाओं की हत्या करने जैसे घटनाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा है. खासतौर पर वैसी महिलाओं को ज्यादा निशाना बनाया जाता है, जो अशिक्षित हों, जिनकी संपत्ति अधिक हो, जो गांवों में अंधविश्वास को बढ़ावा देने का विरोध करती हो. इस अंक में कई पीड़ित महिलाओं को जिक्र कर रहे हैं, जो इस सामाजिक कुरीतियों को झेली है. कई महिला अपने परिवार सहित गांव छोड़ने को मजबूर हुई तो कइयों की जान तक चली गयी. कुछ ऐसी भी पीड़ित महिलाओं का चरचा कर रहे हैं, जो प्रताड़ित होकर भी सामाजिक संगठनों से जुड़ कर ग्रामीणों के बीच जागरूकता फैलाने का काम किया और इस काम में सामाजिक संस्था आशा यानी एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन एवरनेंस के सदस्यों ने भी अहम भूमिका निभायी. पीड़ितों की शिकायत पर गांव जाकर ग्रामीणों को समझाना, नुक्कड़ नाटक के माध्यम से जन-जागरण चला कर इस अंधविश्वास से सभी को दूर रखने में हरसंभव सहयोग किया. इसी का नतीजा है कि रांची जिले के नामकुम प्रखंड स्थित लालखटंगा पंचायत को डायन प्रथा से मुक्त पंचायत घोषित किया गया. 
 
अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देने पर सावित्री को मिली सजा
 
खूं टी जिले के राजा कुजला गांव निवासी सावित्री देवी को अंधविश्वास को बढ़ावा देने में साथ नहीं देने पर डायन करार देकर काफी प्रताड़ति किया गया. पति समेत अन्य लोगों की मौत का जिम्मेवार ठहराया गया. गांववालों ने सावित्री को गांव से बाहर निकालने को ठानी. ओझा-गुनी के बहकावे में आकर गांववालों ने सावित्री के साथ काफी बुरा बर्ताव किया. घटना का कारण सावित्री का स्वावलंबन होना और ग्रामीणों को ओझा-गुनी के चक्कर में नहीं पड़ने संबंधी बातें बताना माना जाता है. 
 
क्या था मामला 
 
सावित्री का गांव राजा कुजला में काफी जमीन है. इसका उपयोग खेती-बारी में होता है. खेती-बारी अच्छी होने से आमदनी भी अच्छी होती थी, जिससे सावित्री की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. यही बात गांव के कुछ लोगों को खटकता था. कुछ साल पहले सावित्री के पति की मौत बीमारी से हो गयी थी, लेकिन परिवार के ही कुछ लोग और ग्रामीण अपने पति पर ही डायन करने का गंभीर आरोप लगाना शुरू कर दिया. परिवार के कुछ लोगों का आरोप था कि अगर समय रहते सावित्री अपने पति को ओझा-गुनी को दिखाती तो शायद उसकी जान बच सकती थी, लेकिन सावित्री का साफ कहना था कि बीमारी का इलाज डॉक्टर ही कर सकते हैं कोई ओझा-गुनी नहीं. सावित्री की यही बात कुछ लोगों को रास नहीं आ रही थी. सावित्री के दो लड़कें हैं. पति की मौत के बाद सारी जिम्मेवारी सावित्री के कंघों पर आ गयी. सावित्री ने दोनों लड़कों को पढ़ाया और दोनों की शादी भी कर दी गयी. 
 
साल 2012 में सावित्री के भैसुर अचानक खेत में हल चलाते हुए ही बेहोश होकर गिर गये. आनन-फानन में घर लाकर लोग डॉक्टर की जगह ओझा को बुलाने चले गये, जबकि सावित्री ने डॉक्टर के पास ले जाने की रट लगाते रही, लेकिन किसी ने सावित्री की बात नहीं सुनी और ऐसी स्थिति में उसके भैसुर की मौत हो गयी. मौत होते ही घर में मातम छा गया. ओझा ने डायन के कारण मौत की बात कह कर आग में घी का काम कर दिया. इसके बाद तो सावित्री के सामने मानो आफत टूट पड़ी. जहां ग्रामीणों ने सावित्री को हर तरह से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया, वहीं गांव से बाहर निकालने की बातें भी होने लगी. बार-बार डायन का आरोप लगने से आहत सावित्री ने घर से बाहर निकलना ही छोड़ दिया. 
 
जलन की भावना से अपनों ने ही दिया डायन करार
 
रांची जिले के हटिया स्थित हरिजन बस्ती निवासी पाचो तिर्की अपने ही परिवार के लोगों के जलन का शिकार हो गयी. खुद की गोतनी ने ही पाचो को डायन करार देकर प्रताड़ित करना शुरू किया. अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देने के बात पर लोग पाचो से लड़ जाते थे. पाचो के मना करने के बावजूद लोग ओझा-गुनी की बातों को ही तवज्जो देते थे.
 
क्या था मामला
 
50 वर्षीय पाचो तिर्की अपने पति जलेश्वर तिर्की और दो बेटे व तीन बेटियों के साथ हरिजन बस्ती में रहती है. पति के नौकरी करने के कारण पाचो की आर्थिक स्थिति अच्छी है. पाचो अपने बच्चों के पढ़ाई-लिखाई के प्रति भी काफी गंभीर रहती है. उसके परिवार में दो गोतनी हैं, जो खुद सरकारी नौकरी करती है, लेकिन पाचो के घर की स्थिति देख उसकी गोतनी में जलन पहले से ही काफी थी. इधर के दिनों में यह जलन और बढ़ गयी. पाचो अपने भतीजे-भतीजियों को भी अपने बच्चों की ही तरह प्यार करती थी लेकिन उसकी गोतनी इसके ठीक उलट थी.
 
एक दिन पाचो का एक लड़का अपनी बड़ी चाची के पास जाकर कुछ खाने को मांगा, लेकिन उसकी बड़ी मां ने उसे डांटकर भगा दिया. बच्चा रोता-रोता अपनी मां के पास आया और पूरी कहानी बताया. पाचो ने अपनी बड़ी गोतनी से इसका कारण पूछा, तो वह भड़क उठी और अपशब्द कहने लगी. इसके बाद से तो पाचो की दोनों गोतनियां हर बात पर ताना देते हुए डायन तक करार दिया. इसके बाद कभी कोई बीमार होता, तो डाॅक्टर के पास नहीं ले जाकर ओझा-गुनी के पास ले जाते और जब ठीक नहीं होता, तो उसे डायन कर देने की बात पूरे इलाके में फैला दी गयी, जिसके कारण लोग भी इससे दूर रहने लगे. पाचो कहती है कि बेवजह लोगों का ताना सुन कर थक चुकी हूं. पाचो इसका मुख्य कारण लोगों में अंधविश्वास और जागरूकता में कमी हाेना बताती है. 
 
अंधविश्वास की जड़ में सामाजिक मान्यताएं
 
पूनम टोप्पो
सामाजिक कार्यकर्ता
आदिवासी समाज में कई धार्मिक धारणाएं हैं, जो डायन-बिसाही जैसे सामाजिक कुरीतियों को प्रभावित करता है. झारखंड में तकरीबन 80 फीसदी लोग गांवों में निवास करते हैं. लोगों को बचपन से ही कई आस्था व धारणाओं से जोड़ते हुए मन में डर उत्पन्न कराया जाता है, जैसे- पीपल का पेड़, मासना स्थल देवीमंडप, दराहापटरा (गर्भवती महिला की मृत्यु होने पर जहां उसे दफनाया जाता है) पर जाने से डर पैदा किया जाता है. इस तरह बच्चे समेत पूरा परिवार अंधविश्वास के साथ जीवन जीते हैं. कर्मकांड के सहारे अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है. प्रकृति पूजा पर आधारित बड़पहारी पूजा, जो खानदानी पूजा है, जो 12 साल में एक बार होता है. 12 साल बीतने के बाद ही लोग इस पूजा करते हैं. 
इस पूजा में जानवरों की बलि दी जाती है और पूरे गांव में प्रसाद बांटा जाता है. गांवों में अधिक-से-अधिक प्रसाद बांटने के पीछे धारणा है कि जितना अधिक प्रसाद का वितरण होगा, उससे खानदान के सभी लोग स्वस्थ्य रहेंगे. इस पूजा को नहीं करने या देर से करने के उपरांत लोगों के खानदान में अगर किसी की बीमारी के बावजूद मौत हो जाती है, तो लोग इसे बड़पहारी पूजा के नहीं करने का कोपभाजन मानते हैं. गांव में बीमारी के कारण अगर किसी की मौत हो जाये, तो भी लोग उस परिवार को कोसते हुए बड़पहारी पूजा करने के लिए विवश करते हैं. 
 
मृत्यु के बाद भी अंधविश्वास
 
जब किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो उसे मसान घाट ले जाने से पहले तीन बार घर के दरवाजे के ऊपरी भाग को छुआया जाता है और घर में राख छिंटा जाता है. घर से मसान घाट ले जाने के क्रम में धान, चावल और सिक्के फेंकने की परंपरा है. जहां फेंके गये धान व चावल को लांघना अशुभ माना जाता है, वहीं फेंके गये सिक्के को छोटे-छोटे बच्चों के कमर में बांधा जाता है. ऐसा करने से डायन-बिसाही की नजर नहीं लगने की बातें की जाती है. 
 
इतना ही नहीं मृत व्यक्ति को दफनाने के बाद छोटे-छोटे बच्चों को उस गड्ढे को लांधना पड़ता है. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि ऐसा करने से बच्चों को बुरे सपने नहीं आते हैं. वहीं मसान घाट से घर वापस आने पर सबसे पहले लोग अपने शरीर पर हल्दी पानी छिटकतें हैं. साथ ही घर में राख छिटा जाता है. अगर राख में किसी का पंजा या हाथ-पैर का निशान दिखायी देता है, तो उक्त व्यक्ति की मौत डायन-बिसाही के कारण होने की बात बताते हैं. इसके दो-तीन दिन बाद ओझा के पास जाने से पहले एक नये सूप में अरवा चावल डालकर घर के दरवाजे के ऊपर तीन बार छुआते हुए उस चावल को ओझा के पास ले जाया जाता है. उस चावल को देख ओझा उस व्यक्ति की मौत डायन-बिसाही के कारण होने की बात ग्रामीणों को कहते हैं. फिर क्या, गांव आने पर डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं और उसके परिजनों के साथ मारपीट तक की जाती है. गांव वाले पीड़ित महिला के पीछे तब तक पड़े रहते हैं, जब तक पीड़ित महिला की मौत ना हो जाये या फिर वह गांव छोड़ कर ना चली जाये. 
बहरहाल, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अंधविश्वास गहरी पैठ जमाये हुए है. लोगों के मन से अंधविश्वास को हटाना सबसे बड़ी चुनौती है. इस चुनौती को जड़ से खत्म करने के लिए लोगों को जागरूक करना बहुत जरूरी है. जन जागरण और जागरूकता के अभाव में इस तरह की सामाजिक कुरीतियां आज भी जारी है.
 
अपने पैरों पर खड़े होने की मिली सजा दबंगों ने किया दुष्कर्म, की अात्महत्या
 
बरटोली चौनपुर गांव की सुषमा टोपनो के माता-पिता की मृत्यु के बाद सारी जिम्मेवारी उस पर आ गयी. भाई-बहनों को शिक्षित करने के साथ-साथ अपने पैरों पर खड़े होने को ठानी. काफी मेहनत कर अपने खेतों में फसल उगाती, जिससे आमदनी भी अच्छी होती थी. सुषमा की आर्थिक स्थिति को देख गांववालों में जलन होने लगी. इसी बीच गांव में एक महिला की मौत की जिम्मेदारी उस पर लगायी गयी. गांववालों ने जबरन डायन कबूलने का प्रयास किया. कबूल नहीं करने पर चार-पांच लोगों ने उसके साथ दुष्कर्म किया. इससे आहत होकर सुषमा ने आत्महत्या कर ली. 
 
क्या था मामला
 
बरटोली चौनपुर की सुषमा टोपनो जब 23 साल की थी, तभी उसके माता-पिता का देहांत हो गया था. माता-पिता के देहांत के बाद सुषमा पर अपने दोनों भाई-बहन की देखरेख की जिम्मेवारी आ गयी. 
 
सुषमा ने दोनों भाई-बहनों को अच्छी शिक्षा देने को ठानी. सुषमा अपने खेतों पर काफी मेहनत किया करती थी, जिससे फसल भी अच्छी होती थी और अपने फसलों को अच्छे दामों पर भी बेचती थी. आमदनी अच्छी होने से आर्थिक स्थिति भी अच्छी होने लगी. सुषमा ने अपनी कमायी से एक ट्रैक्टर खरीदी और इसका उपयोग अपने खेतों में करती थी. सुषमा के लगातार बढ़ते देख गांव के कुछ लोगों को जलन होने लगी. इनलोगों ने गांवों में यह प्रचार करना शुरू किया कि सुषमा के शरीर में उसकी मां का वास है, इस कारण वह इतना काम करती है. इसी बीच जनवरी 2015 में गांव की एक महिला की मौत हो गयी. गांव के कुछ लोगों ने उस महिला की मौत का आरोप सुषमा पर लगा दिया. 
 
आनन-फानन में गांव में बैठक बुलाकर सुषमा को जबरन डायन होने की बात कबूलने को कहा, लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसके इनकार करने से नाराज कुछ लोगों ने उसी रात उसके घर में घुसकर जबरन उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया. इस घटना के बाद सुषमा हर जगह न्याय की गुहार लगायी, लेकिन उसे कहीं से न्याय नहीं मिला, इससे क्षुब्ध होकर सुषमा ने आत्महत्या कर लिया.
 
अपने ही सगे-संबंधियों ने बनाया निशाना
 
चलागी गांव निवासी मरियम बोदरा के पति अभिराम पूर्ति बीमारी के कारण अक्सर बीमार रहते थे. बीमारी के कारण ही उसकी मौत हो गयी. मरियम के बड़े बेटे की मौत हो गयी थी. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहने और घर में दो-दो लोगों की मौत की जिम्मेवारी गांववालों ने मरियम पर डाला. इसके बाद से तो मरियम को प्रताड़ित करने का सिलसिला ही चल पड़ा. किसी तरह मरियम आशा संस्था आयी और पूरी आपबीती बतायी. आशा संस्था के सदस्यों ने चलागी गांव जाकर लोगों को कई स्तर से समझाया.
 
क्या था मामला
 
चलागी गांव में मरियम बोदरा अपने पति अभिराम पूर्ति और तीन बच्चों के साथ रहती थी. बीमारी के कारण पति हमेशा बीमार रहता था, वहीं बड़े लड़के की मौत हो गयी थी. पिता की बीमारी के कारण घर की पूरी जिम्मेवारी दूसरे लड़के पर थी, जबकि अार्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहने के कारण बेटी ने भी पढ़ाई छोड़ दी. इसी बीच मरियम के पति की मौत हो गयी. पति की मौत के बाद उसके सगे-संबंधियों ने ही उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. 
 
मरियम को डायन कह कर प्रताड़ित किया जाता, तो उसके बेटा-बेटी के साथ मारपीट की जाती. मरियम गांववालों को लाख समझाती, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था. गांववालों ने बैठक की, मंदिर में ले जाकर कसम दिलवायी, लेकिन किसी भी स्थिति में पुलिस के पास नहीं जाने की सख्त हिदायत दी गयी. हर दिन प्रताड़ित होने से परेशान मरियम अपने बच्चों के साथ किसी तरह आशा संस्था आयी. यहां आकर पूरी घटनाक्रम बतायी. आशा के सदस्यों द्वारा गांववालों को समझाया गया, तब जाकर मामला कुछ हद तक शांत हुआ है. हालांकि मरियम अभी भी किसी अनहोनी को लेकर डरी-सहमी रहती है.
 
ओझा-गुनी का विरोध करना पड़ा महंगा गांव छोड़ने को हुई मजबूर
 
पाटेद गांव की सलगी मुंडाइन अपने ससुराल में ही काफी प्रताड़ित हुई. प्रताड़ित करने में जहां ससुराल वालों की अहम भूमिका रही, वहीं ओझा-गुनी का विरोध करने पर गांववालों का कोपभाजन बनना पड़ा. गांव में किसी की मौत हो या किसी की शादी टूट जाए, सभी स्थिति में जिम्मेदारी सलगी को ही ठहराया जाता. सलगी समेत उसके परिजनों के साथ हमेशा मारपीट करना गांव के कुछ लोगों की नियति बन गयी थी. 
थक-हार कर सलगी के पति बिरसा मुंडा ने गांव छोड़ना ही मुनासिब समझा, तब जाकर सलगी की जान बची. अब सलगी दूसरे गांव में अपने परिवार के साथ जीवन बसर कर रही है. 
 
क्या था मामला
 
सलगी मुंडाइन अपने पति बिरसा मुंडा और चार बच्चों के साथ पाटेद गांव में रहती थी. शादी के कुछ समय बाद सलगी की गोतनी को बच्चा होना था. बच्चा होने पर दाई ने उस बच्चे को सलगी के गोद में दिया था, लेकिन कुछ समय बाद उस बच्चे की मौत हो गयी. 
 
इससे आहत उसके सास-ससुर कुछ दिन बाद ओझा के पास गये, तो ओझा ने घर में डायन रहने की बात बतायी. घर आते ही सास सलगी पर टूट पड़ी और काफी प्रताड़ित करने लगी. सलगी को अपने परिजनों को ससुराल बुलाने को बाध्य किया और ससुराल से ले जाने की बात कही, लेकिन पति का साथ मिलने के कारण सलगी ससुराल में ही रहने लगी. इस दौरान पति को छोड़ हर कोई सलगी से बात करना छोड़ दिया. एक दिन अचानक पड़ोस में एक व्यक्ति की मौत हो गयी. पड़ोसी ओझा के पास गये तो ओझा ने गांव में ही डायन रहने की बात कही. गुस्साये पड़ोसी ने जहां पहले सलगी के जानवरों को मार दिया, वहीं मायके से ससुराल वापस आने पर उसे काफी प्रताड़ित किया. इस घटना के कुछ साल बाद पड़ोस में एक लड़की की शादी ठीक हुई, लेकिन शादी के दिन दुल्हे की मौत हो गयी.
 
मौत की खबर मिलते ही खुशियां मातम में बदल गयी और लड़की की मानसिक स्थिति भी खराब हो गयी थी. पड़ोसी ने अपनी बेटी को एक ओझा के पास ले गये, जहां ओझा ने गांव में डायन होने की बात कही. पड़ोसी ने सलगी के साथ काफी बुरा बर्ताव किया और उसके साथ मारपीट की गयी. इस दौरान उसके पति को भी मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया. अब तो गांववाले इसका जोरदार विरोध करने लगे. गांव में बैठक कर पीड़िता को काफी लज्जित किया. पीड़िता हर आरोपों से इनकार कर रही थी, लेकिन उसकी बात को कोई सुनने को तैयार नहीं था. इस प्रताड़ना से तंग आकर सलगी के पति बिरसा मुंडा अपने परिवार के साथ इस गांव को छोड़ कर दूसरे गांव में बस गये.
 
अंधविश्वास से ही पनपती हैं सामाजिक कुरीतियां
 
अजय जायसवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
 
झारखंड में डायन-बिसाही प्रथा एक सामाजिक अभिशाप बना है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हावी है, जहां अशिक्षा और अज्ञानता का अंधकार छाया है. डायन-बिसाही का सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज में देखा जाता है, जहां लोग किसी के बीमार होने पर उसे डॉक्टर के पास ले जाने के बजाए किसी ओझा-गुनी के पास ले जाना आवश्यक समझते हैं. 
 
उन्हें इस बात का भ्रम होता है कि जब तक बीमार व्यक्ति पर प्रेत की छाया रहेगी, तब तक उस पर किसी दवा का कोई असर नहीं होगा. राज्य की आबादी का लगभग 28 फीसदी हिस्सा गरीब और शोषित जनजातियों तथा 12 फीसदी अनुसूचित जातियों का है. इस प्रदेश में कुल साक्षरता दर 1951 में 13 फीसदी था, तो साल 2001 में 54 फीसदी तक जा पहुंची. इनमें दो-तिहाई पुरुषों की तुलना में केवल 40 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं. इसी अशिक्षा और अज्ञानता के माहौल में डायन-बिसाही की प्रथा जड़ जमा चुकी है.
 
एक रिर्पोट के अनुसार, पिछले पांच सालों में मात्र संताल परगना में ही डायन के नाम पर 600 से अधिक लोगों की बली चढ़ायी जा चुकी है. दूसरे जिलों में भी औसतन यही स्थिति है. सरकारी आंकड़ों में मात्र 560 मामलों की ही सूचना मिलती है. एक ओर हम देश और प्रदेश के उत्तरोतर विकास की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर यहां के गांवों में डायन, भूत-प्रेत, ओझा-गुनी और शाखा आदि के प्रति कभी खत्म ना होने वाला अंधविश्वास कायम है. यह अंधविश्वास उनकी मानसिकता पर इस कदर हावी है कि वो इसके आगे कुछ और सोच नहीं सकते. डायन के नाम पर महिलाओं पर जानलेवा हमला करना और अन्य अमानवीय यातनाएं दी जाती हैंै.
 
डायन कौन? : लोगों में व्याप्त अंधविश्वास के अनुसार, डायन एक ऐसी महिला होती है, जो भिन्न-भिन्न तरीकों से लोगों को मार डालती है या मानो उन्हें खा जाती है. ऐसा समझा जाता है कि डायन कही जाने वाली महिला के पास अलौकिक शक्ति होती है, जो उसे प्रेत साधना से प्राप्त होती है.
 
डायन की पहचान : आमतौर पर किसी महिला को वैमनस्य या संपत्ति हड़पने के विचार से भी डायन कहा जाने लगता है, जिसकी पुष्टि ओझा कहे जाने वाले पुरुष या गुनिया कही जाने वाली महिलाएं द्वारा ही कराया जाता है. इसके बाद शुरू होता है अत्याचार का सिलसिला. किसी महिला को डायन बताने के पीछे जो कारण है, वो है- भूमि और संपत्ति विवाद, अंधविश्वास, अशिक्षा, जागरूकता एवं जानकारी का अभाव, यौन शोषण, भूत-प्रेत, ओझा-गुनी पर विश्वास, आर्थिक स्थिति का ठीक ना होना, व्यक्तिगत दुश्मनी, स्वास्थ्य सेवा का अभाव, जमीन में बेटी और पत्नी का हिस्सा ना होना तथा आदिवासी महिलाओं का जमीन पर अधिकार ना होना मुख्य माना गया है. 
 
आखिर क्या है उपाय : डायन-बिसाही की समस्या को दूर करने के लिए आखिर क्या उपाय किया जा सकता है? इसका एक ही समाधान है लोगों के बीच जागरूकता फैलाना. समाज में गहरे जड़ जमा चुके इस अंधविश्वास एवं डायन हत्या के नाम पर महिलाओं पर किये जाने वाले प्रताड़ना को समाज से दूर करने के लिए सामाजिक कार्यक्रताओं व समूहों को आगे आना होगा. 
 
डायन हत्या जैसी गंभीर समस्या एवं अंधविश्वास पर आधरित प्रश्न उठाने होंगे. यह अंधविश्वास, जो आदिवासी समाज में बचपन से घर कर जाता है, वह उनके विकास में सबसे बड़ा बाधक है. साथ ही संघर्ष करने की शक्ति क्षीण हो जाती है. हमारा मानना है कि व्यापक अभियान द्वारा आदिवासी समाज में व्याप्त अंधविश्वास के कारण डायन हत्या को रोका जा सके. डायन की आड़ में किसी निर्दोष, बेसहारा, विधवा और कमजोर महिला की हत्या ना हो, तभी हम मानवीय समाज की कल्पना कर सकते हैं.
 
डायन बता कर बेटियों के साथ किया दुष्कर्म
गांव : राजा कुजला
पंचायत : राजा कुजला
प्रखंड : मुरहू 
जिला : खूंटी
 
खूंटी जिले के राजा कुजला गांव की बुधनी तांती की कहानी भी काफी कष्टदायक है. गांव के कुछ दबंग किस्म के लोगों ने पहले हमदर्दी दिखायी और फिर पति की मौत के बाद विधवा बुधनी तांती पर जुल्म ढाहना शुरू किया. जमीन नहीं मिलने से नाराज दबंगों ने बुधनी तांती को डायन करार देकर प्रताड़ित ही नहीं किया बल्कि उसकी बेटियों के साथ दुष्कर्म भी किया और जान से मारने की धमकी भी दी. 
 
क्या था मामला : अशिक्षित बुधनी तांती के राजा कुजला गांव में काफी जमीन है. साल 2013 में पति फिरन तांती की मौत हो गयी थी. कुछ समय तक ग्रामीणों का साथ मिला, लेकिन कुछ दबंग किस्म के लोगों की नजर उसकी जमीन पर लगी रही. अनपढ़ होने के कारण बुधनी अपनी जमीन पर कुछ खेती नहीं करती थी और ना ही किसी को खेती करने के लिए देती थी क्योंकि जमीन हड़पने का डर उसे हमेशा बना रहता था. 
 
कुछ लोगों के लाख प्रयास के बाद भी जब बुधनी की जमीन को हासिल नहीं कर पाया तो उसे डायन कहना शुरू कर दिया क्योंकि बुधनी साफ-सुथरा भी नहीं रहती थी. इसी बीच साल 2014 में गांव की एक महिला फुलो देवी के हाथ में बहुत दिनों से दर्द होने लगा. फुलो डॉक्टर के पास इलाज नहीं कराकर झाड़-फूंक में ज्यादा विश्वास रखती थी, लेकिन हाथ का दर्द खत्म नहीं होता था. एक दिन किसी ओझा के पास गयी तो ओझा ने ही गांव के किसी महिला द्वारा डायन करने की बात कही. फिर क्या था फुलो ने यह बात पूरे गांव में फैला दी और जमीन की आस लगाये बैठे दबंग किस्म के लोगों को यह अच्छा मौका हाथ लग गया. बुधनी को तरह-तरह से परेशान करना शुरू कर दिया, वहीं दबंगों ने उनकी बेटियों के साथ दुष्कर्म भी किया और जान से मारने की धमकी भी दी गयी. अब तो स्थिति ऐसी आ गयी कि बुधनी की बेटी को भी लोग डायन कह कर प्रताड़ित करने लगे हैं. 
 
डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 2001
 
डायन हत्या एक संज्ञेय अपराध है. राज्य में तीन जुलाई 2001 को डायन प्रथा निषेध अधिनियम 1999 को स्वीकृत किया गया. इसके तहत जुर्माना व सजा का प्रावधान है. 
 
किस धारा में कौन-सा जुर्माना व सजा है 
धारा- तीन
 
किसी को डायन कहने पर तीन महीने का कारावास या 1000 रुपये का जुर्माना अथवा दोनों है. 
धारा- चार
 
किसी को डायन कहकर प्रताड़ित करने पर छह माह तक की सजा या 2000 रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जायेगा. 
धारा-पांच
 
कोई भी व्यक्ति, जो किसी महिला को डायन के रूप में पहचान करने के लिए लोगों को उकसाने,षड़यंत्र रचने और उसमें सहायता देता हो, जिससे उस महिला को हानि पहुंचे, तो एेसी स्थिति में उस व्यक्ति को तीन महीने तक का कारावास अथवा 1000 रूपये के जुर्माने अथवा दोनों सजा से दंडित किया जायेगा 
 
धारा-छह
 
किसी महिला को शारीरिक या मानसिक हानि या यातना पहुंचाकर या प्रताड़ित कर झाड़-फूंक या टोटका से उपचार करता हो, तो उसे एक साल की सजा या 2000 रुपये तक जुर्माने अथवा दोनों सजा से दंडित किया जायेगा.
 
अंधविश्वास पर हो जोरदार प्रहार
 
मनोज कु यादव
 
सामाजिक कार्यकर्ता
 
डायन शब्द की चर्चा होते ही मन में तरह-तरह की भ्रांतियां उत्पन्न होती है.  डायन-बिसाही होता कोई नहीं है लेकिन हमारे समाज में, खासकर ग्रामीण  क्षेत्रों में अंधविश्वास इस तरह घर कर गयी है कि डायन-बिसाही की घटना में  लगातार इजाफा हो रहा है. इसकी रोकथाम के लिए झारखंड में भी कानून बना है,  लेकिन इस मामले में घटनाएं कम नहीं हुई है और इसका मुख्य कारण है ग्रामीण  परिवेश में जन जागरण का अभाव. जागरूकता के अभाव में डायन-बिसाही जैसे  सामाजिक कुरीतियों में जकड़ कर ग्रामीण इस घटना को अंजाम देते हैं. 
 
खासकर महिलाएं इस मामले में काफी प्रताड़ित होती है. इस गंभीर मामले की रोकथाम के  लिए सरकार समेत गैर सरकारी संगठन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. डायन-बिसाही जैसे सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने के लिए स्कूली बच्चे भी अब आगे आने लगे हैं. राज्य के 1600 स्कूल, जो भारत स्काउट एंड गाइड से पंजीकृत हैं, उन स्कलों के बच्चे गांवों में जन जागरण और जागरूकता अभियान चलायेंगे. ये बच्चे गांवों में लोगों को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि डायन-बिसाही कुछ नहीं है, बल्कि कुछ लोग अपने फायदे के लिए ओझा-गुनी को आगे कर महिलाओं को प्रताड़ित करते हुए अपना निशाना साधते हैं.  वर्तमान स्थिति को देख काफी दु:ख होता है. सिर्फ कानून बना देने मात्र से इस सामाजिक कुरीतियों को रोका नहीं जा सकता है. 
 
डायन-बिसाही का मुख्य कारक अंधविश्वास पर आधारित है. ऐसे में जब तक लोगों के मन से अंधविश्वास को खत्म नहीं किया जा सकता, तब तक इसकी पूर्णरूपेण रोकथाम पर सवाल ही उठते रहेंगे. अगर सरकार तीन कारकों पर विशेष ध्यान दे, तो इस समस्या का समाधान निकल सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लचर चिकित्सा व्यवस्था एक मुख्य कारक है. आज भी कई गांवों में चिकित्सा व्यवस्था का अभाव देखा जाता है. जिन गांवों में चिकित्सा व्यवस्था है, वहां चिकित्सक ही नदारद रहते हैं. ऐसे हालत में अगर गांव में कोई बीमार पड़ जाये, तो चिकित्सा व्यवस्था के अभाव में वो ग्रामीण ओझा-गुनी के चक्कर में पड़ ही जाते हैं. दूसरी कारक है शिक्षा. अभी भी दूर-दराज के गांवों में शिक्षा व्यवस्था सही नहीं है और तीसरे कारक के हैं ग्रामीण रोजगार. 
 
विशेषकर महिलाओं के लिए तो रोजगार के साधन नहीं के बराबर हैं. भले ही केंद्र व राज्य सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ढेरों योजनाएं चलायी जाती है, लेकिन वो योजनाएं धरातल पर उतर नहीं पाती है. महिला सशक्तिकरण की बात होती है लेकिन डायन-बिसाही के नाम पर महिलाएं ही अधिक प्रताड़ित होती है. अंधविश्वास और मिथ्था आधारित इस अवधारणा को खत्म करने के लिए जन जागरण और जागरूकता अभियान को तेज करना होगा. 
 
इसी के तहत अब राज्य के 1600 स्कूलों के बच्चों को इस अभियान से जोड़ा जा रहा है. इससे दो लाभ होंगे. पहला, गांवों में फैले अंधविश्वास के प्रति स्कूली बच्चों को सही जानकारी मिलेगी. दूसरा स्कूली बच्चे द्वारा अपने घर व क्षेत्र में अंधविश्वास की रोकथाम की जानकारी लोगों को सरलता से दे सकेंगे. कहते हैं, इसे एक अभियान नहीं बल्कि मिशन के तौर पर लेना होगा, तभी इस सामाजिक कुरीति को जड़ से खत्म किया जा सकता है. 
 
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ 
भारत स्काउट एंड गाइड के झारखंड राज्य कमिश्नर हैं)
दबंगों ने गांव छोड़ने को किया मजबूर
 
रांची जिले के लालखटंगा गांव में बतिया देवी अपने पति बउला मुंडा और चार बच्चों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही थी. दो बेटे और एक बेटी की शादी हो गयी थी, जबकि एक बेटी दिल्ली चली गयी थी. बतिया के पति की खेती-बारी अच्छी थी, जिससे आमदनी भी अच्छी होती थी और बतिया के परिवार वालों को रहन-सहन भी अच्छा था. इसी बीच उसके पति की मौत हो गयी. पति के मौत के बाद तो बतिया की जिंदगी ही मानो बदल गयी. गांव के कुछ लोगों की नजर उसकी जमीन पर पहले से ही थी और पति के मौत के बाद कुछ मौका हाथ लगा लेकिन बच्चों के होने के कारण उनलोगों की एक नहीं चल रही थी. इसी बीच साल 2004 में उसके दोनों बेटे और दोनों बहुओं की भी मौत किसी बीमारी से हो गयी. पति के बाद अपने बच्चों की मौत ने बतिया को पूरी तरह से तोड़ दिया. 
 
इसी मौका का लाभ उठाकर दबंग किस्म के कुछ लोगों ने बतिया को डायन करार दिया और ओझा के पास ले गयी. हालांकि बतिया ओझा के पास जाने का विरोध करती थी, लेकिन गांववाले उसकी एक नहीं सुनते थे. ओझा द्वारा डायन करार देने के बाद तो बतिया पर कुछ लोगों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया. सजा के तौर पर बतिया को पूरे गांव के लोगों को खाना खिलाने को मजबूर किया. बतिया किसी तरह अपने एक एकड़ जमीन और जानवरों को बेच कर गांववालों को खाना खिलायी. साल 2006 में बतिया के देवर सोमरा मुंडा की भी मौत हो गयी. इसकी जिम्मेवारी भी बतिया पर डाल कर उसके साथ काफी मारपीट की गयी. गांववालों से तंग आकर बतिया को गांव छोड़ने को बाध्य होना पड़ा था.
 
डायन मुक्ति के लिए चाहिए पुरुषों का योगदान
 
ऋिषकांत
 
सामाजिक कार्यकर्ता
 
डायन-बिसाही समाज के लिए गंभीर मसला है. जमीन-जायदाद, जलन की भावना और दूसरे की तरक्की को स्वीकार नहीं करना मुख्य कारण माना जाता है. इसके अलावा विधवाओं पर भी विशेष निशाना बनाया जाता है. डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं की हत्याओं की संख्या में सबसे अधिक संख्या उन महिलाओं की थी, जो विधवा थी या जिसके पास जमीन-जायदाद अधिक थे या जिस महिला को पति ने छोड़ दिया था. यह दर्शाता है कि जिन महिलाओं के साथ पुरुष खड़े नहीं हैं, उनके साथ समाज अधिक अत्याचार करता है. ऐसे में अगर समाज से डायन प्रथा को खत्म करना है, तो पुरुषों को सबसे अधिक योगदान देना होगा. आमतौर पर देखा गया है कि गांवों में अधिक जमीन-जायदाद की मालकिन होती है विधवा महिलाएं या जिसे पति ने छोड़ दिया हो या पति से अलग रहती हो. किसी को डायन कहना या डायन समझना, यह आपके अंधविश्वास का कारण है. डायन प्रथा उन्हीं जगहों पर है, जहां बहुत अधिक अशिक्षा है. झारखंड के आदिवासी इलाके में आज भी डायन प्रथा फलफूल रहा है. परिणामस्वरूप महिलाएं डायन के नाम पर मार दी जा रही है. 
 
झारखंड से डायन प्रथा को खत्म करना है, तो इसे एक मिशन के तौर पर लेना होगा. सरकार, गैर सरकारी संगठन, बुद्धिजीवि वर्ग और खासतौर पर पंचायत को बड़ी भूमिका निभाना होगा. एक सबसे बड़ी बात महिलाओं को खुद भी किसी तरह के अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करनी पड़ेगी. शिक्षा को आदिवासी बहुल इलाके तक पहुंचानी होगी. महिला सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं का लाभ महिलाओं को देना होगा ताकि महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो. महिलाओं को शिक्षित करें, जिससे समाज शिक्षित होगा. युवा विधवा महिलाओं को बैंक लोन या सरकार की योजनाओं का लाभ देना होगा, जिससे विधवा का परिवार उसे बोझ न समझे. डायन प्रथा खत्म करने के अभियान में अधिक से अधिक पुरुषों को जोड़ना होगा. 
 
जब तक समाज का पुरुष वर्ग डायन प्रथा जैसे अंधविश्वासों के प्रति जागरूक नहीं होगा, इस प्रथा को समाज से मिटाना मुश्किल काम है. गांवों में काम कर रहे स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) डायन प्रथा को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. हर गांव में 10-12 एसएचजी होता है, जिसमें करीब 100-150 महिलाएं होती है. अगर इन महिलाओं के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास के खिलाफ जन जागरण और जागरूकता संबंधी कार्यक्रम आयोजित की जाये, तो इस गंभीर मामले पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है. 
 
डायन प्रथा एक अंधविश्वास है. इसे खत्म करने में प्रशासन एवं न्यायापालिका की भी बड़ी भूमिका है. डायन के नाम पर होने वाली स्थानीय सम्मेलन (मीटिंग) पर प्रशासन को रोक लगानी चाहिए. 
 
डायन के नाम पर प्रताड़ित होने वाली महिलाएं या जिनकी हत्या कर दी जाती है, ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होनी चाहिए तथा एक निर्धारित समय में दोषी को सजा का प्रावधान निर्धारित हो, तो लोगों में डर व्याप्त होगा. सरकारी वकील को अंधविश्वास जैसे मामले की पैरवी के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित करना होगा. फास्ट ट्रैक कोर्ट में महिला न्यायाधीश होनी चाहिए. ऐसे मामलों में कठोर सजा भी मिलनी चाहिए. सख्त सजा दूसरे लोगों को डायन जैसी अंधविश्वास को फैलाने से रोकेगा. अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों के खिलाफ कठोर संदेश देना होगा, तभी इस गंभीर मामले पर काबू पाया जा सकता है. 
 
डायन प्रथा पुरुषों की देन है. महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए डायन का नाम दिया जाता है. इसके जिम्मेवार पुरुष वर्ग है. अगर पुरुष इन अंधविश्वास को लेकर संवेदनशील हो जायें, तो ऐसी प्रथाएं खुद-ब-खुद खत्म हो जायेगी. सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, गैर सरकारी संगठन, सिविल सोसाइटी, पंचायत, शिक्षा विभाग, एसएचजी सभी को एक मंच पर आकर डायन प्रथा जैसी कुप्रथा के खिलाफ एक साथ प्रहार करना होगा, तभी हमारे समाज से मिट सकता है.