aadhi aabadi

  • Apr 21 2017 12:51PM

घर से बाहर कदम रख कर सुमन ने बनायी अलग पहचान

घर से बाहर कदम रख कर सुमन ने बनायी अलग पहचान
कनक राज
इंटर पास सुमन किस्पोट्टा को हिसाब-किताब नहीं आती थी. उन्हें स्मार्ट फोन भी चलाना नहीं आता था, लेकिन अब वह टैबलेट पर हिसाब-किताब रखती हैं. हिन्दी और अंग्र्रेजी में टाइपिंग करती हैं. उन्हें स्मार्टफोन और स्कूटी चलाना भी बखूबी आता है. पहले चहारदीवारी में बंद सुमन किस्पोट्टा की जिंदगी अब स्मार्ट हो गयी हैं. वह चंदाघासी पंचायत के इट्ठे और मरियातू गांव की आठ सखी मंडल की 93 महिलाओं की अगुआ हैं. आठ सखी मंडल का हिसाब-किताब रखना और पंचायत की महिलाओं को मोटिवेट करना उनका काम है. वह जेएसएलपीएस से जुड़ कर बदलाव लायी है.
 
20 रुपये से शुरू हुई थी आजीविका 
इट्ठे मरियातू की रहने वाली सुमन किस्पोट्टा ने साल 2015 में 20 रुपये देकर शबनम स्वयं सहायता समूह से जुड़ी.  समूह से जुड़ने के बाद सुमन ने यह नहीं सोचा था कि वह आठ-आठ समूह के हिसाब-किताब को देखेगी, लेकिन ग्रामीण मिथक और परंपराओं को तोड़ कर सुमन ने अपनी पहचान घर की दहलीज से बाहर तक बनायी. आज सुमन आठ स्वयं सहायता समूह की 93 महिलाओं को मोटिवेट कर रही हैं. वह ग्राम संगठन सहायिका भी हैं. सुमन की टीम की हर महिलाएं आजीविका के लिए अपने पैरों पर खड़ी हैं. इसमें किसी का व्यापार फल-फूल रहा है, तो किसी ने सूकर और बकरी पालन में अपनी आजीविका को तलाशा है. कई महिलाओं ने समूह से ऋण लेकर खेती को भी अपनी आजीविका का आधार बनाया है.
 
खुद पढ़ी और बच्चों को भी पढ़ाया 
सखी मंडल से जुड़ने के बाद सुमन ने ऋण लेकर अपनी पढ़ाई की और छोटे-छोटे व्यवसाय भी शुरू की. छोटी आमदनी से स्कूटी खरीदी और पति के लिए धान कूटने वाली मशीन भी खरीदी. अपने दो बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा भी रही है. सुमन अब गांव में ही एक स्टेशनरी की दुकान खोलने की योजना बनायी है.
 
जेएसएलपीएस से मिला सपनों का पंख : सुमन
सुमन कहती हैं कि आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद मेरे सपनों को पंख मिला. डिजिटली स्ट्रांग हुई. बैंकिंग कामकाज सीखा और देश-दुनिया के बारे में जाना. दिल्ली में ट्रेनिंग के बाद मेरे हौसलों को पंख मिल गया. अब मैं बैंक के काम जैसे फॉर्म भरना, खाता खुलवाना, हिसाब-किताब रखना, महिलाओं को ऋण दिलाना और ऋण वापसी के लिए प्रोत्साहित करने जैसे कामों को बड़ी ही आसानी से करती हूं. मेरे काम को देखते हुए जेएसएलपीएस ने मुझे बतौर ट्रेनर भी रखा. रातू, सिल्ली, नगड़ी में समूह बनाने के लिए प्रेरित करती हूं और एमआइएस की ट्रेनिंग भी देती  हूं.
 
कौन हैं सुमन किस्पोट्टा 
सुमन किस्पोट्टा नामकुम प्रखंड स्थित चंदाघासी पंचायत के इट्ठे मरियातू गांव की रहने वाली है. साल 2014 में सुमन ने शबनम स्वयं सहायता समूह से जुड़ कर अपनी आजीविका की शुरुआत की. झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के सहयोग से सुमन के जीवन में बदलाव आया. सुमन ने दिल्ली में जाकर टीम मैनेजमेंट, सेल्फ हेल्प ग्रुप चलाने के तरीके, एमआइएस सहित कई तरह की ट्रेनिंग भी ली. चंदाघासी पंचायत में आज सुमन की पहचान टैबलेट दीदी के रूप में भी है. जेएसएलपीएस में वह बतौर ग्राम संगठन सहायिका भी है. वह स्वलेखा सॉफ्टवेयर में सखी मंडल का सारा डाटा फिड करती हैं और कलस्टर में जमा करती हैं. इस कार्य के लिए समिति की तरफ  से उन्हें मानदेय भी मिलता है.