aadhi aabadi

  • Aug 7 2017 12:51PM

हुनर की बदौलत अपनी आजीविका बढ़ाती सखी मंडल की दीदियां

हुनर की बदौलत अपनी आजीविका बढ़ाती सखी मंडल की दीदियां

आजीविका से बदली कृिष मित्र बसंती देवी की जिंदगी

आजीविका समूह से जुड़ कर महिलाएं कैसे आत्मनिर्भर हो रही है इसकी झलक रांची जिले के कांके प्रखंड अंतर्गत चुट्टू गांव की बसंती देवी में दिखती है. बसंती देवी कृषि मित्र है और किसानों को खेती के नयी तकनीक की जानकारी देते हुए उसे अपनाने के लिए प्रेरित भी करती है. बसंती देवी अपने खेत में भी आधुनिक तकनीक से खेती कर रही है. हालांकि, बसंती देवी पहले ऐसी नहीं थी. उसके पास जमीन तो थी, लेकिन पूंजी और जानकारी का अभाव था, जिसके कारण उसकी जिदंगी पटरी पर नहीं दौड़ रही थी. साल 2016 में सिनगी महिला विकास संघ सखी मंडल से जुड़नेवाली बसंती अपने समूह में काफी सक्रिय रही. जब गांव में महिला मंडलों से कृषि मित्र का चुनाव हुआ, तो महिला मंडल की दीदियों ने बसंती देवी को कृषि मित्र के तौर पर चयन किया. चयन के बाद बंसती देवी को प्रशिक्षण के लिए भेजा गया. प्रशिक्षण प्राप्त कर बसंती ने महिला समूह से लोन लेकर खुद की बंजर जमीन को खेती योग्य बनाया और खेती करने लगी. जब उसे लाभ हुआ, तो महिला समूह की दीदियों को जैविक खाद बनाने की जानकारी देने लगी. महिला समूह की दीदियों को बसंती ने बताया कि कैसे बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए. बसंती देवी ने समूह की 17 से 18 दीदियों को श्रीविधि तकनीक से खेती करने के बारे में जानकारी दी. इस तकनीक के जरिये कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलता है. बसंती देवी के प्रयास से ही पॉली हाउस का निर्माण हुआ है, जिसे बतौर नर्सरी इस्तेमाल किया जाता है. बसंती देवी की मेहनत का फल गांव की दूसरी दीदियों को भी मिल रहा है. बतौर कृषि मित्र बसंती देवी अपने क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही है. 

सुचिता देवी

प्रखंड : कांके

जिला : रांची

शौचालय निर्माण में दीदियों की अहम भूमिका

गिरिडीह जिला के डुमरी प्रखंड को खुले में शौच से मुक्त करने कि दीदियों ने ठानी है. इसी को लेकर नगरी और लक्ष्मणटुंडा पंचायतों में स्वयं सहायता समूह की दीदियों के साथ ग्रामसभा का आयोजन हुआ. इस सभा का नेतृत्व बीपीएम रामकृष्ण महतो ने किया. इस दौरान ग्राम संगठन नगरी में 19 शौचालय निर्माण की राशि लाभुकों के बीच वितरित की गयी. इस मौक पर उपस्थित प्रखंड विकास पदाधिकारी ने कहा कि वर्तमान समय में शौचालय बनाना बहुत महत्वपूर्ण है. पंचायत जनप्रतिनिधियों में जागरूकता की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि ग्राम संगठन के माध्यम से प्रत्येक पंचायत में शौचालय का निर्माण किया जा सकता है. इस मुहिम का उद्देश्य खुद और दूसरों को स्वस्थ्य रखना है. बीडीओ ने कहा कि शौचालय निर्माण में गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. शौचालय निर्माण को लेकर लाभुक सही स्थल का चयन करें. मुखिया और पंचायत समिति के सदस्य क्षेत्रों में निगरानी करें. इस अवसर पर नगरी और लक्ष्मणटुंडा पंचायत के कई लाभुकों ने अपने-अपने क्षेत्र में शौचालय निर्माण की नींव रखी. गांवों में शौचालय निर्माण के प्रति ग्रामीणों में काफी उत्साह भी दिखा. 

मुनिया देवी

प्रखंड : डुमरी

जिला : गिरिडीह

गांव, समाज व खुद को बदलने में दीदियों का सहयोग

पश्चिमी सिंहभूम जिले के तांतनगर प्रखंड अंतर्गत एक गांव है अंगरडीहा. इस गांव में 17 स्वयं सहायता समूह है और इस समूह से करीब 224 महिलाएं जुड़ीं हैं. जेएसएलपीएस के सहयोग से साल 2015 में गठित इस समूह में नियमानुसार हर कार्य होते हैं. साप्ताहिक बैठकों में महिलाओं की उपस्थित अधिक रहती है. महिलाओं ने बचत करने के साथ-साथ बैंकों में अपने-अपने खाते भी खुलवाये. बैंक में खाता खुलने का फायदा यह हुआ कि सभी समूहों का बैंक लिंकेज भी होने लगा. वर्तमान में समूहों के बीच तीन लाख रुपये तक का लेन-देन हो रहा है. वहीं सीआइएफ की राशि हर माह सही समय पर वापस भी हो रही है. बैंक लिंकेज की राशि भी ससमय वापस हो रही है. समूह की अन्य गतिविधियों में कृषक मित्र अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों के बीच श्रीविधि तकनीक अपनाने को प्रोत्साहित कर रही है, वहीं धान का भी वितरण हुआ है. ग्राम संगठन की दीदियां उत्क्रमित मध्य विद्यालय का निरीक्षण भी करती है. बच्चों को मिलनेवाली पौष्टिक आहार के साथ-साथ बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं की उपस्थिति पर भी नजर रखती हैं. क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी दीदियों की बराबर नजर रहती है. स्कूल समेत आंगनबाड़ी केंद्र में खामियां पाये जाने की स्थिति में दीदी ग्राम संगठन के माध्यम से मुखिया को सूचित भी करती है, ताकि समस्या का जल्द निराकरण हो सके. समूह की दीदियों ने गांव में खराब चापाकल के बारे में मुखिया को सूचित किया. जानकारी मिलते ही मुखिया ने खराब चापाकल को बना कर ग्रामीणों को पेयजल की समस्या से निजात दिलायी. इसके अलावा समूह की दीदियां अन्य सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती है. दीदियां कहती हैं कि गांव और समाज के बदलाव से ही खुद में भी बदलाव आयेगा. 

सुशीला देवी

प्रखंड : तांतनगर

जिला : प िसंहभूम

समूह से जुड़ कर आत्मनिर्भर बनी मानसुरा

पाकुड़ जिले के पाकुड़ प्रखंड की मानसुरा बेवा आज आत्मनिर्भर हो कर अपने चार बच्चों का पालन-पोषण अच्छे ढंग से कर ही है. यह पूरा बदलाव जेएसएलपीएस के प्रयास से ही संभव हो पाया है. जब जेएसएलपीएस के लोग सर्वे करने के लिए रहसपुर गांव पहुंचे. उस समय मानसुरा बेवा को भी जेएसएलपीएस द्वारा संचलित महिला समूहों की जानकारी दी गयी. जानकारी प्राप्त कर मानसुरा भी महिला समूह से जुड़ गयी. समूह से जुड़ने के बाद मानसुरा समूह की गतिविधियों में काफी सक्रिय हुई. इस दौरान मानसुरा ने समूह से 20 हजार रुपये का ऋण लिया. ऋण की राशि से उन्होंने बकरी, बतख और मुर्गी पालन का व्यवसाय शुरू किया. इस व्यवसाय के शुरू करने के बाद मानो मानसुरा की जिंदगी ही बदल गयी. मानसुरा सुराज आजीविका महिला स्वयं सहायता समूह और भारसाल ग्राम संगठन आजीविका मिशन से जुड़ी है. समूह से जुड़ने से पहले मानसुरा की पारिवारिक हालात अच्छे नहीं थे. पति समेत चार बच्चों का परिवार चलाना मुश्किल था. मानसुरा के पति काम करने के लिए कोलकाता गये. वहां रिक्शा चलाने के दौरान ट्रक की चपेट में आने से उनकी मौत हो गयी. इस घटना के बाद तो मानसुरा टूट-सी गयी थी. लेकिन, हिम्मत नहीं हारते हुए मानसुना मजदूरी कर परिवार चलाने लगी. इधर, जेएसएलपीएस से जुड़ने के बाद मानसुरा की जिंदगी ही बदल गयी. कल तक जहां मानसुरा के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाना मुश्किल हो रहा था, वहीं आज मानसुरा ने महिला समूह से जुड़ कर अपनी लगन और इच्छाशक्ति से परिवार को गरीबी से बाहर निकाला. अब वो समूह से बड़ा लोन लेकर बकरी, बतख और मुर्गी पालन कर रही है. अपने इस बेहतर कार्य के लिए मानसुरा गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बन गयी है. हालांकि, आज भी पुराने दिनों को याद करके मानसुरा की आंखे भर जाती है. मानसुरा कहती हैं कि किस तरीके से पहले वो महाजनों के चंगुल से परेशान रहती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है. 

रूनजेला खातून

प्रखंड : पाकुड़

जिला : पाकुड़

समूह से जुड़ने से बदली ललिता दीदी की जिंदगी

ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों के जीवन-यापन और बेहतर आजीविका का जरिया बना है झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी. स्वयं सहायता समूह से जुड़ कर ग्रामीण महिलाएं जहां एक ओर कौशल और दक्षता प्राप्त कर रही है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण लेने का आत्मविश्वास जगा है. समूह की ऐसी ही एक सदस्य हैं ललिता देवी. सदर मेदिनीनगर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के सुआ गांव की ललिता देवी ना केवल अपना बल्कि पूरे परिवार का आिर्थक मदद की है. समूह से जुड़ने के बाद उसमें अमूल-चूल परिवर्तन आया है. लक्ष्मी आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ललिता देवी की भी कहानी दूसरी दीदियों की ही तरह थी. समूह से जुड़ने से पहले इनकी भी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. कम उम्र में शादी होने के कारण पढ़ाई-लिखाई से भी नाता टूट गया. इसी बीच ललिता के दो बच्चे भी हुए. आर्थिक स्थिति खराब रहने के कारण जहां खाने के लाले पड़े थे, वहीं बच्चों के भविष्य की भी चिंता सताने लगी. महाजन से कर्ज लेकर पति कमाने के लिए बाहर निकलते, लेकिन सारा पैसा कर्ज चुकता करने में ही निकल जाता था. जैसे-तैसे परिवार चल रहा था. धीरे-धीरे ललिता जिंदगी से हार मानने लगी. इसी दौरान ललिता देवी की मुलाकात स्वयं सहायता समूह की एक दीदी से हुई. बातचीत में समूह की दीदी ने ललिता की पूरी कहानी सुनी और समूह से जुड़ने को कहा. पहले तो काफी डर लगा, क्योंकि आज से पहले कभी घर से बाहर नहीं निकली थी. लेकिन, समूह की अन्य दीदियों ने हौसला बढ़ाया, तो ललिता में आत्मविश्वास जगा. धीरे-धीरे समूह की अन्य गतिविधियों में सक्रिय होने लगी. ललिता के पति की इच्छा थी कि गांव में ही रह कर कोई काम किया जाये. काफी बातचीत कर ललिता ने समूह से 20 हजार रुपये का ऋण लिया. पति ने इस रुपये से गांव में ही एक िग्रल बनाने का दुकान खोला. पति द्वारा काफी मेहनत करने के कारण धीरे-धीरे दुकान चल निकला, जिससे आर्थिक स्थिति में पहले की अपेक्षा कुछ सुधार होने लगा. आमदनी बढ़ने पर ललिता के पति ने दुकान में जेनरेटर, लोहा कटर मशीन, छेद करनेवाली मशीन समेत अन्य मशीनों को लगाया. इसका असर यह हुआ कि आमदनी में और बढ़ोतरी हुई. आमदनी बढ़ने से ललिता देवी अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने लगी. आज उसकी बड़ी बेटी मैट्रिक में अच्छे अंकों से पास कर इंटर में दाखिला लिया और बेटा प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रहा है. अब ललिता गांव की अन्य दीदियों को भी गरीबी से बाहर निकालने का रास्ता दिखा रही है.

ममता देवी

प्रखंड : मेिदनीनगर

जिला : पलामू

ग्रामसभा में बढ़ी दीदियों की भागीदारी

राजधानी रांची के कांके प्रखंड स्थित दुबलिया गांव में हर माह की 26 तारीख को ग्रामसभा का आयोजन होता है. इस ग्रामसभा में सखी मंडल की दीदियों की सहभागिता अधिक देखने को मिली. सखी मंडल की दीदियों ने अपने कार्य, उससे होनेवाले लाभ और गांवों को विकसित करने में उनकी भूमिका के बारे में उपस्थित लोगों को बताया. 

सबसे पहले आजीविका से जुड़ने के बाद दीदियों में आये अमूल-चूल परिवर्तन का दीदियों ने जिक्र करते हुए गांव की अन्य महिलाओं को भी सखी मंडल से जुड़ने की अपील की. आजीविका कृषक मित्र ने जेएसएलपीएस की ओर कृषि यंत्र दिये जाने की बात कही. इसके तहत पावर टिलर, स्प्रेयर मशीन, पैडल थ्रेसर, पंप सेट और कोनोविडर दिये गये. इन मशीनों का उपयोग किसान अपने खेती-किसानी में कर सकते हैं. आजीविका कृषक मित्र सहजन और पपीता का पौधा घर-घर लगवा रही है. साथ ही किसानों को श्रीविधि तकनीक से धान की खेती करने को प्रोत्साहित कर रही है. आजीविका पशु सखी ने कहा कि सखी मंडल की दीदियों को जेएसएलपीएस की ओर से मुर्गी, बतख, बकरी व सूकर पालन के लिए कम लागत में पशु दिये गये हैं. कई दीदियां आज मुर्गी पालन से जुड़ी हैं. पशु सखी पशुओं की देख-रेख के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं. 

ग्रामसभा में उपस्थित ग्राम प्रधान सतीश तिग्गा, वार्ड सदस्य विक्रम उरांव और विरन बिन्हा ने संयुक्त रूप से जेएसएलपीएस के इस सहयोग के प्रति अाभार जताया. उन्होंने कहा कि जेएसएलपीएस ने महिलाओं को आजीविका से जोड़ कर रोजगार के लिए प्रेरित किया है. महिलाओं में बदलाव भी आया. पंचायत जनप्रतिनिधियों ने कहा कि पहले ग्रामसभा की बैठक में मात्र दो से चार महिलाएं ही आती थी. लेकिन, अब पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. महिलाएं साक्षर भी हो रही है और आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है.

प्रीति िलंडा

प्रखंड : कांके

जिला : रांची

सखी मंडल से जुड़ कर बासो ने खोली गैराज

रांची जिले के नामकुम प्रखंड स्थित तुम्बागुट्टू गांव की रहनेवाली बासो लकड़ा सखी मंडल से जुड़ कर बखूबी अपना आजीविका चला रही है. 09 मार्च, 2014 को शशि सखी मंडल से जुड़ी बासो लकड़ा घर खर्च के लिए समूह से पहला ऋण दो सौ रुपये लिया. छोटा-बड़ा ऋण लेकर बासो लकड़ा ने अपनी जरूरतों को पूरा किया. अभी तक बासो ने छोटा ऋण के तौर पर सात हजार रुपये और बड़ा ऋण के तौर पर एक लाख 20 हजार रुपये तक लिया. इन राशियों से बासो ने बाइक गैराज खोली. अब इस गैराज के सहारे बासो की पारिवारिक स्थिति में सुधार हुआ है. बासो कहती हैं कि सखी मंडल से जुड़ने से पहले पति मजदूरी करते थे और बेटा दूसरों के बाइक गैराज में काम करता था. जिसके कारण चार सदस्यों वाले बासो को अपना परिवार चलाना बहुत मश्किल था. कहती हैं कि समूह से जुड़ी होने के कारण उन्होंने समूह से ऋण लेकर गैराज खोली. अब तो इस गैराज में दो लोगों को भी रोजगार दे रही है. बासो कहती है कि दुकान खोलने का सपना पहले से था, लेकिन पूंजी नहीं होने के कारण असमर्थ थी और बेटा दूसरे के गैराज में काम करने को जाता था. लेकिन, अब समूह से सहयोग से जो गैराज खुला है, उससे हर माह 20 हजार रुपये की आमदनी हो रही है. बासो समूह से लिये ऋण को ससमय चुकता भी कर रही है. अब बासो लकड़ा दूसरे स्थान पर भी एक दुकान खोलना चाहती है. वहीं परिवार के लिए पक्का घर और बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में लगी है.

सुषमा लकड़ा

प्रखंड : नामकुम

जिला : रांची
 

आजीविका से गीता को मिली पहचान

पलामू जिले के लेस्लीगंज प्रखंड अंतर्गत एक गांव है धनगांव. इस गांव की गीता देवी आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. कल तक गांव और बाजार में घूम-घूम कर श्रृंगार का समान बेचनेवाली गीता की आज सड़क किनारे एक दुकान है. अब तो इस दुकान में श्रृंगार समान के अलावे किराने के समान, स्टेशनरी और बीज भी आपको मिल जायेंगे. गीता का यह बदलाव यूं ही नहीं आया, बल्कि समूह से जुड़ने के बाद उसमें यह बदलाव आया और उसकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हुई. सरस्वती आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं गीता समूह में सचिव है. गीता कहती हैं कि आजीविका मिशन से जुड़ने से पहले उसके घर और कारोबार की स्थिति ऐसी नहीं थी. मनिहारी समानों को बेचना उनका खानदानी पेशा था. बाजारों के अलाव गांव-गांव घूम कर श्रृंगार का समान बेचा करती थी. साल 2009 में 10 सदस्यों का एक समूह बनाया गया . समूह के माध्यम से हर माह 100 रुपये की बचत करती थी. लेकिन, इस समूह में कोई आरएफ और सीआइएफ नहीं मिलता था. इसके कारण ऋण भी कम मिलता था और जो भी ऋण मिलता था, उस पर पांच प्रतिशत का ब्याज दर लगता था, जिसे चुकता करने में काफी परेशानी होती थी. आजीविका में कोई सुधार होने के कारण स्थिति जस की तस थी. इसी बीच धनगांव में आजीविका मिशन से जुड़ी सीआरपी दीदी आयीं. उन्होंने आजीविका मिशन से जुड़ने, उससे होने वाले लाभ, ब्याज दर, बचत के तरीके बताये गयें. दीदियों ने सप्ताह में 10 रुपये बचत करने को बताया, जो गीता को अच्छा लगा. इसके बाद गीता देवी सरस्वती आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गयी. समूह की हर गतिविधियों में काफी सक्रिय रहने लगी. समूह में बचत करने के कारण आरएफ और सीआइएफ आने लगा. गीता कहती हैं कि समूह से 16 हजार रुपये का ऋण लिया, वो भी डेढ़ प्रतिशत ब्याज दर से मिला. समूह से ऋण मिलने पर गीता ने एक दुकान खोली. इस दुकान में श्रृंगार के समान के अलावा किराने के समान, स्टेशनरी और बीज रखने लगी. मुख्य सड़क के किनारे दुकान होने के कारण दुकान चल निकला और आर्थिक स्थिति में भी सुधार होने लगा. अब गीता चाहती है कि उसका भी एक बड़ा दुकान हो और इसके लिए बकायदा 10 हजार रुपये ऋण की मांगी की है. गीता कहती हैं कि आजीविका ने आज उसे एक मुकाम दिया है.

नयनतारा कुमारी

प्रखंड : लेस्लीगंज

जिला : पलामू

समूह से जुड़ने से बदली ललिता दीदी की जिंदगी

ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों के जीवन-यापन और बेहतर आजीविका का जरिया बना है झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी. स्वयं सहायता समूह से जुड़ कर ग्रामीण महिलाएं जहां एक ओर कौशल और दक्षता प्राप्त कर रही है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण लेने का आत्मविश्वास जगा है. समूह की ऐसी ही एक सदस्य हैं ललिता देवी. सदर मेदिनीनगर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के सुआ गांव की ललिता देवी ना केवल अपना बल्कि पूरे परिवार का आिर्थक मदद की है. समूह से जुड़ने के बाद उसमें अमूल-चूल परिवर्तन आया है. लक्ष्मी आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ललिता देवी की भी कहानी दूसरी दीदियों की ही तरह थी. समूह से जुड़ने से पहले इनकी भी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. कम उम्र में शादी होने के कारण पढ़ाई-लिखाई से भी नाता टूट गया. इसी बीच ललिता के दो बच्चे भी हुए. आर्थिक स्थिति खराब रहने के कारण जहां खाने के लाले पड़े थे, वहीं बच्चों के भविष्य की भी चिंता सताने लगी. महाजन से कर्ज लेकर पति कमाने के लिए बाहर निकलते, लेकिन सारा पैसा कर्ज चुकता करने में ही निकल जाता था. जैसे-तैसे परिवार चल रहा था. धीरे-धीरे ललिता जिंदगी से हार मानने लगी. इसी दौरान ललिता देवी की मुलाकात स्वयं सहायता समूह की एक दीदी से हुई. बातचीत में समूह की दीदी ने ललिता की पूरी कहानी सुनी और समूह से जुड़ने को कहा. पहले तो काफी डर लगा, क्योंकि आज से पहले कभी घर से बाहर नहीं निकली थी. लेकिन, समूह की अन्य दीदियों ने हौसला बढ़ाया, तो ललिता में आत्मविश्वास जगा. धीरे-धीरे समूह की अन्य गतिविधियों में सक्रिय होने लगी. ललिता के पति की इच्छा थी कि गांव में ही रह कर कोई काम किया जाये. काफी बातचीत कर ललिता ने समूह से 20 हजार रुपये का ऋण लिया. पति ने इस रुपये से गांव में ही एक िग्रल बनाने का दुकान खोला. पति द्वारा काफी मेहनत करने के कारण धीरे-धीरे दुकान चल निकला, जिससे आर्थिक स्थिति में पहले की अपेक्षा कुछ सुधार होने लगा. आमदनी बढ़ने पर ललिता के पति ने दुकान में जेनरेटर, लोहा कटर मशीन, छेद करनेवाली मशीन समेत अन्य मशीनों को लगाया. इसका असर यह हुआ कि आमदनी में और बढ़ोतरी हुई. आमदनी बढ़ने से ललिता देवी अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने लगी. आज उसकी बड़ी बेटी मैट्रिक में अच्छे अंकों से पास कर इंटर में दाखिला लिया और बेटा प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रहा है. अब ललिता गांव की अन्य दीदियों को भी गरीबी से बाहर निकालने का रास्ता दिखा रही है.

ममता देवी

प्रखंड : मेिदनीनगर

जिला : पलामू