aadhi aabadi

  • Sep 13 2017 1:01PM

बिना सरकारी मदद के ग्रामीणों ने कैसे बदली गांव की सूरत, आप भी जानिए

बिना सरकारी मदद के ग्रामीणों ने कैसे बदली गांव की सूरत, आप भी जानिए
पवन कुमार
राजधानी रांची से 25 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड के टुंडाहुली पंचायत अंतर्गत चुट्टूपालू घाटी की खूबसूरत तराई पर दो गांव बसे हैं. एक है आरा और दूसरा केरम. आज ये दोनों गांव चर्चा में है, क्योंकि यहां के ग्रामीणों ने एकजुटता दिखायी और कई पहलुओं पर काम करते हुए अपने-अपने गांवों की दशा और दिशा ही बदल दी. पहाड़ी की तराई पर बसा यह गांव बेहद मनोरम दिखता है. गांव में पर्यटन को लेकर भी असीम संभावनाएं हैं और इस दिशा में काम करने के बारे में ग्रामीण सोच भी रहे हैं.

गांव में प्रवेश करते ही प्राकृतिक खूबसूरत आपका मनमोह लेती है. कुदरत ने इस गांव को बखूबी प्राकृतिक खूबसूरती से नवाजा है. वहीं ग्रामीणों ने अपनी लगन और मेहनत से इस खूबसूरती को सहेजा और सवांरा है. आज आरा और केरम गांव खुद को आदर्श गांव के तौर पर स्थापित कर रहे हैं. साथ ही इस गांव ने यह साबित कर दिया है कि आज भी मनरेगा के कार्यों को सही तरीके से जमीनी धरातल पर उतारा जाये, तो गांवों की तसवीर बदल सकती है. इन दोनों गांवों की तसवीर बदलने में ग्रामीणों के साथ-साथ मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी का भी अहम योगदान रहा है. आज भी दोनों गांवों में मनरेगा की सीएफटी कार्य कर रही है. 
 
पहले ऐसे नहीं थे हालात 
आदिवासी बहुल गांव होने के कारण शराब ग्रामीणों की नस-नस में बसी थी. लोग नशे के आदी थे. जगंलों से लकड़ी काटना और ओरमांझी में जाकर बेचना ग्रामीणों का मुख्य पेशा था. शराब पीकर कई लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते थे. नशे के कारण गांव के कई युवा हादसे के शिकार हुए. पुरुष तो पुरुष गांव की महिलाएं भी नशे की आदी हो चुकी थी. गांव में विकास को लेकर कोई सोचता भी नहीं था. साफ-सफाई व शिक्षा को लेकर ग्रामीण जागरूक नहीं थे. आज भी आरा और केरम गांव में किसी के पास सरकारी नौकरी नहीं है. गांव के अधिकांश युवा सिर्फ इंटर तक ही पढ़ पाये हैं. पिछड़ा और जगंली इलाका होने के चलते सरकारी योजनाएं भी गांव तक नहीं पहुंच पाती थी. सरकारी अधिकारियों की भी इस गांव तक पहुंच नहीं थी. वन संपदा और जमीन रहते हुए भी यह गांव काफी पिछड़ा था.
 
वनों के बचाने की मुहिम
वर्ष 1992 में हजारीबाग वन विभाग की ओर से महादेव महतो आरा-केरम गांव पहुंचे. ग्रामीणों को वन और वन्य जीवों के महत्व के बारे में समझाया. इसका असर भी दिखा और ग्रामीणों ने तत्काल वन और वन्य जीवों के संरक्षण का संकल्प लिया. इस दौरान ग्राम वन सुरक्षा समिति का गठन हुआ और जंगलों को बचाने को लेकर कार्य शुरू भी हुए. दूसरे गांव के ग्रामीण पहले जंगलों को बेधड़क काटते थे. जंगली जानवरों का शिकार भी होता था. जब वन सुरक्षा समिति का गठन हुआ, तो इस पर अंकुश लगा. शुरुआत में कई बार ग्रामीणों की झड़प भी हुई. मारपीट की नौबत तक आयी. कई मामले थाने तक पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों के उत्साह में कोई कमी नहीं आयी. बैठक कर ग्रामाीणों ने दोनों गांव के 10-10 युवाओं का अलग-अलग दस्ता बनाया. सभी दस्तों को जंगलों की निगरानी के लिए समय निर्धारित किया गया. लगातार हो रही निगरानी से वनों की कटायी में कमी आयी. ग्रामीण बताते हैं कि वनों की रखवाली का यह सिलसिला 2015 तक चला. लगातार 23 सालों तक चली ग्रामीणों की यह मुहिम रंग लायी और आज यहां साढ़े पांच सौ से अधिक प्रजाति के पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं. पेड़ों को बचाने और लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 14 अप्रैल को पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधते हुए जंगल व जंगली जानवरों को बचाने का संकल्प लिया जाता है. आरा-केरम गांव में 70 एकड़ क्षेत्र में फैले पेड़ों को राखी बांधी जाती है. वहीं 350 एकड़ में फैले जंगल को संरक्षित किया गया है. वनों को नुकसान पहुंचाने पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान है. ग्रामसभा से पारित नियम के अनुसार, वन क्षेत्र में पालतु पशुओं को चराने पर मनाही के साथ-साथ जंगल से दातुन पत्ता नहीं तोड़ने और जंगल से सूखी लकड़ियों की निकासी पर भी रोक हैं.
 
गांव में डीप बोरिंग पर है पाबंदी
लगातार कम होते भूमिगत जल स्तर को देखते हुए आरा-केरम गांव में डीप बोरिंग पर पूर्णरूपेण पाबंदी है. हालांकि, सिर्फ पेयजल के लिए डीप बोरिंग करने का प्रावधान है, वो भी सिर्फ एक जगह पर डीप बोरिंग किये गये. गांव में छोटे-बड़े कुल 45 डोभे बनाये गये हैं. सभी डोभों का निर्माण मनरेगा के तहत हुआ है. ग्रामीणों ने श्रमदान करके पहाड़ से उतरनेवाले पानी को बचाने के उद्देश्य से एक नाला बनाया है और उस नाले के जरिये पहाड़ का पानी सीधे तालाब में लाया गया. इससे ग्रामीणों को एक साथ दो लाभ हुआ. जहां एक ओर गांव में भूगर्भ जलस्तर बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर तालाबों में पानी लबालब भरा है. 

नशाबंदी से बदली गांव की सूरत 
गांव में प्रवेश करते ही आपको एक बोर्ड दिखायी देगा, जिसमें लिखा है नशा मुक्त आरा केेरम गांव में आपका स्वागत है. गांव में लगभग हर घर की दीवारों पर नशामुक्ति संबंधी बातें लिखी हुई है. ग्रामीण बताते हैं कि पहले नशा के कारण गांव में विकास कार्य नहीं के बराबर होता था. खासकर गांव के युवा शराब की लत के चलते मुख्यधारा से भटक रहे थे और विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रहे थे. गांव की महिला समूह की दीदियां कहती हैं कि एक वक्त था जब गांव में त्योहारों के समय लोग नशे में डूबे रहते थे और कई दिनों तक त्योहार मनाया जाता था, लेकिन अब त्योहार खत्म होते ही लोग काम में लग जाते हैं. वर्ष 2016 में आरा- केरम गांव के ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से बैठक कर गांव को नशा मुक्त करने का संकल्प लिया. दोनों गांव के 30 युवकों को इसमें जोड़ा गया. फिर यह सिलसिला बढ़ता चला गया और अब पूरा गांव नशामुक्त हो गया. पहले आरा-केरम गांव के लोग एक साल में लगभग बीस लाख रुपये से अधिक की शराब पी जाते थे. उन पैसों का इस्तेमाल ग्रामीण आज अपने गांव और परिवार के विकास के लिए खर्च कर रहे हैं. 
 
साफ-सफाई और शिक्षा पर जोर
गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुका है. यह बदलाव सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखता है. गांव ओडीएफ हो चुका है. ग्रामीणों ने साफ-सफाई का जो मॉडल बनाया है, उससे राज्य के अन्य गांवों के ग्रामीण भी सीख ले सकते हैं. गांव में हर रोज सुबह पांच बजे लाउडस्पीकर के माध्यम से बच्चों को गांव में एक जगह पर बुलाया जाता है. इसके बाद सभी बच्चे गांव की सफाई करते हैं. हर रोज गांव की सफाई होती है, जिससे पूरा गांव साफ- सुथरा रहता है. 

वर्तमान में चिह्नित जगहों पर कूड़ेदान रखने की योजना पर गांव में काम चल रहा है. गांव की महिला समूह की दीदियों को यह काम सौंपा गया है. सभी दीदियां मिल कर कूड़ेदान बनायेगी और गांव के चिह्नित जगहों पर इसे रखा जायेगा. साफ-सफाई पर ध्यान देने से ग्रामीणों के स्वास्थ्य में भी काफी सुधार आया है. पहले की अपेक्षा अब ग्रामीण कम बीमार पड़ते हैं. शिक्षा के मामले में भी ग्रामीण जागरूक हुए हैं. गांव के ही दो पढ़े-लिखे युवक शाम में गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं. गांव में ड्रॉप आउट रेट नहीं के बराबर है.
 
श्रमदान है ग्रामीणों की पहचान
गांव में हर सप्ताह आयोजित होनेवाली बैठक में गांव के पुरुष और महिलाएं शामिल होते हैं. सभी को अपनी बात रखने का मौका मिलता है. प्रत्येक महीने के एक और 14 तारीख को ग्रामीण श्रमदान करते हैं. बैठक में माहवार योजनाओं का खाका खींचा जाता है और उसे अमल में भी लाया जाता है. श्रमदान के माध्यम से गांव में तालाब निर्माण, मिट्टी कटाई रोकने के लिए जंगलों के बीच में पत्थरों से छोटे-छोटे बांध बनाने, जंगल की तराई में नाला निर्माण आदि मुख्य है.

गांव में नियम
गांव के अंदर जाते ही गांव के चौराहे पर मनरेगा की योजनाओं से संबंधित बोर्ड के साथ एक और बोर्ड लगा है, जिसमें गांव के नियम लिखे गये हैं. इसके तहत ग्रामीणों को श्रमदान में शामिल होना, पूर्ण नशाबंदी को कड़ाई से लागू करना, शराब का सेवन करते या बेचते पकड़े जाने पर कड़ी कार्रवाई करना, गांव में लोटाबंदी यानी खुले में शौच पर पाबंदी, चराई बंदी यानी जंगलों में अपनी मवेशी चरने पर पाबंदी, कुल्हाड़ी बंदी यानी जंगलों में पेड़ों की कटाई पर पूर्णरूपेण रोक आदि मुख्य है. इन नियमों का पालन नहीं करने पर व्यक्ति को सरकारी लाभ लेने से आजीवन प्रतिबंधित करने का नियम इस गांव में है. 
 
वनों की रक्षा को लेकर लोग हुए जागरूक : रमेश
ग्राम वन सरंक्षण सुरक्षा समिति के अध्यक्ष रमेश बेदिया कहते हैं कि वनों को बचाने के लिए ग्रामीणों ने काफी संघर्ष किया है और उसी का नतीजा है कि आज गांव में 350 एकड़ घने वन क्षेत्र हैं. ग्रामीण जंगली जानवरों को परेशान नहीं करते हैं. जंगल में आग लगने पर गांव के लोग आधी रात में उठ कर भी आग बुझाने का काम करते हैं. पेड़ों को बचाने के लिए रक्षा सूत्र के तौर पर पेड़ों में सूती का कपड़ा बांधते हैं, ताकि कपड़ा दीमकों के लिए आहार बन जाये.
 
रालेगण सिद्धि गांव से मिली प्रेरणा : गोपाल राम
आरा गांव के ग्राम प्रधान गोपाल राम बेदिया कहते हैं कि गांव में लोग खेती-बारी पर विशेष ध्यान दे रहे हैं. श्रीविधि तकनीक से खेती करने के लिए ग्रामीणों को जागरूक किया गया है. मनेरगा की ओर से गांव में नाडेब का निर्माण कराया गया है, जिसमें जैविक खाद बनाया जाता है. आरा-केरम गांव को बेहतर बनाने संबंधी प्रेरणा हमें रालेगण सिद्धि गांव से मिली. जब हमलोग उस गांव में गये, गांव को देखा तब हमने अपने गांवों की तसवीर बदलने का फैसला लिया. अपने गांव वापस आकर सभी ग्रामीण अपने-अपने स्तर से कार्य में जुट गये और आज गांव की तसवीर आपके सामने है. 

समूह की दीदियां जानती हैं हस्ताक्षर करना : सीमा 
सरस्वती महिला समूह की सीमा देवी कहती हैं कि समूह से जुड़ने के बाद गांव की महिलाएं काफी जागरूक हुई है. समूह की जो महिलाएं पहले हस्ताक्षर करना नहीं जानती थी, उन्हें दूसरी महिलाओं ने हस्ताक्षर करना सीखाया. अन्य महिलाओं को भी साक्षर बनाने का प्रयास किया जा रहा है. महिला सखी गांव के विकास कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती है और अपनी भागीदारी सुनिश्चित करती है.