aadhi aabadi

  • Oct 25 2017 1:23PM

सखी मंडल सदस्यों के बढ़ते कदम, कैशलेस को बढ़ावा देतीं बीसी सखी गायत्री

सखी मंडल सदस्यों के बढ़ते कदम, कैशलेस को बढ़ावा देतीं बीसी सखी गायत्री

ज्योति रानी

गांवों को समृद्ध बनाने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है. इसके लिए सरकार ग्रामीण इलाकों तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दे रही है. इसके तहत बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी (बीसी सखी) मॉडल के जरिये झारखंड के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने और ग्रामीणों के दरवाजे तक बैंकों को पहुंचाने में बीसी सखी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

झारखंड में बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी मॉडल को ग्रामीण विकास विभाग के तहत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है. दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन एवं झारखंड ग्रामीण बैंक के संयुक्त प्रयास से सखी मंडलों से महिलाओं को चुनने के बाद उन्हें प्रशिक्षण देकर बीसी सखी के रूप में तैयार किया जा रहा है. सखी मंडल की वैसी सदस्य, जो बुक कीपिंग का काम करती हैं, उनका चयन बीसी सखी के रूप में किया जाता है और ग्रामीणों को वित्तीय सेवाएं देने के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है. बीसी सखी का काम बैंकों द्वारा दी जा रही सेवाएं ग्रामीणों को उपलब्ध कराना है.

ऐसी ही एक बीसी सखी हैं गायत्री देवी. गायत्री खूंटी जिले के रानिया प्रखंड स्थित जयपुर गांव की रहनेवाली हैं. खूंटी जिले का रनिया प्रखंड राजधानी रांची से 97 किलोमीटर दूर है. 42 वर्षीय गायत्री देवी दो बच्चों की मां हैं. उनके पति पीडीएस से जुड़े हैं. इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के ठीक बाद लगभग 18 साल की उम्र में ही गायत्री का विवाह हो गया था, पर उनकी शादी उनकी पढ़ाई में बाधक नहीं बनी. अपने पति के सहयोग से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और स्नातक तक की पढ़ाई पूरी की. वर्तमान में वह डिस्टेंस कोर्स के माध्यम से आगे की पढ़ाई कर रही हैं.

पढ़ाई के अलावा गायत्री को सामाजिक कार्य करना पसंद है. अपनी  पसंद का काम करने का मौका गायत्री को वर्ष 2015 के दिसंबर माह में मिला. गायत्री जेएसएलपीएस के अंतर्गत संचालित सरस्वती सखी मंडल की सदस्य बनीं और उनका चुनाव सखी मंडल के कोषाध्यक्ष के लिए किया गया. गायत्री को बुक कीपिंग का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया. गायत्री अपने सखी मंडल के साथ-साथ संतोषी सखी मंडल की भी बुक कीपिंग करती हैं.

सखी मंडल का निर्माण जयपुर गांव में काफी मुश्किल था, क्योंकि गांव की महिलाएं पूर्व के स्वयं सहायता समूहों के खट्टे अनुभवों से जूझ रही थीं. उनका विश्वास स्वयं सहायता समूहों पर से बिल्कुल उठ गया था. गायत्री ने उत्प्रेरक की भूमिका निभायी और ग्रामीण महिलाओं को सफलतापूर्वक सखी मंडल से जोड़ा.

अक्तूबर 2016 में बीसी सखी के लिए गायत्री का चयन किया गया था और उन्हें दो दिनों का प्रशिक्षण दिया गया था. पहला प्रशिक्षण ब्लॉक स्तर पर दिया गया और दूसरा प्रशिक्षण राजधानी रांची में हुआ. प्रशिक्षण के दौरान उन्हें खाता खोलना, वित्तीय लेन-देन और फंड ट्रांसफर करना सिखाया गया.

फरवरी 2017 से गायत्री ने झारखंड ग्रामीण बैंक के बीसी सखी के रूप में काम करना शुरू किया. जिसके अंतर्गत गायत्री खाता खोलने, नकद निकासी एवं जमा, ट्रांसफर, आधार सीडिंग, वृद्धा पेंशन, विकलांग पेंशन, मनरेगा का वेतन भुगतान, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत धन निकासी करना, रूपे डेबिट कार्ड को सक्रिय करना, स्कूल के बच्चों को स्कॉलरशिप राशि का भुगतान करना जैसे बैंकिंग कार्य गांव में प्रदान करने लगी.

गायत्री का मासिक लेनदेन फरवरी 2017 में एक लाख 93 हजार से शुरू हुआ. जुलाई 2017 के अंत तक यह 11 लाख 46 हजार रुपये तक पहुंच गया. परामर्शी कंपनी स्पैरो के माध्यम से गायत्री को बैंक खाता खोलने के एवज में 16 रुपये, डेबिट कार्ड सक्रिय करने के लिए पांच रुपये, आधार सीडिंग के लिए पांच रुपये और हर माह लेनदेन का 0.4 प्रतिशत दिया जा रहा है. इसके अतिरिक्त जेएसएलपीएस द्वारा उन्हें मानदेय के रूप में प्रति माह तीन हजार रुपये दिया जा रहा है.

गायत्री आज काफी खुश हैं. वह कहती हैं कि गांव में उन्हें काफी सम्मान मिलता है. कभी-कभी सड़क किनारे भी ई-पॉस मशीन से वित्तीय लेन-देन कर लेती हैं. वह आगे बढ़ना चाहती हैं और वित्तीय स्थिरता के लिए लोगों की मदद करना चाहती हैं.

सखी मंडल से ऋण लेकर गायत्री अपनी अन्य आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं. सखी मंडल के सदस्य जो पहले शराब बेच कर जीवन यापन करते थे, वे अब अन्य आजीविका (जैसे-मिक्चर बनाना, होटल चलाना और खेती करना ) से जीवन-यापन कर रही हैं. 

एक गांव, जहां कोई एटीएम नहीं है. गायत्री ने अपने माइक्रो एटीएम मशीन के माध्यम से गांव के हर घर को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ दिया है. गायत्री को उनके अच्छे काम को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी सम्मानित किया है. मुख्यमंत्री से एक मिनट की बातचीत में गायत्री ने ई-पॉस मशीन द्वारा किये जा रहे कार्य और इसके फायदे  साझा किये थे.

वर्तमान में लगभग 54 बीसी सखी काम कर रही हैं, जिनकी संख्या 1800 तक बढ़ाने की योजना है. यह कैशलेस इकोनॉमी की तरफ एक अभिनव कदम है. जेएसएलपीएस अब सखी मंडल की महिलाओं को प्रशिक्षित कर बीसी सखी के रूप में सुदूर इलाके में तैनात करने की तैयारी में हैं. इससे गरीब महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा और गांव के लोग खुद को आसानी से इससे जोड़ पायेंगे. आज गायत्री देवी ने बीसी सखी के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली है. गायत्री जैसी महिलाएं आज की आधुनिक महिलाओं की तसवीर बुनती हैं.

अब रविवार को भी मिल जाता है पैसा : प्रफुल्ल कंडुलना

केवल गायत्री ही नहीं, बल्कि उनके समुदाय के लोग भी काफी खुश हैं. 55 वर्षीय प्रफुल्ल कंडुलना, जो कि चल-फिर भी नहीं सकतीं, अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि इससे पहले वह पीडब्ल्यूडी पेंशन लेने के लिए चार महीने में एक बार बैंक जाती थीं. वह भी गाड़ी रिजर्व कर बैंक जाना पड़ता था. साथ जाने के लिए अपने भाई से आग्रह भी करना पड़ता था. इसके बावजूद बैंक जाने में वह सक्षम नहीं थीं, क्योंकि वह सीढ़ियों पर नहीं चढ़ पाती थीं. वह इंतजार करती रहती थीं और उनके भाई बैंक से पैसे निकाल कर लाते थे. हालांकि अब गायत्री की मदद से यह काम काफी आसान हो गया है. अब वह किसी भी समय बिना परेशान हुए रविवार को भी अपना पैसा ले लेती हैं.

बैंकों की भीड़ से बचा रहा है ई-पॉस मशीन : याकूब कंडुलना

याकूब कंडुलना कहती हैं कि ई-पॉस मशीन एक जादुई मशीन है. इससे काफी राहत मिली है. इसने उन्हें बैंकों की भीड़ से बचा लिया है. कई बार भीड़ के कारण बैंकों से खाली हाथ लौटता था. गांव में केवल दो ही बैंक हैं, जो उनके घर से आठ किलोमीटर दूर है. उन्होंने कहा कि गायत्री ने उनका जीवन इतना आसान बना दिया है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.