aadhi aabadi

  • Nov 20 2017 12:02PM

दीदियां अब दूसरों को बना रहीं आत्मनिर्भर

दीदियां अब दूसरों को बना रहीं आत्मनिर्भर
सखी मंडल की दीदियां आज आत्मविश्वास से लबरेज हैं. कभी घर की देहरी लांघना उनके लिए मुश्किल था. आज वक्त के साथ कदमताल कर रही हैं. महिला समूह की बैठकों में भाग लेकर दूसरों को भी आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा रही हैं. पहले उनकी कोई अपनी पहचान नहीं थी. ये सखी मंडल का ही नतीजा है कि अब उनकी अपने-अपने क्षेत्रों में पहचान बनी है. वह आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं. स्मार्ट फोन मिलने से अब वह स्मार्ट काम करेंगी. इसकी खुशी उनके चेहरे पर साफ दिख रही है. एक समय था जब वह मामूली परेशानियों से घबरा जाती थीं, लेकिन आज उन्हें इसका सामना कर लेने का भरोसा है. रोजमर्रा की जिंदगी के लिए उन्हें अब किसी के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी नहीं रही. सखी मंडल ने उनके अंदर की ताकत और क्षमता को उभार कर उन्हें स्वावलंबी बना दिया है.
 
कभी दो जून की रोटी को तरसनेवाली गंगा मुंडाइन आज भरपेट भोजन कर रही है. गंगा को यह सब मिला है मिर्च की खेती करके. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण गंगा के पति मजदूरी करने के लिए दूसरे जगह पर चले गये. पति के जाने के बाद घर की स्थिति और खराब हो गयी. इसी बीच आजीविका सखी मंडल के बारे में जानकारी मिली. घर की माली हालत सुधारने को ध्यान में रख कर गंगा सखी मंडल से जुड़ गयीं. 

कनैली आजीविका सखी मंडल से जुड़ कर गंगा लगातार बैठकों में जा कर उसकी हर गतिविधियों को समझने लगी. इस दौरान सखी मंडल से पांच हजार रुपये का ऋण लिया. दूसरे के खेत को लीज पर लेकर गंगा ने मिर्ची की खेती शुरू की. धीरे-धीरे गंगा की मेहनत रंग लायी. मिर्ची का उत्पादन बेहतर हुआ और इससे गंगा की मुश्किलें भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी. गंगा कहती हैं कि आजीविका ने उसे खड़ा होने का सहारा दिया और इसी का नतीजा है कि आज परिवार की आर्थिक स्थिति पहले के मुकाबले बेहतर हुआ है.
 
ललिता बारला
जिला : खूंटी