aadhi aabadi

  • Apr 16 2018 4:14PM

अब बीएपी के रूप में अपनी सेवा देंगी अलका

अब बीएपी के रूप में अपनी सेवा देंगी अलका

 पंचायत: ठेठईटांगर

प्रखंड: ठेठईटांगर
जिला : सिमडेगा
पंचायतनामा डेस्क

सिमडेगा जिला अंतर्गत ठेठईटांगर पंचायत के गड़गड़बहार गांव की रहने वाली अलका देवी अपनी लगन और मेहनत से काफी आगे बढ़ चुकी हैं. समूह से जरिये वह अपनी आजीविका चला रही हैं. सेतु दीदी के तौर पर कार्यरत अलका को पदोन्नति मिली है. अब वह जेएसएलपीएस में बतौर बीएपी अपनी सेवाएं देंगी. जुनून और बुलुंद इरादों के कारण अलका ने न सिर्फ अपनी विशेष पहचान बनायी है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए मिसाल भी पेश की हैं.

आसान नहीं थी सफलता की राह
अलका के लिए बुक कीपर से बीएपी बनने तक का सफर इतना आसान नहीं था. रोहित सिंह से शादी होने के बाद वो ससुराल आ गयीं, लेकिन यहां से सुकून मिलने की बजाय परेशानियां शुरू हो गयीं. पति के पास कोई रोजगार नहीं था. ससुर की कमाई से ही पूरा घर का खर्च चलता था. इस कारण काफी परेशानी होती थी. हर छोटी-मोटी जरूरत के लिए अलका को अपने पति और ससुर पर निर्भर रहना पड़ता था, जिस कारण अलका को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. समय बीतता गया और अलका को एक बेटा हुआ. बेटा होने के बाद परिवार का खर्च बढ़ा, लेकिन आमदनी के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं था. वर्ष 2015 में महिला समूह से जुड़ी. समूह की गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति में कुछ हद तक सुधार होने लगा.

प्रकाश आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं अलका
अलका की महिला समूह से जुड़ने की कहानी थोड़ी अजीब है. वर्ष 2015 में एक दिन अलका के पति घर के पास ही रास्ते से गुजर रहे थे, तो उन्हें समूह में बैठी हुई कुछ महिलाएं दिखायी दीं. पूछताछ करने पर पता चला कि गांव की सक्रिय महिलाएं दूसरी महिलाओं को समूह बनाने का प्रशिक्षण दे रही थीं. जानकारी मिलने के बाद अलका के पति रोहित घर आये और अलका को महिला समूह के बारे में बताया. जानकारी मिलते ही अलका उस बैठक में गयी और समूह से जुड़ने के लाभ-हानि के बारे में जाना. पूरी संतुष्टि के बाद अलका प्रकाश आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गयीं.

समूह से जुड़ने के बाद शुरू हुआ नया सफर
अलका इंटरमीडिएट तक पढ़ी हैं और फिलहाल दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से स्नातक कर रही हैं. पढ़ी-लिखी होने के कारण समूह से जुड़ने के बाद अलका को बुक कीपर का काम मिला. बुक कीपर का काम करते हुए तीन महीने बीत गये. प्रकाश आजीविका स्वयं सहायता समूह में चक्रीय निधि के 15,000 रुपये आये. उन्होंने समूह से पांच हजार रुपये का लोन लिया और पति के लिए चाट और चाउमिन की दुकान खोली. धीरे-धीरे दुकान से आमदनी अच्छी होने लगी और छह महीने के अंदर ही अलका ने पूरा लोन चुका दिया. अब धीरे-धीरे अलका की जिंदगी पटरी पर आने लगी. बुक कीपर का काम करते हुए अलका गड़गड़बहार ग्राम संगठन की ग्राम संगठन सहायिका बन गयीं, जहां से हर महीने अलका को 500 रुपये मिलने लगे. अब अलका को एक साथ दोहरी खुशी मिली. एक तो पति को स्वरोजगार मिल गया, वहीं अलका के पास भी हर महीने कुछ राशि आने लगी.

पति की अचानक मौत से टूट गयी थीं अलका
अलका के परिवार में सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन मार्च 2016 में एक दिन अचानक अलका के पति को जॉन्डिस की बीमारी हुई. कई जगह इलाज भी कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और उनकी मौत हो गयी. पति की मौत से अलका पूरी तरह टूट चुकी थी. बच्चा छोटा होने के कारण वो दुकान में ध्यान नहीं दे पायीं और दुकान बंद हो गयी. एक महीने तक अपने काम से दूर हो गयीं. समूह की बैठकों में भी नहीं जाती थीं और बुक कीपर का काम भी छोड़ दी थीं. इस बुरे दौर में सखी मंडल की महिलाओं ने अलका का भरपूर सहयोग किया. महिलाओं ने समूह के माध्यम से एक मुट्ठी चावल योजना के तहत अलका को दस किलो चावल दिया और ग्राम संगठन की ओर से दो सौ रुपये भी दिये गये. जेएसएलपीएस के प्रखंड स्तर के कार्यकर्ताओं ने भी अलका का हौसला बढ़ाया. सास-ससुर ने भी अलका को बुरे दौर से निकालने में काफी सहयोग किया और उनका मनोबल बढ़ाया. सखी मंडल की महिलाओं और परिवार के सहयोग के कारण ही अलका इस सदमे से उबर पायीं और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ीं.

एक बार फिर शुरू हुआ सफर
परिवार और सखी मंडल की महिलाओं द्वारा हौसला बढ़ाने से अलका एक बार फिर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो गयीं. दोबारा अपने काम में लग गयीं. बुक कीपर का काम करते-करते अलका को काफी अनुभव हो गया था, इस कारण अब वो सीनियर बुक कीपर बन गयीं और अपने प्रखंड के गांवों में जाकर बुककीपिंग का प्रशिक्षण देने लगीं. एक दिन के प्रशिक्षण के लिए अलका को 300 रुपये मिलते थे. इसी तरह अलका ने 18 से 19 बैच को प्रशिक्षण दिया और करीब 35 हजार रुपये की कमाई की. इन पैसों में कुछ और पैसे मिला कर अलका अपने लिए एक स्कूटी खरीदीं. स्कूटी खरीदने से फायदा यह हुआ कि अलका को बाहर आने-जाने में आ रही समस्या से मुक्ति मिल गयी. अब अलका सेतु दीदी का काम करने लगीं. सेतु दीदी का काम करते हुए अलका ने समूह से 20 हजार रुपये का लोन लिया, वहीं सास-ससुर से भी कुछ पैसे लेकर एक ऑटो खरीद लिया. ऑटोरिक्शा से भी उन्हें अच्छी कमायी होने लगी. अब आर्थिक स्थिति सुधरने पर अलका अपने बेटे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगीं.

अलका ने बनायी खुद की पहचान
बुककीपिंग और सेतु दीदी का काम करते-करते पूरे क्षेत्र में अलका की एक अलग पहचान बन गयी. पूरे प्रखंड की महिला समूह की महिलाओं के बीच अलका की लगन और मेहनत की चर्चा होती है. पति को खोने के बाद, जो परिवार टूट चुका था उस परिवार में अलका अपनी मेहनत से खुशियों का रंग भर रही हैं. अलका की सफलता को देखकर आस-पास की महिलाएं भी प्रेरित हो रही हैं.

स्वास्थ्य और स्वच्छता पर जोर
सेतु दीदी का काम करते हुए अलका ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देती हैं. उन सरकारी योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुंचाने के लिए मदद भी करती हैं. अभी तक 169 महिलाओं को विधवा पेंशन का लाभ दिला चुकी हैं. 225 ग्रामीणों का सुरक्षा बीमा करा चुकी हैं. 50 परिवारों के लिए राशन कार्ड भी बनवायी है. लगभग 300 लोगों के आधार कार्ड में सुधार करवायी हैं और कई लोगों के आधार कार्ड बनाने में भी वह सहयोग की हैं. अलका स्वास्थ्य व स्वच्छता पर भी ग्रामीण महिलाओं को जागरूक करती हैं. शौचालय निर्माण में भी अलका ने अहम भागीदारी निभायी है. शौचालय निर्माण के दौरान उन्हें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा. कई लोग शौचालय निर्माण कराने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन आखिरकार उन्हें सफलता मिल गयी. पीको प्रोजेक्टर के जरिये महिलाओं को हाथ धोने के फायदे की जानकारी दी जाती है. गर्भवती महिलाओं के लिए भी खान-पान और सुरक्षित प्रसव के तरीकों को बताया जाता है. महिलाओं को आंगनबाड़ी से मिलने वाले फायदे, उनके अधिकार को भी सेतु दीदी बताती हैं. नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी महिलाओं को देती हैं. स्तनपान के साथ ऊपरी आहार कब देना चाहिए और क्या-क्या देना चाहिए, इसके बारे में भी महिलाओं को जागरूक किया जाता है. महिलाओं को दी जा रही जानकारी का असर भी हुआ है. प्रखंड क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की हालत में काफी सुधार हुआ है.