aamukh katha

  • Mar 15 2018 4:45PM

दो साल में 1008 मासूम लापता

दो साल में 1008 मासूम लापता

 झारखंड में मानव तस्करी से जुड़े मामले आये दिन आते रहते हैं. यही कारण है कि पिछले दो साल में राज्य से करीब एक हजार से अधिक लड़के-लड़कियां मानव तस्कर के चंगुल में फंस चुके हैं. छोटी-छोटी बच्चियों की तस्करी सबसे अधिक हो रही है. इसका मुख्य कारण है गांव की गरीबी. आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण गांवों में सक्रिय मानव तस्कर (दलाल) इसका फायदा उठाते हैं. महानगरों की चकाचौंध दिखा कर या रोजी-रोजगार का लालच देकर गांव की बच्चियों को अपने चंगुल में फंसाते हैं और फिर उन्हें बेच देते हैं. भले ही सरकार मानव तस्करों को सलाखों के पीछे भेजने का प्रयास करती है, लेकिन इनका नेटवर्क इतना मजबूत होता है कि मानव तस्करी का धंधा जारी रहता है. जब तक राज्य में शिक्षा-रोजगार के गंभीर प्रयास नहीं होंगे, तब तक मानव तस्करी पर रोक संभव नहीं है. मानव तस्कर रणनीति के तहत पहले से प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर अब नये इलाके संताल व कोल्हान क्षेत्र को टारगेट कर रहे हैं. यहां से बड़ी संख्या में नाबालिग लड़कियां ट्रैफिकिंग की शिकार हो रही हैं. आमुख कथा के इस अंक में मानव तस्करी का इतिहास, हकीकत, प्रभावित क्षेत्र, वर्तमान स्थिति, जागरूकता व समाधान के जरिये आईना दिखाने की कोशिश की गयी है. पढ़िए समीर रंजन का यह आलेख.

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खूंटी जिले की रहनेवाली मोना कुमारी (काल्पनिक नाम) के चेहरे पर सुकून था. काफी समय बाद वह अपने घर वापस लौटी थी. घर की माली हालत खराब होने के कारण मोना मानव तस्करों के चंगुल में फंसी और उसके बाद उसके साथ वो हुआ, उसकी कल्पना कर ही मोना सिहर उठती है. गांव की ही लड़की (मानव तस्कर) ने मोना को दिल्ली में नौकरी का लालच दिया था. घर की माली हालत को देख मोना ने प्रस्ताव स्वीकारा. दिल्ली पहुंचते ही मोना को दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में एक घर में नौकरानी का काम मिल गया. मोना बताती है कि कई महीने हो गये, लेकिन घर मालिक ने कोई पैसा नहीं दिया. पहले की अपेक्षा अधिक काम कराया जाता था. घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता था यानी गांव में चहकनेवाली मोना दिल्ली में कैद हो गयी थी. इसी बची खूंटी से मोना के गायब होने की जानकारी एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट और महिलाओं के हितों में काम करनेवाली संस्था शक्तिवाहिनी को मिली. सभी के द्वारा अपने-अपने स्तर से छानबीन शुरू की गयी. खूंटी की मानव तस्करी रोधी टीम ने एक दलाल को गिरफ्तार किया और फिर उसके माध्यम से पुलिस मोना तक पहुंची और उसे अपने घर पहुंचाया, हालांकि मोना जैसी आज भी हजारों लड़कियां हैं, जो रोजी-रोजगार और महानगरों की चकाचौंध में फंस कर अपना सब कुछ गंवा चुकी हैं. देश में मानव और बाल तस्करी के खिलाफ कठोर कानून हैं, इसके बावजूद इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है. आये दिन किशोर-किशोरियों व महिलाओं की ट्रैफिकिंग की शिकार होने की खबरें मिलती रहती हैं. झारखंड, बिहार, बंगाल, ओड़िशा और असम जैसे राज्यों में मानव तस्करी के मामले अधिक देखने को मिलते हैं. इसका मुख्य कारण गरीबी और जागरूकता की कमी है. नौकरी, पैसा और बेहतर जिंदगी का लालच देकर इन्हें दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में भेज दिया जाता है, जहां इनसे ज्यादातर बड़े घरों में काम करवाया जाता है. कुछ ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें लड़कियों के साथ शारीरिक शोषण होता है, तो कई नाबालिग लड़कियों को शादी की आड़ में बेच दिया जाता है

आजादी के पहले से ही होता रहा है पलायन

झारखंड में रहनेवाले सदान व आदिवासी समुदाय के लोग काफी मेहनती व ईमानदार होते हैं. 12 अगस्त, 1765 को जब अंग्रेजों ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में कुलियों को काम करते देखा, तो काफी प्रभावित हुए. कुलियों के माध्यम से अंग्रेजों ने झारखंड की सीमा में प्रवेश किया. अंग्रेजों ने यहां के लोगों को काफी मेहनती व ईमानदार पाया. यहां के लोगों में हर काम के प्रति प्रतिबद्ध रहने की मंशा से अंग्रेज काफी प्रभावित हुए. इसी बीच असम व पश्चिम बंगाल की चाय बगानों में मजदूरों की जरूरत हुई. 1830-50 के बीच अंग्रेजों ने यहां के लोगों को उस काम के लिए काफी उपयुक्त पाया और फिर यहीं से शुरू हुआ मानव तस्करी का खेल. उस समय नौकरी व पैसे का लालच देकर अंग्रेज असम व पश्चिमी बंगाल की चाय बगानों में उन्हें काम कराने ले गये, जो धीरे-धीरे वृहत रूप लेने लगा और अब मानव तस्करी गांव-समाज के लिए नासूर बन गया. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सेल्यूलर जेल के निर्माण में भी यहां के लोगों को लगाया गया. मॉरीशस में भी गन्ने की खेती में काम करने के लिए यहां के मजदूरों को ले जाया गया. वर्तमान में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड की आबादी 32.96 मिलियन है. इसमें पुरुषों की संख्या 16.93 मिलियन और महिलाओं की संख्या 16.03 मिलियन है. यहां की कुल आबादी के 28 फीसदी लोग जनजाति और 12 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं

मानव तस्करी का आंकड़ा
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सदन में बताया कि 2016 में मानव तस्करी के 19,223 मामले दर्ज किये गये, जो साल 2015 में 15,448 थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ये मामले साल 2015 की तुलना में 25 फीसदी बढ़े हैं. अगर झारखंड की बात करें, तो पिछले साल मानव तस्करी के मामलों में बढ़ोतरी ही हुई है, हालांकि वर्ष 2016 में वर्ष 2015 की तुलना में कुछ कमी देखी गयी है. ये तो आंकड़े हैं, जो थानों तक पहुंचे. वैसे कई मामले आज भी हैं, जो थाने तक पहुंच ही नहीं पाते और आज भी गांव के बच्चे-बच्चियां या महिलाएं मानव तस्करी का दंश झेल रही हैं.

राज्य के 10 जिले सबसे अधिक प्रभावित
राज्य के 10 जिले पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, गुमला, गढ़वा, सिमडेगा, लातेहार, गोड्डा, साहेबगंज, लोहरदगा तथा रांची के ग्रामीण क्षेत्र की युवतियां दलालों के झांसे में आकर मानव तस्करी के दलदल में फंस जाती हैं. दलाल युवतियों को रोजगार और महानगरों की चकाचौंध दिखा कर अपने चंगुल में फंसा लेते हैं. अब छोटी बच्चियों की संख्या में अधिक इजाफा हो गया है

लापता बच्चों की स्थिति
पिछले दो साल में झारखंड से करीब 1008 बच्चे-बच्चियों के लापता होने की सूचना राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो में दर्ज है.
1. 18 साल से कम उम्र के बच्चे
वर्ष बच्चे बच्चियां कुल
2015 274 255 529
2016 219 260 479

झारखंड में वर्षवार मानव तस्करी के दर्ज मामले
वर्ष मामला दर्ज
2006 07
2007 10
2008 11
2009 26
2010 25
2011 44
2012 83
2013 96
2014 147
2015 172
2016 109