aamukh katha

  • Sep 2 2019 3:39PM

टानाभगतों की गांधीगीरी में आज भी जिंदा हैं बापू

टानाभगतों की गांधीगीरी में आज भी जिंदा हैं बापू


!! गुरुस्वरूप मिश्रा !! 
                 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं
, लेकिन झारखंड के टानाभगतों की गांधीगीरी में बापू आज भी जिंदा हैं. झूठ-फरेब और अपराध की बुनियाद पर सपनों का साम्राज्य खड़ा करने की होड़ के दौर में भी सत्य-अहिंसा के पुजारी टानाभगतों में आज भी महात्मा गांधी का दर्शन होता है. महात्मा नहीं मरते. झारखंड में इसे जीवंत कर रहे हैं गांधी के अनन्य भक्त टानाभगत.

आपने महात्मा गांधी को देखा है? आप कहेंगे- नहीं, लेकिन बापू को आप आज भी देख सकते हैं. झारखंड के गांव-जवारों में रहने वाले प्रकृति के पुजारी टानाभगतों की गांधीगीरी में आपको महात्मा गांधी दिख जायेंगे. वक्त बदला. सियासत बदली, लेकिन नहीं बदले तो टानाभगत. दुनिया में ये इकलौता समुदाय है, जो तमाम दुश्वारियों के बावजूद गांधी को जी रहा है. यकीन मानिये, इनसे मिलकर आपके जीने का नजरिया ही बदल जायेगा.

गरीबी पर भारी गांधीगीरी
खादी का सफेद कुर्ता, धोती (पायजामा) और सिर पर टोपी लगाये जनेऊधारी टानाभगतों को आप देखते ही पहचान जायेंगे. शाकाहारी टानाभगत दूसरे के हाथ का बना खाना व पानी नहीं पीते. बाहर में चाय तक नहीं पीते. खुद का बनाया भोजन ही उन्हें प्रिय है. हिन्दुस्तान का यह इकलौता समुदाय है, जो रोजाना सुबह और शाम भोजन करने से पहले तिरंगे की पूजा करता है. आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले टानाभगतों के वंशज आज दुर्दिन में हैं. बुनियादी जरूरतों के लिए भी तरस रहे हैं. इसके बावजूद उन्होंने कभी हिंसा का रास्ता अख्तियार नहीं किया. सादा और संयमित जीवन जीनेवाले टानाभगत आज भी गांधीगीरी (धरना, प्रदर्शन व भूख हड़ताल) से ही अपने हक-अधिकार की आवाज बुलंद करते हैं.

उपवास व स्वच्छता से शुद्धि
उरांव, खड़िया और मुंडा जाति के टानाभगत अपने पारंपरिक त्योहारों में भेइर व घंटी बजा कर धर्मेश की आराधना करते हैं. स्वच्छता व शुद्धता को लेकर साल में तीन बार वे पारंपरिक त्योहार नौहंडी मनाते हैं. इस दौरान पूरे घर की साफ-सफाई और उपवास कर पूजा-पाठ किया जाता है. शुद्धिकरण को लेकर हर टानाभगत परिवार में इसका आयोजन होता है.

आराध्य हैं जतरा टानाभगत
आंगन में तुलसी का पौधा और लंबे बांस में लिपटा तिरंगा सालोंभर फहरता दिखे, तो समझिए टानाभगत का घर है. गांधी जी के झारखंड आने से पहले ही टानाभगत आंदोलन के सूत्रधार गुमला के जतरा टानाभगत ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अहिंसक आंदोलन किया था. मांस, दारू, हड़िया छोड़ अंग्रेजों को मालगुजारी नहीं देने का आह्वान किया था. आज भी टानाभगत इन्हें पूजते हैं.

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मुफलिसी में भी गांधीगीरी
टानाभगत खेती-बारी से ही अपनी आजीविका चलाते हैं. खेत हैं, लेकिन सिंचाई के अभाव में अच्छी उपज नहीं होती. अधिकतर की आर्थिक स्थिति दयनीय है. मिट्टी के मकान में बुनियादी जरूरतों के लिए भी कड़ी मशक्कत करते हैं, लेकिन गांधीगीरी अब तक नहीं छोड़ी. इनकी सादगी पर आप मोहित हो जायेंगे.

गुमला में अधिक व सिमडेगा में सबसे कम हैं टानाभगत
राज्य के आठ जिलों में ही टानाभगत हैं, जहां 3,283 परिवार निवास करते हैं. इनकी आबादी 20,518 है.

जिला
                                     परिवार                           जनसंख्या
गुमला                                      924                              5449 
रांची                                       759                              4989
लातेहार                                   649                              4148
लोहरदगा                                 603                               3731
चतरा                                     210                               1422
खूंटी                                        94                                560
पलामू                                      23                                 111
सिमडेगा                                  21                                  108
कुल                                     3,283                               20,518


अशिक्षा पर भारी जीवन दर्शन
शाकाहारी टानाभगतों में अशिक्षा की जड़ें काफी गहरी हैं. ढूंढने से मैट्रिक पास मिलेंगे. इनमें जागरूकता का अभाव है. इसके बावजूद इनका जीवन दर्शन प्रेरणा देता है. इनकी दिनचर्या सबक है. शैक्षणिक विकास के लिए टानाभगत आवासीय विद्यालय खोले गये थे, लेकिन अब ये अनुसूचित जनजाति विद्यालय के रूप में चल रहे हैं. टाना लिपि भी इतिहास बनने की कगार पर है.

तस्वीर बदलने की कवायद
झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय में सर्टिफिकेट कोर्स इन पुलिस साइंस में 42 छात्र एवं 18 छात्राओं यानी कुल 60 टानाभगत विद्यार्थियों का नामांकन हो रहा है. यहां इनके रहने-खाने की नि:शुल्क व्यवस्था है. धीरे-धीरे तस्वीर बदल रही है.

चुनौती है नयी पीढ़ी
दो अक्तूबर 2019 को देश बापू की 150वीं जयंती मनायेगा. झारखंड में बापू की चर्चा टानाभगतों के बिना अधूरी है. चार जून 1917 को बापू पहली बार झारखंड आये थे. रांची में कई स्थानों का भ्रमण किया. टानाभगत जब उनसे मिले, तो उनके ही होकर रह गये. स्याह हकीकत ये है कि वर्षों बाद भी आश्रम व गांधी से जुड़ी यादें संरक्षित नहीं की गयीं. अतिक्रमित व उपेक्षित स्थलों पर वह आज भी गांधी को याद करते हैं, लेकिन आधुनिकता के रंग में रंगी नयी पीढ़ी को चरखा और गांधी से जोड़े रखने की चुनौती है.

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सर्वांगीण विकास के लिए प्राधिकार
टानाभगतों के सर्वांगीण विकास को लेकर एक मई 2017 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में झारखंड टानाभगत विकास प्राधिकार का गठन किया गया. पांच टानाभगत (गुमला से एक, पलामू से एक, लोहरदगा से दो और रांची से एक) सदस्य बनाये गये हैं. वर्ष 2017-18 में विकास कार्यों के लिए करीब 6.78 करोड़ रुपये विभिन्न जिलों को आवंटित हुए थे.

उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों की आर्थिक मदद की गयी है.

जिला
                         विद्यार्थियों की संख्या
सिमडेगा                            02
चतरा                               15
खूंटी                                 36

आंकड़ा
641
टानाभगतों को शत प्रतिशत अनुदान पर चार-चार दुधारू गाय के लिए करीब 11 करोड़ रुपये जिलों को दिये गये हैं

335 टानाभगतों को वैज्ञानिक पद्धति से दूध उत्पादन का प्रशिक्षण मिला

99 टानाभगतों को कौशल विकास के तहत प्रशिक्षण दिया गया

चतरा से 275 व रांची से 41 महिलाओं को कंबल निर्माण का प्रशिक्षण मिला

643 को प्रधानमंत्री आवास योजना (दो कमरों के साथ एक अतिरिक्त कमरा) की स्वीकृति

रांची के हेहल अंचल के बनहोरा में अतिथि गृह का निर्माण

रांची के बेड़ो में हर साल 30 अगस्त को होनेवाला टानाभगत राज्यस्तरीय महासम्मेलन अब राजकीय समारोह

अध्यक्ष टानाभगत हो, तो तेजी से होगा बदलाव : गंगा टानाभगत
रांची की मांडर विधानसभा से कांग्रेस के विधायक (1985-90) रह चुके गंगा टानाभगत प्राधिकार के सदस्य हैं. कहते हैं कि प्राधिकार का अध्यक्ष टानाभगत समुदाय से हो, तो तेजी से बदलाव के कार्य होंगे. दो वर्षों में प्राधिकार की तीन बैठक हुई है, जिसमें कई अहम निर्णय लिये गये हैं. धीरे-धीरे टानाभगतों की तस्वीर बदलेगी.

संघर्ष के बाद जमीन लगानमुक्त : झिरगा टानाभगत
अखिल भारतीय टानाभगत संघ के अध्यक्ष झिरगा टानाभगत कहते हैं कि1956 से बकाया 61.63 लाख की लगान सरकार ने 62 साल बाद माफ कर दी और लगान के रूप में 1 रुपये टोकन रख दिया. अनशन के बाद रघुवर सरकार ने टानाभगतों की जमीन बेलगान कर दी है. अब जमीन से जुड़े अन्य लंबित मामले जल्द निपटाये जायें.

जरूरी है स्वावलंबी बनाना : डॉ सुनीता
टानाभगतों की आवाज बुलंद कर रहीं डॉ सुनीता कहती हैं कि गांधी के परम भक्त टानाभगतों की नयी पीढ़ी को चरखा, खादी और गांधी से जोड़े रखने के लिए हुनर से स्वावलंबी बनाना जरूरी है. टाना लिपि का संरक्षण हो. घरों से गायब होते चरखे और खादी के कपड़े से बढ़ती दूरी को पाटने की चुनौती है.
 
टानाभगतों की खुशहाली हमारा लक्ष्य : रघुवर दास
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि टानाभगतों की खुशहाली हमारा लक्ष्य है. इनके सर्वांगीण विकास के लिए झारखंड टानाभगत विकास प्राधिकार का गठन किया है. वर्षों की लगान माफ कर दी. सरकारी योजनाओं का लाभ देकर इनके चेहरे पर मुस्कुराहट लानी है. झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय के जरिये इनकी तरक्की के द्वार खुलेंगे.