aamukh katha

  • Mar 6 2018 1:24PM

सगुन सुपाड़ी नृत्य : 11 घड़े को सिर पर रख नृत्य करती हैं बिजौली

सगुन सुपाड़ी नृत्य : 11 घड़े को सिर पर रख नृत्य करती हैं बिजौली


जिला : पूर्वी सिंहभूम
दशमत सोरेन

सर पर 11 पीतल के घड़े रख कर पारंपरिक गीत-संगीत की लय व ताल पर नृत्य करने में बिजोली मुर्मू को महारत हासिल है. पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के सालबनी आसमान चौक की रहनेवाली 35 वर्षीया बिजोली झारखंड, बिहार, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं. अपनी अनोखी नृत्य शैली, जिसका नाम सगुन सुपाड़ी है, कि वजह से बड़े कलाकारों में उनका नाम शुमार हो गया है.

पारंपरिक गीतों में नये अंदाज में पेश कर रही हैं नृत्य
बिजोली बताती हैं कि पारंपरिक नृत्य से लगाव व सृजनात्मक सोच के कारण उन्होंने अपनी प्रस्तुति के अंदाज में थोड़ा बदलाव किया. आदिवासी संताल समुदाय के पारंपरिक दोंग व लांगड़े नृत्य की थीम पर उन्होंने नया नृत्य तैयार किया, जिसका नाम सगुन सुपाड़ी है. हालांकि, सदियों से चली आ रही परंपरा को मजबूती देने का काम किया. सर पर 11 पीतल के घड़े रख कर नृत्य करना आसान नहीं है. इसके लिए वह लंबे समय तक अभ्यास करने के कारण वह आसानी से नृत्य कर लेती हैं. वह कहती हैं कि यह नृत्य दिन में एक ही बार किया जा सकता है, क्योंकि 11 पीतल के घड़े का वजन लगभग 27 किलो होता है. खाली सिर पर रखकर नृत्य करना होता है. ऐसे में लंबे समय तक सिर पर इन पात्रों को रखने से दर्द होने लगता है. यह काफी जोखिम भरा व कठिन नृत्य है.

स्टेट फुटबॉलर रह चुकी हैं बिजोली
बिजोली बताती हैं कि बचपन में उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था. परिवारवालों की सहमति से फुटबॉल खेलना शुरू किया. उन्होंने कई राज्य स्तरीय मैच भी खेले हैं. कई जगहों पर उन्हें बेस्ट स्कोरर का पुरस्कार मिला है, लेकिन फुटबॉल में करियर का विकल्प नहीं मिलने से वर्ष 2014 से खेलना बंद कर दिया.

परिवार का मिला भरपूर सहयोग
खेल के अलावा पारंपरिक गीत-संगीत व नृत्य से बिजोली का विशेष लगाव रहा. नृत्य व गीत-संगीत में आगे बढ़ने में पति जमादार मुर्मू और दो बच्चे सागर मुर्मू व परिमल मुर्मू का भरपूर सहयोग मिला. परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए वह नृत्य के क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं.

पारंपरिक नृत्य को विलुप्त होने से बचाना है : बिजोली मुर्मू
बिजोली मुर्मू कहती हैं कि आदिवासी लोकनृत्य पुरातन व पारंपरिक लोकसंस्कृति का हिस्सा हैं. शादी के समय दोंग नृत्य व सामान्य दिनों में थकान दूर करने के लिए लांगड़े नृत्य किया जाता है. मान्यता है कि यह लोक नृत्य 2000 वर्ष से भी अधिक पुराना है. इस नृत्य को विलुप्त होने से बचाना है, ताकि नयी पीढ़ी इसे जान सके.