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  • Jan 17 2019 2:23PM

बेटियां बन रहीं स्वावलंबी

बेटियां बन रहीं स्वावलंबी

समीर रंजन

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मुख्यमंत्री सुकन्या योजना, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी कई योजनाएं हैं, जो राज्य की बेटियों को स्वावलंबी बनाने में अहम भूमिका निभाने को अग्रसर हैं. बेटियां बढ़ेंगी, तो समाज व राज्य बढ़ेगा. शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, बाल विवाह की रोकथाम, मानव तस्करी जैसे गंभीर मसले पर लगाम लग सकता है. इसके लिए हर क्षेत्र में बालिकाओं को प्रोत्साहित करना जरूरी है. तीरंदाजी में दीपिका कुमारी व मधुमिता, हॉकी में निक्की प्रधान, सलीमा टेटे, संगीता कुमारी, शिक्षा में लांगो गांव की पहली ग्रेजुएट बालिका माधवी, स्वच्छता की ब्रांड एंबेसडर पुनिया ढोढराय जैसी कई लड़कियां हैं, जो राज्य का नाम रोशन कर रही हैं. आमुख कथा में बालिकाओं की स्थिति, योजनाएं, समस्याएं व उसके निदान पर आधारित है.  

24 जनवरी. राष्ट्रीय बालिका दिवस. हर साल इस तारीख को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है, ताकि लड़कियों के बारे में लोगों में व्याप्त भ्रांतियां दूर हों, जागरूकता फैले और सबसे महत्वपूर्ण कन्या भ्रूण हत्या पर पूरी तरह से पाबंदी लग सके. साथ ही शिक्षा में असमानता, पोषण, कानूनी अधिकार, स्वास्थ्य लाभ, सुरक्षा, सम्मान, बाल विवाह आदि में बालिकाओं को असमानता का शिकार न होना पड़े. राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई.

बालिकाओं के लिंगानुपात (शून्य से छह साल) में आयी कमी
लिंगानुपात की बात करें, तो झारखंड में लिंगानुपात की स्थिति बेहतर नहीं कही जा सकती. शून्य से छह साल की बालिकाओं की संख्या 2001 की जनगणना के मुताबिक प्रति हजार बालकों में 965 थी, वहीं 2011 की जनगणना में बालिकाओं की संख्या 948 तक ही पहुंच पायी. जनगणना 2001 से 2011 के बीच लिंगानुपात परिवर्तन में 17 की कमी आयी है. महिलाओं की बात करें, तो 2001 की जनगणना में महिलाओं की संख्या 941 थी, वहीं 2011 की जनगणना में यह संख्या 947 पहुंच गयी. 2001 से 2011 की जनगणना के बीच लिंगानुपात परिवर्तन में छह की बढ़ोतरी हुई.

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राष्ट्रीय बालिका शिशु दिवस का थीम
वर्ष 2017 में राष्ट्रीय बालिका शिशु दिवस के लिए थीम रखा गया बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ. वहीं वर्ष 2018 में इसका थीम रखा गया एक लड़की एक फूल है, कांटा नहीं.

कुपोषण के शिकार होते बच्चे
राज्य में कुपोषण एक गंभीर समस्या है. राज्य में पांच लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं. हर मां को लगता है कि उसका बच्चा स्वस्थ है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अगर किसी बच्चे का अपर आर्म की लंबाई 11.5 सेंटीमीटर से कम है, तो उसे अति कुपोषित कहा जायेगा. अपर आर्म की लंबाई 13 सेंटीमीटर होने पर बच्चा मध्यम रूप से कुपोषित होगा. वहीं अगर दोनों पांव में सूजन हो, तो भी बच्चा अति कुपोषण के अंतर्गत आयेगा. बाल के रंग में परिवर्तन, त्वचा का अति ढीला होना, इन सभी स्थितियों में बच्चा कुपोषण का शिकार होता है. इसके कई कारण भी हैं. इसके तहत कम उम्र में शादी होना, कम उम्र में ही मां बनना, मां द्वारा गर्भधारण के मानकों का पालन नहीं करना, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद मां द्वारा स्तनपान नहीं कराना, मां द्वारा अपने बच्चे को छह महीने तक अपना दूध पिलाया गया या नहीं, छह महीने से खाना देना शुरू किया या नहीं आदि. ये सभी कुपोषण से ग्रसित होने का कारण माना जा सकता है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-तीन के आंकड़ों के मुताबिक 67 फीसदी लड़कियां एनेमिक हैं. सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक, वर्ष 2016 में 27 लड़कों के मुकाबले 31 लड़कियों की मृत्यु शिशु की अवस्था में ही हो जाती है. रेपिड सर्वे ऑफ चिल्ड्रेन 2013-14 के आंकड़ों के मुताबिक, 49.9 फीसदी बच्चियों का शारीरिक विकास सामान्य से कम हुआ और 44.7 फीसदी लड़कों का शारीरिक विकास कम हुआ.

स्कूल जाने को प्रेरित करता आंगनबाड़ी केंद्र
राज्य के बच्चे-बच्चियों को स्कूल जाने को प्रेरित करने व उसमें खेलने-कूदने के प्रति उत्सुकता बढ़ाने में आंगनबाड़ी केंद्र महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. राज्य में 38,432 आंगनबाड़ी केंद्र हैं. इस केंद्र में छह माह से छह साल के बच्चे-बच्चियों को शिक्षा के प्रति लगाव बढ़ाने को प्रेरित किया जाता है. राज्य में शून्य से छह साल की बच्चियों की संख्या 631,301 है. छह माह से तीन साल की बात करें, तो 180,236 बच्चियों को आंगनबाड़ी केंद्र का लाभ मिल रहा है, वहीं तीन साल से छह साल की 451,065 बच्चियां इसका लाभ उठा रही हैं.

बाल विवाह में आयी कमी
बालिकाओं को सशक्त करने में बाल विवाह रोड़ा बनता आया है. बच्ची बालिग होती नहीं है कि उसके पहले ही उसके परिजन उसका विवाह कर देते हैं. इससे न तो बालिका परिपक्व हो पाती है और न ही उससे उत्पन्न बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर हो पाता है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2005-06 के मुताबिक, बाल विवाह के 44.7 फीसदी मामले सामने आये थे, लेकिन 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक, बाल विवाह के मामलों में 50 फीसदी से भी अधिक की कमी आयी है और आंकड़ा 17.8 फीसदी तक जा पहुंचा है. यह सब हुआ जागरूकता के कारण, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक, 15-19 वर्ष के आयु वर्ग की 11.9 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले ही कर दी जाती है. शहरी क्षेत्रों में बाल विवाह की दर 11.9 और ग्रामीण क्षेत्रों में 88.1 फीसदी है.

पांच जिलों में बाल विवाह के मामले अधिक
राज्य के पांच जिलों में बाल विवाह के मामले अधिक सामने आये हैं. इन जिलों में देवघर, गिरिडीह, गोड्डा, कोडरमा और पलामू के ग्रामीण क्षेत्र मुख्य हैं. इन पांच जिलों में बाल विवाह उन्मूलन के प्रति सरकार को अधिक गंभीरता दिखानी होगी. साथ ही इसकी रोकथाम के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है. बाल विवाह से मातृत्व एवं शिशु मृत्यु दर में बढ़ोतरी होती है.

आज भी बच्चियां हो रही हैं मानव तस्करी की शिकार
राज्य में मानव तस्करी से जुड़े मामले आये दिन आते रहते हैं. छोटी-छोटी बच्चियों की तस्करी सबसे अधिक होती है. इसका मुख्य कारण है गांव की गरीबी. आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण गांवों में सक्रिय मानव तस्कर इसका फायदा उठाते हैं.

अब भी 52 बच्चियों का नहीं है कोई आता-पता
राज्य में वर्ष 2017 में कुल 255 नाबालिग के लापता होने का मामला दर्ज हुआ. इनमें 107 बच्चे और 148 बच्चियां थीं. विभिन्न थानों में इनकी गुमशुदगी से संबंधित रिपोर्ट भी दर्ज करायी गयी थी, लेकिन पुलिस मात्र 164 लापता बच्चे और बच्चियों को ही बरामद कर पायी है. 91 बच्चे व बच्चियों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है. इनमें 39 बच्चे और 52 बच्चियां शामिल हैं. आशंका जतायी जा रही है कि इनमें से अधिकतर बच्चे ह्यूमन ट्रैफिकिंग के शिकार हुए हैं.

राज्य के 10 जिले सबसे अधिक प्रभावित
राज्य के 10 जिले पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, गुमला, गढ़वा, सिमडेगा, लातेहार, गोड्डा, साहेबगंज, लोहरदगा तथा रांची के ग्रामीण क्षेत्र की युवतियां दलालों के झांसे में आकर मानव तस्करी के दलदल में फंस जाती हैं. अब छोटी बच्चियों की संख्या में अधिक इजाफा हो गया है.

हर क्षेत्र में बालिकाओं ने लहराया परचम : रघुवर दास
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि वर्तमान में चाहे शिक्षा की बात हो या खेलकूद की या अन्य किसी भी क्षेत्र की, सभी क्षेत्रों में बालिकाओं ने अपना परचम लहराया है. राज्य की कई ऐसी बालिकाएं हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में राज्य का नाम रोशन कर रही हैं. अभिभावकों से अपील है कि लड़कियों की परवरिश लड़कों की ही तरह हो, तो अन्य लड़कियां भी आगे निकल सकती हैं.