aamukh katha

  • Sep 2 2019 3:56PM

बापू के सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ने वाले टानाभगत

बापू के सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ने वाले टानाभगत

पंचायतनामा टीम
प्रखंड: बेड़ो
जिला: रांची

बूढ़ा मन कइह रहैं, तोहिन पूरखा कर देखाल डहर में चलबा, देखबा एक दिन तोहरे मन के बाहरे से आदमी मने खोजते आबैं यानी उनके बुजुर्गों ने उनसे कहा था कि पूर्वजों के बताये रास्ते पर चलोगे, तो देखना एक दिन बाहर से लोग तुम्हें ढूंढते हुए आयेंगे. रांची जिले के बेड़ो प्रखंड अंतर्गत खक्सी टोली के सुका टानाभगत मुस्कुराते हुए ये बात कहते हैं. कहते हैं कि देखिए हमारे पूर्वजों की बात सच साबित हो रही है. आप हमें ढूंढते हुए सुबह-सुबह हमारे गांव पहुंच गये हैं. हम टानाभगत की यही शक्ति है. यह शक्ति ऐसे ही नहीं आती है. टानाभगत का जीवन एक तपस्या है. यह शक्ति हमें पूजा-पाठ और हमारे जीने के तरीके से आती है. टानाभगत आदिवासी समुदाय के हैं, लेकिन एक अलग पहचान के साथ अलग जिंदगी जीते हैं. उनका जीवन संयमित होता है. जिस सत्य और अहिंसा का पाठ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश को पढ़ाना चाहते थे, उसी सीख को टानाभगत आज भी आगे बढ़ा रहे हैं. आज यही उनकी पहचान है.

प्रार्थना से शुरू होती है दिनचर्या
बेड़ो प्रखंड की हरिहरपुर खक्सी टोली जंगलों से घिरा है. खेती योग्य जमीन है. बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है. टोली में टानाभगत के कुल 30 घर हैं. इनकी आबादी करीब 200 है. सभी टानाभगत आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं. इनकी दिनचर्या सुबह की प्रार्थना से शुरू होती है. सुबह उठ कर सबसे पहले प्रार्थना करते हुए आज का दिन देने के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं. कहते हैं कि आज का दिन मेरे और परिवारवालों के लिए शुभ हो. आज हमसे कोई पाप न हो. मैं कोई गलत काम नहीं करूं.

साफ-सफाई का विशेष ध्यान
सुबह उठ कर टानाभगत परिवार की महिलाएं अच्छे से घर की सफाई करती हैं. रसोई घर और चूल्हा की विशेष रूप से सफाई करती हैं. नहाने के बाद पूजा करके फिर नाश्ता और खाना बनाती हैं. अगर तबीयत खराब हो, तो इस नियम में थोड़ा बदलाव किया जाता है. प्रार्थना करने के बाद ही पुरुष वर्ग खेतों में काम करने जाते हैं. खेत से लौटने के बाद नहाते हैं, पूजा करते हैं, तब जाकर खाना खाते हैं. टानाभगत कहते हैं कि बिना नहाये वो खाना नहीं खाते हैं. साफ-सफाई की यह सीख उन्हें महात्मा गांधी से मिली है.

खान-पान का विशेष ध्यान
खान-पान के बारे में पूछने पर टानाभगत बताते हैं कि उनके धर्मगुरू जतरा टानाभगत ने एक गुरूमंत्र दिया था.

टान टून टाना, कासा पीतल मना
मांस-बट्टी मना, नशा पान मना
छुआ-छूत मना, रंगा-डंगा मना

टानाभगत इस नियम का पालन आज भी करते हैं. मंत्र के मुताबिक, इनके लिए पूजा-पाठ करना अनिवार्य है. प्रकृति के साथ रहना अनिवार्य है. कासा और पीतल के बर्तन में भोजन करना वर्जित है. मिट्टी या स्टील के बर्तन का इस्तेमाल कर सकते हैं. मांस और शराब का सेवन करना वर्जित है. छुआ-छूत की भावना मन में नहीं लाना है. रंगीन और तड़क-भड़क वाले कपड़े पहनना मना है. सिर्फ खादी के सफेद रंग के कपड़े पहनना है. इस मंत्र में भी टानाभगत के विचार और गांधी जी के विचार मिलते हैं. टानाभगत बताते हैं कि महात्मा गांधी की झारखंड यात्रा से पहले ही उनके पूर्वजों ने झारखंड में अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. जब गांधी जी झारखंड आये और टानाभगत से मिले, तो दोनों के विचार मेल खाये. तब जाकर टानाभगत गांधी जी के अनुयायी बन गये.

युवाओं पर आधुनिकता हावी
प्रत्येक बुधवार को गांव के धुमकुड़िया में टानाभगत बैठक करते हैं. भोजन की भी व्यवस्था होती है. देर रात तक बैठक चलती है. भजन-कीर्तन करते हैं. युवाओं को टानाभगत की जीवन शैली के बारे में विस्तार से बताते हैं, हालांकि युवाओं पर आधुनिकता हावी होती जा रही है. इससे कार्यक्रमों में इनकी भागीदारी कम होती जा रही है.

सरकारी सुविधाएं
खक्सी टोली में कुल 30 टानाभगत परिवारों में महज आठ को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला है. पांच घरों में शौचालय का निर्माण नहीं हुआ है. जिन घरों में शौचालय है, वो शौचालय का उपयोग करते हैं. वृद्धा पेंशन का लाभ भी टानाभगत को मिल रहा है, कुछ लोग छूटे हुए हैं. उज्ज्वला योजना का लाभ भी कुछ परिवारों को मिला है. बिजली की सुविधा मिल रही है. छात्र-छात्राओं को छात्रवृति मिल रही है.

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धीरे-धीरे बढ़ रहा शिक्षा का स्तर
टानाभगत समाज में शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अब समाज की बेटियां भी पढ़ाई कर रही हैं. हालांकि, गांव के बुजुर्ग पढ़े-लिखे नहीं हैं. टानाभगत परिवार का एक युवक सरकारी नौकरी (सेना) में है. एक अन्य युवक बीए की पढ़ाई पूरी कर चुका है. एक युवती बीकॉम पार्ट-1 में पढ़ाई कर रही है. टानाभगतों की मांग है कि उनके लिए ऐसा स्कूल खोला जाये, जहां टानाभगतों की संस्कृति की पढ़ाई हो. उनके तौर-तरीके सिखाये जायें, ताकि उनकी संस्कृति बची रहे

नयी पीढ़ी इस परंपरा को अपनाने से कतरा रही है : मंगरा टानाभगत

नयी पीढ़ी इस परंपरा को अपनाने से कतरा रही है. अभी हमारे दबाव में युवा इस अपना तो रहे हैं लेकिन आगे कब तक संभाल पायेंगे इसे देखना होगा. आधुनिकता समाज में हावी हो रही है. रोजी-रोजगार की तलाश में लोग बाहर निकल रहे हैं. अब परिवारों में भी बिखराव हो रहा है. बाहरी समाज में जाकर घर की रोजमर्रा की जिंदगी में नियमों का पालन करने में परेशानी होती है.

स्कूली शिक्षा में टानाभगत के कार्यों को शामिल करें : सुका टानाभगत
आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षा पूरी तरह अलग है. आजकल स्कूलों में सिर्फ किताबी ज्ञान पर ही जोर दिया जाता है. टानाभगत के बच्चे भी इसे सीखे, इससे कोई परहेज नहीं है, पर टानाभगत के बच्चों के लिए स्कूल में भी टानाभगत की पढ़ाई होनी चाहिए, ताकि बच्चों का झुकाव बचपन से ही इस ओर रहे. साथ ही स्कूलों में टानाभगत के बच्चों के लिए अलग से खाने की व्यवस्था होनी चाहिए.

हम प्रकृति के पूजक हैं : एतवा टानाभगत
प्रकृति हमें सब कुछ देती है. खाने के लिए अन्न, पीने के पानी और सांस लेने के लिए हवा. सूरज रोशनी देता है. इसलिए हम प्रकृति की पूजा करते हैं. महात्मा गांधी के विचारों को मानते हुए पूरी जिदंगी जीते हैं. टानाभगतों को बैठने के लिए एक भवन मुहैया कराये सरकार, ताकि विभिन्न मुद्दों पर आपस में विचार-विमर्श कर सकें.

पढ़ाई कर बेहतर करने की उम्मीद : रोशनी कुमारी
रोशनी कुमारी खक्सी टोली में बीकॉम पार्ट वन की पढ़ाई करने वाली इकलौती छात्रा है. वह बताती है कि शिक्षा से बड़ा बदलाव आ सकता है. इसलिए वो अच्छी तरह से पढ़ाई कर रही है. उसे प्रेरित होकर दूसरी लड़कियां भी पढ़ाई के लिए आगे आयेंगी. इससे समाज से अशिक्षा खत्म होगी और समाज जागरूक होगा.

टानाभगत की पहचान पर है गर्व : शंकर टानाभगत
टानाभगत की पहचान हमें विरासत में मिली है. इस पहचान को हमेशा हम अपने साथ रखेंगे. इंटर पास शंकर टानाभगत गांव में ही खेती-बारी करते हैं और मजदूरी करते हैं. बदलते दौर के साथ आगे बढ़ने के लिए हमें भी जमाने के साथ चलना होगा. इसमें हमारे नियम आड़े आते हैं. फिर भी हम अपनी पहचान को बनाये रखते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं.

पूर्वज के बताये रास्ते पर चलते हैं : पंची टानाभगत
पंची टानाभगत बताती हैं कि हमारे पूर्वजों ने हमें जो रास्ता दिखाया है, हम उसी राह पर आज भी चलते हैं. टानाभगतों के नियमों का सही तरीके से पालन करते हैं. हर सुबह हल्दी-पानी से घर को पवित्र करते हैं. खाना बनाने से पहले चूल्हा को साफ करते हैं.

शुरू में परेशानी थी, पर अब अच्छा लगता है : सुको टानाभगत
सुको टानाभगत गैर टानाभगत परिवार में पली-बढ़ी हैं. शादी होने के बाद टानाभगत के रीति-रिवाज अपनाने और सीखने में काफी परेशानी होती थी. जनेऊ का बंधन ठीक नहीं लगता था, पर अब आदत हो गयी है. अब यही अच्छा लगता है. सुबह उठ कर पूजा-पाठ करना दिनचर्या में शामिल है.

संयम रखना सिखाती है हमारी परंपरा : डहरी भगताइन
हम टानाभगत संयमित जीवन जीते हैं. बाहर का खाना खाने की मनाही रहती है. घर में ही बनाकर खाते हैं. इसलिए हमें संयमित रहना पड़ता है. हमारी परंपरा संयम रखना सिखाती है.

पूजा-पाठ से हमें शक्ति मिलती है : पोको भगताइन
हम रोज पूजा करते हैं. प्रकृति के करीब रहते हैं. इससे हमें शक्ति मिलती है. हमारे पूर्वज दो नियम बता कर गये हैं. उसका पालन करते हैं. हम चोरी-छुपे भी कुछ गलत काम नहीं करते हैं, क्योंकि दुनिया भले ही नहीं देखे, पर भगवान सबकुछ देखते हैं.