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  • Dec 31 2018 2:35PM

नये साल में साई धाम, घघारी धाम व वंशीधर मंदिर का कीजिए दर्शन

नये साल में साई धाम, घघारी धाम व वंशीधर मंदिर का कीजिए दर्शन

पवन कुमार 

नये साल में हर कोई हर्षोल्लास में रहना चाहता है. इसके लिए कोई ईश्वर की शरण में जाता है, तो कोई प्राकृतिक सौंदर्य का भरपूर लाभ उठाना चाहता है. राजधानी रांची भी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मशहूर है. घने जंगल, ऊंची पहाड़ी, चारों तरफ फैली हरियाली और कई जलप्रपात सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफी हैं. वैसे तो राजधानी रांची व उसके आसपास कई प्रसिद्ध मंदिर, गार्डेन व जलप्रपात हैं, लेकिन इस बार हम आपको लापुंग के साई मंदिर, देवगांव का घघारी धाम और हेंदेबिली का वंशीधर मंदिर का दर्शन कराते हैं, जहां आपको काफी शांति मिलेगी.

1. सुकून से साईनाथ का दर्शन करना हो, तो साई धाम आइए
ग्राम : सरसा
पंचायत : देवगांव
प्रखंड : लापुंग
जिला : रांची

रांची जिला अंतर्गत देवगांव पंचायत के सरसा ग्राम में स्थित है साई मंदिर. सरसा गांव की खूबसूरत वादियों में बसे साई मंदिर में सालोंभर श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं. गुरुवार और रविवार को यहां काफी भीड़ होती है. छह जनवरी, 23 अप्रैल और गुरु पूर्णिमा के मौके पर यहां विशेष कार्यक्रम का आयोजन होता है. 23 अप्रैल, 1994 को यहां साई धाम के निर्माण में स्थानीय रैयतों ने अपनी जमीन दी थी. मुख्य द्वार पर स्थित शिलापट्ट में जमीन दान करनेवालों के नाम लिखे हुए हैं. 35 एकड़ में फैले साई धाम की चारों तरफ शांति ही शांति मिलती है. मंदिर के आस-पास फूल के बगीचे और बागान हैं. बच्चों के खेलने के लिए झूले भी हैं. मुख्य मंदिर के अंदर साई बाबा की प्रतिमा है, जहां पूजा-अर्चना होती है. मंदिर के आसपास घास के मैदान हैं, जहां बैठ कर आप शांति महसूस कर सकते हैं.

साई धाम से बढ़ी गांव की अर्थव्यवस्था
मंदिर के बनने से सरसा गांव की अर्थव्यवस्था में काफी सुधार आया है. जिन स्थानीय रैयतों ने अपनी जमीन दी थी, वो मंदिर की देखरेख में शामिल हैं. इसके अलावा मंदिर के सामने कई स्थानीय लोगों ने पूजा सामग्री की दुकान खोली है. मंदिर के बाहर लगभग बीस लोग सब्जी बेचते हैं. बाहरी सैलानियों के संपर्क में आकर ग्रामीणों के रहन-सहन में काफी सुधार हुआ है. साई मंदिर में रात में रुकने की भी व्यवस्था है, लेकिन खाने-पीने की व्यवस्था खुद से करनी होगी, हालांकि मंदिर में रात में हर रोज खाना बनता है. रात में रुकने के लिए एक कमरे के लिए 300 रुपये देने होंगे.

रोजगार से जुड़ रहे हैं ग्रामीण : राजेंद्र राम
ग्रामीण राजेंद्र राम कहते हैं कि साई धाम के विकसित होने से सरसा गांव के ग्रामीणों के जीवन में काफी सुधार आया है. उन्हें रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं. गांव को एक अलग पहचान मिल रही है. हमारी कोशिश है कि मंदिर में आनेवाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं हो.

गांव में ही मिल गया रोजगार : पार्वती देवी
मंदिर के पास पूजा सामग्री की दुकान चलानेवाली पार्वती देवी कहती हैं कि मंदिर के बन जाने से सरसा गांव बेहतर पर्यटन स्थल के तौर पर खुद को स्थापित कर रहा है. हर रोज काफी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. इससे कमाई अच्छी हो जाती है.

कैसे पहुंचें साई धाम
रांची-गुमला मुख्य पथ पर स्थित बेड़ो प्रखंड मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है साई धाम. यहां पहुंचने के लिए सबसे पहले बेड़ो पहुंचना होगा. बेड़ो से जामटोली जानेवाले रास्ते में 12 किलोमीटर अंदर जाने के बाद सरसा गांव में प्रवेश करते ही मंदिर में जाने के लिए द्वार बना हुआ है. यहां से बायें मुड़ कर सीधे साई मंदिर पहुंच सकते हैं. रांची से बेड़ो की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है और वहां से साई मंदिर की दूरी लगभग 12 किलोमीटर है.

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2. पौराणिक कथाओं को समेटे आपका इंतजार कर रहा घघारी धाम
ग्राम : देवगांव
पंचायत : देवगांव
प्रखंड : लापुंग
जिला : रांची

लापुंग प्रखंड की देवगांव पंचायत में साई धाम के अलावा एक और दर्शनीय स्थल है घघारी धाम. यहां के हरे-भरे जंगल, छोटे पहाड़ और घघारी नदी का उद्गम स्थल सैलानियों को आकर्षित करता है. यहां देखने के लिए प्राचीन शिवलिंग है, जो तीन खंडों में बंटा हुआ है. इसके अलावा यहां हनुमान मंदिर और पार्वती माता का मंदिर भी है. अन्य दो मंदिरों का निर्माण कार्य यहां चल रहा है. बारिश के मौसम में यहां झरने से गिरता हुआ पानी काफी मनमोहक होता है. वैसे तो यहां पर श्रद्धालु सालों भर घूमने के लिए आते हैं, लेकिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन यहां मेला का आयोजन होता है. सावन महीने में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए काफी संख्या में यहां श्रद्धालु आते हैं. यहां एक गुफा भी है, जो देखने लायक है.

सभी मन्नतें पूरी करते हैं भोले शंकर : तुलसीदास गोस्वामी
घघारी धाम शिव मंदिर के पुजारी तुलसीदास गोस्वामी बताते हैं कि वो कई दशकों से यहां पूजा करते आ रहे हैं. उनसे पहले उनके पूर्वज यहां पूजा करते थे. इस मंदिर में आनेवाले श्रद्धालु यहां से संतुष्ट होकर जाते हैं. उनकी मन्नतें यहां पूरी होती हैं. इस जगह की खासियत है कि यहां शांति का अनुभव होता है. पास में ही एक जंगल है, जिसे रामपुर जंगल के नाम से जाना जाता है.

बरतें सावधानी
यहां आने के लिए सितंबर से लेकर फरवरी माह तक का महीना उपयुक्त माना जाता है. पिकनिक मनाने के लिए यह एक बेहतर जगह है, लेकिन ऊंचाई से पानी गिरने के कारण यहां का दृश्य काफी मनोरम लगता है. ऊंचाई से पानी गिरने के कारण नीचे काफी गहरा रहता है, इसलिए यहां नहाने से परहेज करें. खाने-पीने की काफी अच्छी व्यवस्था नहीं है. इसलिए अपना खाना खुद लेकर जायें. रात में ठहरने के लिए दो कमरे बने हैं, लेकिन सुविधाजनक नहीं है. पहाड़ और नदी होने के कारण यहां की जमीन काफी ऊंची-नीची है, इसलिए चलने-फिरने में सावधानी जरूर बरतें.

ऐसे पहुंचें घघारी धाम
यहां पहुंचने के लिए आपको रांची-गुमला मुख्य पथ होते हुए बेड़ो पहुंचना होगा. बेड़ो से 12 किलोमीटर दूर जामटोली जाने के रास्ते पर यह धाम मिलेगा.

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3. तीन तरफ से तालाबों से घिरा वंशीधर मंदिर
ग्राम : हेंदेबिली गढ़टोली
पंचायत : हेंदेबिली
प्रखंड : ओरमांझी
जिला : रांची

तीन तरफ से गहरा तालाब, दूर तक खेतों में फैली हरियाली, धुंधला-सा नजर आता पहाड़, तालाब के किनारे टापूनुमा बने टापू में करंज के ऊंचे-ऊंचे पेड़, इन सबके बीच अवस्थित है वंशीधर मंदिर. अदभुत प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ मन को असीम शांति प्रदान करता है. राजधानी रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड के हेंदेबिली गढ़टोली में यह मंदिर स्थित है. ग्रामीण संतोष महतो के अनुसार, इसे गढ़टोली इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पहले यहां एक गढ़ और पुराना मंदिर हुआ करता था. गढ़ के निशान आज भी यहां देखे जा सकते हैं. इस जगह का पौराणिक महत्व भी है. मंदिर के अंदर राधाकृष्ण, हनुमान की प्राचीन मूर्ति और एक शिवलिंग भी है. मंदिर के पास ही एक गुफा भी है, जिसे सुरक्षा कारणों से फिलहाल बंद कर दिया गया है. यहां पर असीम शांति का अनुभव होता है. फाल्गुन पंचमी के दिन यहां मेला का आयोजन किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में डोल जतरा कहा जाता है.

400 साल पुराना है मंदिर का इतिहास : जयकिशुन महतो
स्थानीय जयकिशुन महतो कहते हैं कि यह काफी प्राचीन मंदिर था, जो टूट कर गिर गया था. पूरा मंदिर पत्थरों से बना हुआ था. टूटने के बाद वर्ष 2013 में फिर से नये मंदिर का निर्माण किया गया है. मंदिर में सोने की मूर्तियां थीं, जो चोरी हो गयी है. इस मंदिर का इतिहास 400 साल से भी पुराना है. काफी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं.

बरतें सावधानी
अगर आप यहां घूमने आते हैं, तो इस बात का ख्याल रखें कि यहां पर खाने-पीने की व्यवस्था नहीं है. अपना खाना खुद से लेकर आएं. तालाब में नहाने का प्रयास नहीं करें, क्योंकि तालाब काफी गहरा है. अपना वाहन लेकर आयें, ताकि यातायात के लिए असुविधा का सामना नहीं करना पड़े. यहां पर स्थानीय लोग काफी सहयोग करते हैं.