aamukh katha

  • Aug 19 2019 1:42PM

सामूहिक बदलाव की जिद का नाम है आरा-केरम

सामूहिक बदलाव की जिद का नाम है आरा-केरम

गुरुस्वरूप मिश्रा / पवन कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

आरा- केरम. नाम ही काफी है. झारखंड का शायद यह इकलौता गांव है, जिसकी ग्रामसभा इतनी सशक्त है कि इसकी अनुमति के बिना एक पत्ता नहीं हिलता. हर गुरुवार को विकास का खाका खींचने पूरा गांव बैठता है जबकि तरक्की का गुर सीखने हर रविवार को महिलाएं बैठती हैं. इस गांव का अपना फंड है, जिससे सामूहिक कार्य किये जाते हैं. रांची के ओरमांझी प्रखंड की टुंडाहुली पंचायत का ये आदर्श गांव राज्य के 32 हजार से अधिक गांवों के लिए एक मिसाल है, जहां के ग्रामीणों ने संकल्प से शराबबंदी, श्रमदान, जल संरक्षण, स्वच्छता, चराइबंदी, नसबंदी, टांगीबंदी एवं लोटाबंदी को सफल बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर मोटी लकीर खींच दी है

हरे-भरे जंगलों व पहाड़ों की गोद में बसे आरा-केरम की आज राष्ट्रीय पहचान है. महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि व हिवरे बाजार की तरह झारखंड के आरा-केरम ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मन की बात कार्यक्रम में श्रमदान से जल संरक्षण की दि‍शा में किये गये अभूतपूर्व कार्यों की सराहना के बाद यह गांव यकायक राष्ट्रीय फलक पर सुर्खियों में आ गया. कोई रातोंरात चमत्कार नहीं हुआ. तीन साल पहले ये बिल्कुल सामान्य गांव था. विकास की राह में काफी पिछड़ा हुआ, लेकिन जंगल बचाने की जिद से ग्रामीणों में आई एकजुटता ने इसकी तस्वीर बदल दी है.

नशामुक्त ग्राम में आपका स्वागत
मुस्कुराइए ! आप नशामुक्त ग्राम आरा-केरम में प्रवेश कर रहे हैं. रांची के ओरमांझी स्थित आरा-केरम में प्रवेश करते ही सड़क की बायीं ओर नीले रंग का यह बोर्ड आपको बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है. सड़क की दोनों तरफ हरे-भरे पेड़-पौधे और साफ-सफाई देख आपके पांव यकायक ठिठक जायेंगे. आपको अहसास हो जायेगा कि आप खास गांव में आ गये हैं. 110 घर और 650 की आबादी वाले इस गांव में आप किसी भी मौसम में आयें, आधुनिक तकनीक से खेतों में काम करते किसान आपको दिख जायेंगे. बच्चे हों, महिलाएं हों, पुरुष हों या बुजुर्ग. अपने गांव की समृद्धि को लेकर इनकी एकजुटता देख आप प्रभावित हो जायेंगे.

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वन रक्षा बंधन पर्व से बदलने लगी तस्वीर
वर्ष 1992 में जब उजड़ते जंगल को बचाने के लिए ग्रामीण एकजुट हुए थे, उस वक्त उन्हें भी ये अहसास नहीं था कि उनकी ये एकता वक्त के साथ नयी गाथा लिखेगी. पूरा गांव नशे की चपेट में था. आपसी झगड़ा-मारपीट सामान्य बात थी. तमाम तरह की सामाजिक कुरीतियां व्याप्त थीं. रोजगार के साधन नहीं थे. किसी तरह जिंदगी कट रही थी. प्रकृति ने सब कुछ दिया था, लेकिन जागरूकता के अभाव में सामूहिक एकता नहीं थी. इसी दौरान हजारीबाग के पर्यावरण प्रेमी महादेव महतो ग्रामीणों के आग्रह पर गांव आये. इनकी पहल पर 14 अप्रैल 2015 को पहली बार गांव में वन रक्षा बंधन पर्व मनाया गया. मौके पर उपस्थित वन विभाग के अधिकारी रहे सिद्धार्थ त्रिपाठी ने ग्रामीणों की एकजुटता देखी. उनसे मिलना-जुलना शुरू कर मार्गदर्शन देना शुरू किया. वर्ष 2016 इस गांव के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. सामूहिक एकता व जागरूकता से गांव की तस्वीर बदलने लगी.

ये है अनोखा गांव
झारखंड का ये इकलौता गांव है, जहां की ग्रामसभा काफी मजबूत है. इसके इशारे के बिना यहां कोई कार्य नहीं होता. ये इस मामले में भी अनोखा है कि वर्ष 2016 से हर गुरुवार को पूरा गांव एक साथ बैठता है और विकास की रूपरेखा तय कर समीक्षा करता है. व्यक्तिगत विकास की जगह यहां सामूहिक विकास पर जोर दिया जाता है. ये शायद पहला गांव है, जहां नव जागृति समिति की साप्ताहिक बैठक में हर परिवार पांच रुपये की बचत करता है, जिससे गांव में कई कार्य किये गये हैं. हर रविवार को सखी मंडल की महिलाएं बैठक कर तरक्की के लिए मंथन करती हैं. हर सुबह गांव के बच्चे साफ-सफाई करते हैं. अब झारखंड के अलावा देश के कई राज्यों से बड़े अधिकारी, समाजसेवी व जनप्रतिनिधि इस गांव को देखने आते हैं. इससे ग्रामीणों का उत्साह बढ़ जाता है.

शराबबंदी से मिली पहली जीत
वर्ष 2016 से पहले आरा-केरम के अधिकतर लोग शराब के नशे में रहते थे. गांव के विकास की छोड़िए. उन्हें खुद की तरक्की की भी फिक्र नहीं रहती थी. झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) की ओर से सखी मंडल का गठन किया गया. दीदियां बचत कर परिवार को आर्थिक सहयोग करने लगीं. इनकी जागरूकता का ही असर हुआ कि उन्होंने शराबबंदी को लेकर नशामुक्ति अभियान चलाकर गांव की रंगत बदल दी. यह इतना आसान भी नहीं था, लेकिन महिलाओं के दृढ़ निश्चय से यह संभव हो पाया. पुरुषों ने भी धीरे-धीरे सहयोग करना शुरू किया. सामूहिक एकता के कारण शराब बनाने वाली महिलाओं ने भी बनाना छोड़ दिया और बर्तन बेच दिये. आरा-केरम नशामुक्त बन गया. ये पहली बड़ी जीत थी. इससे इनका उत्साह बढ़ा. आज नौ महिला समूह कार्यरत है.

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जंगल से दातून भी नहीं तोड़ सकते
इस गांव में फिलहाल 400 एकड़ से अधिक वन क्षेत्र हैं. इसे बचाने के लिए टांगीबंदी व चराइबंदी जैसे सख्त नियम लागू हैं. कोई भी व्यक्ति जंगल से पेड़ नहीं काट सकता. दातून भी नहीं तोड़ सकता. जंगल में पशुओं के चराने पर भी रोक है. पशुओं को चराने के लिए अलग से चारागाह है. इसका उल्लंघन करने पर आर्थिक दंड का प्रावधान है. ग्रामसभा उसे सरकारी सुविधाओं से भी वंचित रख सकती है. एक वक्त था जब ग्रामीण अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर ही निर्भर थे. लकड़ियां काटना और बेचना उनकी आजीविका का साधन था. उजड़ते जंगल को बचाने के लिए वन रक्षा बंधन पर्व शुरू हुआ. नये पौधे लगाये गये. तभी आज हरे-भरे व घने जंगल हैं. 

छह नियमों पर विशेष जोर
श्रमदान
नशाबंदी
लोटाबंदी
चराइबंदी
कुल्हाड़ीबंदी
नसबंदी

खेती से खुशहाली
इस गांव की 95 फीसदी आबादी आजीविका के लिए कृषि और पशुपालन पर निर्भर है. 70 फीसदी किसान सालोंभर सब्जी की खेती करते हैं. 50 फीसदी किसान अमृत जल से जैविक खेती करते हैं. अमृत कृषि के लिए मिट्टी बनायी जा रही है. लगभग 35 एकड़ में ड्रिप इरिगेशन से खेती होती है. हर रोज एक से ड़ेढ़ टन सब्जी बिक्री होती है. सब्जी के सीजन में यह मात्रा दोगुनी हो जाती है. प्याज, तरबूज, खीरा और टमाटर का अच्छा उत्पादन होता है. शराबबंदी के बाद खेती के प्रति ग्रामीणों का रूझान बढ़ा. पारंपरिक खेती की बजाय आधुनिक खेती से खुशहाली आने लगी.

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अब शराब नहीं, बेचते हैं दूध
शराबबंदी के बाद ग्रामीणों ने गाय पालन की शुरूआत की. अब गांव में हर रोज 200 लीटर दूध का उत्पादन होता है. लोग खुद भी पीते हैं और बाहर बिक्री भी करते हैं. बकरी पालन, सूकर पालन और मछली पालन भी हो रहा है. पहले गांव में देसी गाय थी. अब उन्नत नस्ल की गायों से अच्छा उत्पादन हो रहा है, लेकिन दूध के उचित दाम नहीं मिल पा रहे हैं.

श्रमदान से जल संरक्षण की ताकत देखिए
जंगल से होकर बहने वाले झरने का पानी पहले यूं ही बहकर निकल जाता था. गांव के पानी को गांव में रोकने के लिए ग्रामीणों ने दो महीने तक श्रमदान कर लूज बोल्डर के जरिये 700 चेकडैम बना दिये. करीब एक करोड़ का काम गांव वालों ने चुटकी में कर दिया. इससे न सिर्फ मिट्टी का कटाव रूक रहा है, बल्कि जल का संरक्षण भी हो रहा है. यह किसानों के लिए जीवनदान से कम नहीं है. 50 एकड़ में करीब तीन हजार ट्रेंच कम बंड (टीसीबी) बनाये गये हैं. करीब 55 डोभा बनाये गये हैं, जिससे खेतों में हमेशा हरियाली रहती है.

ग्रामीणों का हौसला काबिलेतारीफ : प्रधानमंत्री 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में आरा-केरम गांव की सराहना की है. उन्होंने कहा कि ग्रामीणों ने जल प्रबंधन को लेकर जो हौसला दिखाया है, वो हर किसी के लिए मिसाल है. ग्रामीणों ने श्रमदान कर पहाड़ से बहते झरने को एक निश्चित दिशा देने का काम किया. वो भी शुद्ध देसी तरीके से. इससे न केवल मिट्टी का कटाव और फसल की बर्बादी रुकी है, बल्कि खेतों को भी पानी मिल रहा है. ग्रामीणों का ये श्रमदान, अब पूरे गांव के लिए जीवनदान से कम नहीं है.

बधाई के पात्र हैं आरा-केरमवासी : रघुवर दास
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने आरा-केरम गांव के ग्रामीणों को बधाई दी है. उन्होंने कहा कि जल संरक्षण एक जन आंदोलन का रूप ले रहा है. इसी का परिणाम है कि आरा-केरम में जल संरक्षण का बेहतर कार्य देखने को मिलता है. साफ व चकाचक सड़कें, मोहल्ले एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति ग्रामीण समर्पित हैं. इस गांव के ग्रामीणों ने पूरे देश के सामने मिसाल पेश किया है. जल संरक्षण के क्षेत्र में झारखंड के प्रयासों को राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए प्रधानमंत्री का तहे दिल से धन्यवाद.