aamukh katha

  • Oct 12 2016 5:47AM

नागपुरी फिल्‍म के 'दादा साहेब' धनंजय नाथ तिवारी !

नागपुरी फिल्‍म के 'दादा साहेब' धनंजय नाथ तिवारी !

नागुपरी एक समृद्ध भाषा है. इसमें हजारों लाखों की संख्‍या में साहित्‍य रचनाएं हैं. इसे नागवंशी राज्‍य में राज्‍य भाषा का दर्जा प्राप्‍त था. झारखंड में नागपुरी संपर्क भाषा के रूप में जाना जाता है. झारखंड अपनी लोक कला और संस्‍कृति के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है. नागपुरी भाषा का विस्‍तार भी बुहत अधिक है. झारखंड के अलावा ओड़िशा,छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों में नागुपरी बोली जाती है. नागपुरी में गीत-संगीत की परंपरा तो आदिकाल से है. इसके विकास में साहित्‍य और कला संस्‍कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है. बस इसमें कमी रह गयी थी तो फिचर फिल्‍म की. लेकिन इस कमी को धनंजय नाथ तिवारी ने पूरा कर दिया.

अरविंद कुमार मिश्रा

धनंजय नाथ तिवारी को नागपुरी में पहली फिल्‍म बनाने का श्रेय जाता है. लोहरदगा जिले के झिकोचट्टी निवासी धनंजय तिवारी ने 'सोना कर नागपुर' नाम से नागपुरी में पहली फिल्‍म बनायी. यह फिल्‍म नागुपरी के इतिहास में मिल का पत्‍थर साबित हुआ और इतिहास में दर्ज हो गया, क्‍योंकि इससे पहले इस भाषा में केवल ऑडियो और वीडियो कैसेट और सीडी ही बाजार में उपलब्‍ध थे. 'सोना कर नागपुर' फिल्‍म ने नागपुरी भाषा को नयी पहचान दिलायी. इसलिए इन्‍हें नागपुरी फिल्‍म के 'दादा साहेब' के रूप में अगर याद किया जाए तो कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी. आज नागपुरी में सैकडों की संख्‍या में फिल्‍में बन रही हैं, लेकिन इस फिल्‍म को जो प्‍यार और सम्‍मान मिला शायद ही वो सम्‍मान आज की फिल्‍मों को मिल रही हैं.

कैसे आया फिल्‍म बनाने का विचार :

धनंजय तिवारी बचपन से कला संस्‍कृति से जुडे हुए हैं. इनमें अभिनय,गायन और वादन की रूचि छुटपन से ही थी. तिवारी जी बताते हैं कि जब वे स्‍कूल में थे तो वहां होने वाले नाटक जैसे कार्यक्रम में भाग लेते और हमेशा नंबर वन रहते थे. आगे चलकर उनमें नागपुरी संस्‍कृति से ऐसा लगाव हुआ कि बस उसी में रम गये. इनको नागपुरी में फिल्‍म बनाने का विचार उस समय आया जब वे भोजपुरी फिल्‍मों में छोटे-मोटे अभिनय किया करते थे. यहां अच्‍छी अभिनय के बाद भी उन्‍हें वो सम्‍मान नहीं मिल पाता था, जिसकी उन्‍हें तलाश थी. कहते हैं, वहां उस समय कलाकारों का काफी शोषण होता था. तभी उनके मन में विचार आया कि अगर उन्‍हें फिल्‍मों में अपनी अलग पहचान बनानी है तो फिर उन्हें कुछ हटकर काम करना पड़ेगा. बस उनके मन में नागुपरी में फिल्‍म बनाने का विचार हिलोरे मारने लगा. उनके विचार को तब और बल मिला जब उनके एक करीबी मित्र ने उनका हौसला बढ़ाया और फिल्‍म बनाने में मदद का आश्‍वासन दिया और फिर उनकी यात्रा उसी दिन से शुरू हो गयी.

फिल्‍म में अपनी पूरी कमायी लगा दी :

धनंजय तिवारी के मन में जब फिल्‍म बनाने की योजना आयी तो उस समय उनके सामने पैसे की सबसे बढ़ी समस्‍या थी. उन्‍होंने लोगों से मदद की गुहार लगायी. कुछ बड़े लोग तैयार तो हुए लेकिन बाद में हाथ खींच लिया. आर्थिक तंगी के बाद भी उनका हौसला कम नहीं हुआ और अपनी सारी कमायी फिल्‍म के नाम कर दिया. हालांकि उनके करीबी लोगों ने उन्‍हें हजार-पांच सौ रुपये करके मदद की जिसे फिल्‍म रीलीज होने के बाद उन्होंने वापस भी कर दिया. फिल्‍म बनाने में उन्‍हें करीब 10 लाख का खर्च आया.

फिल्‍म बनने में लगे ढाई साल :

'सोना कर नागपुर' नागुपरी की पहली ऐतिहासिक फिल्‍म बनी. तिवारी जी ही इस फिल्‍म के निर्माता और निर्देशक थे. इस फिल्‍म को बनने में करीब ढाई साल का लंबा समय लग गया. इसके पीछे धनंजय तिवारी ने कारण बताया कि उन्‍हें कोई प्रोड्यूसर नहीं मिल रहा था, उनकी फिल्‍म में पैसा लगाने के लिए कोई तैयार नहीं था. बल्कि लोगों ने उनका उत्‍साह तोड़ने का काफी प्रयास किया. जिसने मदद का आश्वासन दिया था वो मुकर गये, इसलिए उनके पास जैसे-जैसे पैसा आता गया फिल्‍म आगे बनती गयी और आखिरकार 1992 में नागुपरी की पहली फिल्‍म 'सोना कर नागपुर' बनकर तैयार हो गयी.

'सोना कर नागपुर' के नाम पर हुआ था हंगामा :

मां छिन्‍नमस्‍तिका प्रोडक्‍शन हाउस के बैनर तले बनी 'सोना कर नागुपर' फिल्‍म को अपने नाम पर ही विरोध का सामना करना पड़ा था. तिवारी जी ने जब यह नाम सोचा था तभी छोटानागपुर के कुछ जानकार लोगों ने इसका विरोध किया. विरोध करने वाले लोगों का कहना था कि यह नाम ही गलत है. उनका तर्क था कि छोटानागपुर को हीरा नागपुर कहा जाता है न की सोना कर नागपुर. इस पर तिवारी जी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि इसका नाम इसलिए रखा गया क्‍योंकि सोना का संबंध छोटे-बड़े सभी वर्ग के लोगों के साथ रहता है. गरीब-अमीर सभी के घरों में सोना किसी न किसी रूप में रहता है, उसी प्रकार उनकी फिल्‍मों को भी यहां के लोग वही प्‍यार देंगे जो सोना को देते आये हैं. हीरा तो बहुत मुल्‍यवान होता है उसकी पहुंच साधारण लोगों से बाहर है. उनके इस तर्क के बाद विवाद कम हुआ और तब जाकर फिल्‍म का नाम 'सोना कर नागपुर तय' हुआ.

झारखंड के कलाकारों को मिली जगह :

इस फिल्म में झारखंड के कलाकारों को जगह दी गयी. फिल्‍म में धनंजय तिवारी के बेटे ने हीरो की भूमिका निभायी. साथ ही जाने-माने कलाकार मुकुंद नायक, मनपुरन नायक ने भी काम किया. यहां के कलाकारों को जगह देने के पीछे तिवारी जी का मानना था कि फिल्‍म उन्‍होंने पैसे कमाने के लिए न‍हीं बनाया था. फिल्‍म बनाने के पीछे उनका मकसद केवल यहां की कला और यहां के कलाकारों को आगे बढ़ाना था.

पलायनवाद व युवाओं के भटकाव आधारित बनी थी फिल्‍म :

इस फिल्म में झारखंड की मूल समस्‍या को सामने लाने का प्रयास किया गया. फिल्‍म के जरीये उन्‍होंने पलायनवाद और युवाओं के भटकाव को समाज के सामने लाने का प्रयास किया. उन्‍होंने अपनी फिल्‍म में दिखाया कि किस तरह से युवाओं में भटकाव आता है. थोड़ी बहुत शिक्षा प्राप्‍त कर लेने के बाद बाहर चले जाते हैं और यहां की संस्‍कृति और परंपरा को भूल जाते हैं.

फिल्‍म हीट हुई, लेकिन कमायी कम :

वर्ष 1992 में जब फिल्म रीलीज हुई तो उस समय फिल्‍म देखने के लिए लोगों में होड़ मच गयी, क्‍योंकि इससे पहले नागपुरी में कोई भी फिल्‍म नहीं बनी थी. झारखंड के प्राय: सभी हॉल में यह फिल्‍म लगा था. दर्शकों का प्‍यार भी इस फिल्‍म को मिला, लेकिन फिल्‍म से कमायी बहुत कम हुई और तिवारी जी को इसमें करीब पांच लाख रुपये का नुकसान भी उठाना पड़ा. फिर भी इनका उत्‍साह कम नहीं हुआ.

वीडियो सीडी के माध्‍यम से बेटे की शादी का बनाया निमंत्रण कार्ड, देश में ऐसा अनोखा प्रयोग पहली बार :

धनंजय तिवारी न केवल झारखंड के कला-संस्‍कृति से जुड़े हुए हैं बल्कि उनके अंदर प्रयोगधर्मी गुण भी भरा हुआ है. उन्‍होंने कला संस्‍कृति के क्षेत्र में अनोखा प्रयोग किया जो न केवल अपने राज्‍य में बल्कि देश में शायद ही कोई होगा जो ऐसा प्रयास पहले किया हो. तिवारी जी ने अपने बेटे की शादी का निमंत्रण कार्ड एक वीडियो सीडी के रूप में तैयार किया था. जिसमें उनके पूरे परिवार वालों ने अभिनय किया. आज यह प्रयोग नहीं दिखता है. इनके द्वारा बनाये गये शादी का निमंत्रण कार्ड वाला वीडियो सीडी को लोगों ने काफी पसंद किया. इसे कई समाचार पत्रों ने प्रमुखता से छापा था.

सैकड़ों नागपुरी गीत की रचना की :

धनंजय तिवारी ने सैकड़ों गीत की रचना की है. उनके द्वारा लिखी गयी 'तिवारी कर 51 बात' प्रकाशित रचना काफी पसंद की गयी. इसके अलावा उन्‍होंने नागपुरी में करीब सौ से अधिक गीतों की रचना की हैं, जिसमें ड़ोंगा तोर हीलेला डोलेला... जैसे गीत काफी प्रसिद्ध हुए.

धनंजय तिवारी ने 'झांझो रानी' नाम से एक वीडिसो कैसेट तैयार किया था जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. इसमें लगातार 16 नागपुरी गीतों को मिलाकर एक चित्रहार तैयार किया गया था. इस कैसेट की मांग बाजार में खूब थी.