aamukh katha

  • Dec 23 2016 8:33AM

लोकतंत्र का उत्सव

लोकतंत्र का उत्सव
गुरजीत सिंह 
राज्य समन्वयक सोशल ऑडिट यूनिट जेएसएलपीएस
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समुदाय की भागीदारी एक अनिवार्य और आवश्यक शर्त है. अपनी समस्याओं का आकलन, योजना निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी में जन समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी को संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया गया है. यह कल्पना की गयी है कि देश के हर नागरिक की ग्रामसभा में प्रत्यक्ष भागीदारी हो और ग्राम स्वराज का सपना सच हो सके.
 
सामाजिक अंकेक्षण यानी सोशल ऑडिट की प्रक्रिया वस्तुतः समुदाय के निगरानी करने के अधिकार को व्यवस्थित और सुनियोजित करने की एक प्रक्रिया है, जिसे कानूनी बाध्यता से शक्ति संपन्न किया जा रहा है. भारत में पुरातन काल में भी शाषण के कार्य को प्रचारित करने के लिए ढोल पीटने और मुनादी करवाए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है.
 
चाणक्य ने इस संदर्भ में महत्वपूर्ण बात कही कि हर राजा को अपने नागरिकों की आशा, अपेक्षा, आवश्यकता और चिंता को जानने की प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए और यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसे खुद अपनी चिंता करनी पड़ सकती है. इतिहास में चंद्रगुप्त और चाणक्य का साधारण वस्त्रों में प्रजा के बीच जाकर उनकी राय और प्रतिक्रिया जानने के कई उदाहरण भी मिलते हैं. सामाजिक अंकेक्षण मूलतः समाज द्वारा ऑडिट को संपन्न किये जाने की एक विधा है, जहां लाभार्थी खुद अपने लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम और योजनाओं के क्रियान्वयन की जांच करता है और इस संबंध में सेवा प्रदाताओं से चर्चा और विमर्श कर इसे बेहतर करने का सुझाव देता है.
 
अधिकार
 
सत्तर के दशक में कुछ कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा उनके द्वारा कराये जा रहे सामुदायिक कार्यों की समीक्षा के लिए इस औजार का प्रयोग किया गया और बाद में नागरिक संगठनों द्वारा कई सरकारी कार्यक्रमों की जमीनी स्थिति उजागर करने के लिए इसका व्यापक प्रयोग किया जाने लगा. वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम में सोशल ऑडिट को अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में कानूनी दर्जा दिया गया. सेक्शन-17 में ग्रामसभा को हर छह माह में अनिवार्य रूप से सोशल ऑडिट करने का अधिकार दिया गया है और ऑडिट ऑफ स्कीम रूल्स 2011 के माध्यम से इसकी प्रक्रिया, जिम्मेवारियां, संसाधन और स्वतंत्रता को पूरी तरह से परिभाषित किया गया है. 
 
सामाजिक यंत्र है सोशल ऑडिट
 
सोशल ऑडिट की प्रक्रिया क्रियान्वयन एजेंसी से अलग रह कर चलायी जाने वाली एक स्वतंत्र प्रक्रिया होगी जो एजेंसी द्वारा संचालित होगी और इसकी रिपोर्ट को वार्षिक कैग की रिपोर्ट में भी शामिल किया जायेगा. सामाजिक अंकेक्षण को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और भ्रम है और क्रियान्वयन एजेंसी में इसको लेकर एक भय का वातावरण तैयार हो जाता है. 
 
वस्तुतः यह कमियों को ढूंढने की प्रक्रिया नहीं बल्कि सच्चाइयों को जानने-समझनेकी प्रक्रिया है, जिससे कमियों को समय रहते सुधारा जा सके और योजनाओं के क्रियान्वयन में अपेक्षित सुधार हो सके. यह एक सामाजिक यंत्र है जो समुदाय को सूचित और प्रशिक्षित करता है ताकि वह खुद उसके लिए संचालित योजनाओं का हाल चाल जान सके. यह सेवा प्रदाताओं को उनकी जिम्मेवारियों का एहसास कराने और उन्हें आमजन के प्रति जवाबदेह बनाने की कोशिश है. यह तंत्र को लोक के प्रति उत्तरदायी बनाने का भागीरथी प्रयास है.
 
प्रक्रिया
 
इसकी प्रक्रिया में सोशल ऑडिट दल का गठन और प्रशिक्षण, सूचनाओं का संग्रह, वातावरण निर्माण, क्षेत्र में सत्यापन, ग्रामसभा और जन सुनवाई की गतिविधि सम्मिलित है. इससे लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी होगी, सरकारी व्यवस्था में संवेदनशीलता बढ़ेगी, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और योजनाओं के क्रियान्वयन में अपेक्षित सुधार होगा. यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और परंपराओं को भी सुदृढ़ और परिमार्जित कर पाने में कामयाब होगी, इसलिए इसे लोकतंत्र के गहरीकरण की प्रक्रिया मानना उचित होगा और इसे व्यापक अर्थों में लोकतंत्र का उत्सव कहना अनुकूल भी होगा. 
 
झारखंड में सोशल ऑडिट प्रक्रिया 
 
झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी में एक स्वतंत्र इकाई के रूप में सामाजिक अंकेक्षण इकाई की स्थापना की गयी है, जो प्रधान सचिव की अध्यक्षता वाली एक संचालन समिति के निर्देश पर कार्य करेगी, जिसमें सामाजिक प्रतिनिधियों के अलावा कैग के प्रतिनिधि भी सदस्य के रूप में शामिल किये गए हैं. राज्य से लेकर जिला व प्रखंड तक नियुक्तियों की प्रक्रिया चल रही है. पिछले वर्ष 49 पंचायतों में संपन्न सोशल ऑडिट प्रक्रिया के अनुभवों से सीख लेकर दिसंबर से मार्च तक 547 पंचायतों में मनरेगा के तहत वर्ष 15-16 में संचालित योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण कराया जायेगा. केंद्र सरकार के सहयोग से सभी राज्य, जिला और प्रखंड के स्रोत व्यक्तियों का बैच वार 30 दिनों का सर्टिफिकेट कोर्स राज्य ग्रामीण विकास संस्थान के माध्यम से संपन्न कराया जायेगा, जो टाटा सामाजिक अध्ययन संस्थान द्वारा प्रमाणित होगा. भविष्य में मनरेगा में क्रियान्वयन एजेंसी द्वारा कोई भी सामजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया संपन्न नहीं की जायेगी. भविष्य में अन्य योजनाओं की भी सोशल ऑडिट की रणनीति तैयार की जायेगी.