aamukh katha

  • Jan 27 2017 9:03AM

नोटबंदी से झारखंड में भी आर्थिक मंदी

नोटबंदी से झारखंड में भी आर्थिक मंदी
ज्यां द्रेज
प्रख्यात अर्थशास्त्री
भारतीय अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के विनाशकारी प्रभाव की खबरें पूरे देश से लगातार आ रही है. उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र में संकट, मंडियों में मंदी, देरी से बुआई, कारोबार में कमी, फैक्ट्रियों का बंद हो जाना, मजदूरों की छंटनी, मजदूरी का भुगतान नहीं होना, पेंशन का भुगतान नहीं होना, आय में गिरावट, कर्ज का बढ़ना, पलायन चक्र का टूटना एवं मध्याह्न भोजन में व्यवधान. पीड़ितों में किसान, खेतीहर मजदूर, प्रवासी मजदूर, दैनिक मजदूर, मछुआरे, बीड़ी मजदूर, फुटपाथ विक्रेता, शिल्पकार, पेंशनधारी, असहाय व्यक्ति, बच्चों समेत कई लोग हैं. नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए हमलोगों ने रांची में  छोटे कारोबारियों, दुकानदारों, फुटपाथ दुकानदारों के बीच एक छोटा सर्वे किया.
 
यह सर्वे सात विभिन्न स्थानों पर किया गया जो रांची शहर और उसके बाहरी इलाकों में है. हर स्थान पर हमलोगों ने छोटे कारोबारियों और विक्रेताओं से बात की ताकि उस क्षेत्र के लगभग सभी मुख्य कारोबारों को सर्वे में शामिल किया जा सके. हमने यह सर्वे नोटबंदी की घोषणा (आठ नवंबर) के ठीक एक महीने बाद किया और 85 उत्तरदाताओं से बात की. सर्वे के दौरान हमलोगों ने उत्तरदाताओं से नोटबंदी के पहले वाले महीने की तुलना में नोटबंदी के बाद के महीने की आय में कितना फीसदी नुकसान हुआ है यह बताने को कहा. ज्यादातर उत्तरदाताओं को जवाब देने में कोई परेशानी नहीं हुई. इस आर्थिक मंदी को सामान्य होने में लंबा समय लगेगा.
 
अभी जो नोट की कमी है, शायद कुछ महीनों के अंदर पूरी हो भी जाये, लेकिन समस्या नोट की कमी मात्र नहीं है. लोगों की क्रय शक्ति में भी कमी आयी है, जो रोजगार और आय पर मंदी के प्रतिकूल असर को दर्शाता है. कारोबार, रोजगार, आय और क्रय शक्ति में कमी के विनाशकारी चक्र से निकलने में कुछ समय लगेगा. अनेक लोगों ने यह बताया कि नोटबंदी के बाद उन्हें अपने यहां काम पर रखे मजदूरों या सहायकों को कारोबार में कमी की वजह से हटाना पड़ा. ठेका मजदूर ने यह भी बताया कि नोटबंदी की वजह से मजदूरों की मांग में भारी कमी आयी है.
 
 रांची, भारत की शहरी अर्थव्यस्था का प्रतिनिधत्व करता हो या न करता हो, लेकिन नोटबंदी पर आ रही खबरों के मुताबिक, अलग-अलग जगह पर स्थिति लगभग एक समान मालूम होती है. ग्रामीण क्षेत्र भी गंभीर संकट से गुजर रहे हैं. इसका आर्थिक वृद्धि दर पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आर्थिक संकट के कारण ऐसे लोगों को एक असहनीय कष्ट का सामना करना पड़ रहा है, जो बहुत मुश्किल से अपना जीविकोपार्जन करते हैं.
 
(साथ में धीरज कुमार और आकाश रंजन)
 
दृष्टिकोण
 
इस आर्थिक मंदी को समझना मुश्किल नहीं है. रांची की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था व्यापक रूप से नगद संचालित है. जब स्थानीय स्तर पर आबादी के एक बड़े हिस्से को नगद से वंचित कर दिया जाये तो कारोबार प्रभावित होगा ही. लोग खर्चे में कटौती करते हैं और उन सभी खरीदारियों को स्थगित कर देते हैं, जिन्हें बाद में किया जा सकता है.
 
व्यक्तिगत अनुभव
 
एक उत्तरदाता ने कहा कि नोटबंदी के पिछले महीने की बजाय, अगर पिछले साल के इसी महीने से तुलना की जाये तो तसवीर और भी बुरी नजर आयेगी, क्योंकि शादियों की वजह से रांची में कारोबार इस समय ऊंचाई पर रहता है. कई उत्तरदाताओं ने कहा कि पिछले कई दशकों के कारोबार में उन्होंने ऐसी मंदी नहीं देखी थी. उनमें से एक फल विक्रेता की आंखों में यह बताते हुए आंसू आ गये कि उसका कारोबार लगभग ठप्प हो चूका है. एक अन्य फल विक्रेता ने बताया कि एक ही महीने में 17 शादियों के रद्द हो जाने की वजह से बड़ा नुकसान हुआ है.
 
दो भाग्यशाली उत्तरदाताओं ने बताया कि नोटबंदी के बाद उनकी आय में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है. एक खैनी विक्रेता ने कहा कि चूंकि बहुत सारे मजदूरों को रोजगार नहीं मिला, इसलिए उसकी बिक्री बढ़ी है. एक अन्य जो भाड़े का निजी वाहन चलाता है, ने बताया कि उसे फायदा हुआ है, चूंकि पेट्रोल पंप पर पुराने नोट लिए जा रहे थे, इसलिए लोगों को उसकी सेवा लेना आकर्षक लगा. नरेन्द्र मोदी के एक उत्साही समर्थक ने हमें सर्वे करने से मना भी किया और कहा कि इसकी  जरूरत नहीं है. उसने कहा कि कारोबार में कमी आयी है लेकिन 40-50 फीसदी से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. यह सर्वे की काफी सही भविष्यवाणी थी.
 
भोजन व जीवन के अधिकार को नजरअंदाज करता नोटबंदी
 
रोजी-रोटी अधिकार अभियान केंद्र सरकार की लापरवाही के साथ किये गये मुद्रा नोटों के नवीनीकरण जिसे नोटबंदी कहा जाता है, से निराश है, जिसमें इसके गरीब लोगों पर हुए असर पर कोई गंभीर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इस कदम का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं दिख रहा है और यह भोजन  के अधिकार और जीवन के अधिकार पर एक बड़ा हमला है.
 
नोटबंदी को जनता के बीच यह दावा करते हुए लाया गया है कि इससे काली अर्थवस्था खत्म हो जायेगी. अनेकों अर्थशास्त्रियों ने इस दावे के भ्रामक होने का उजागर किया है. अवैध  आय आमतौर पर नोटों की गड्डियों में नहीं रखी जाती है. उसे खर्च या निवेश कर दिया जाता है या मुद्रा नोटों से अधिक सुरक्षित और फायदेमंद रूपों में परिवर्तित कर दिया जाता है.
 
यही मुख्य कारण है कि अधिकतर 500 और 1000 रुपये के नोट पिछले दो महीनों में वापस भारतीय रिजर्व बैंक में जमा हो गये हैं, इस धारणा के विपरित कि नोटबंदी से चोर भारी मात्रा में बेकार हुये नोटों के साथ फंस जायेंगे. एक अन्य संभावित कारण यह है कि नोटबंदी ने ऐसे लोगों को अपना काला जन-धन या अन्य खातों में जमा कर सुरक्षित रखने के सक्षम बना दिया है. सरकार अब लाखों लोगों के खातों की जांच करने और लोगों से यह पूछने की तैयारी कर रही है कि उन्होंने कुछ लाख रुपये की तुच्छ राशि कैसे कमाई. इससे बड़े पैमाने पर उत्पीड़न के दरवाजे  खुलेंगे और शायद बैंकिंग प्रणाली में भ्रष्टाचार बढ़ेगा. इस बीच, देश की वैसी शक्तिशाली कंपनियों पर, जो सरकारी बैंकों से लिये करोड़ों रुपये के उधार को वापस करने में असमर्थ है, कोई दंड नहीं लग रहा है.  अब चूंकि इस बात का खुलासा हो गया है कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर चोट नहीं लगेगी, सरकार इस पहल को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर एक कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है. कैशलेस भुगतान प्रणाली के जो भी फायदे हों, उसे बढ़ावा देने के लिये पूरी नोटबंदी एक हास्यास्पद तरीका है.इस तबाही पर सरकार की प्रतिक्रिया अचरज आत्मसंतुष्टि वाली है. यह दावा किया जा रहा है कि यह मंददी थोड़े समय के लिये ही है और अर्थव्यवस्था बहुत जल्द ही अपनी मूल स्थिति में वापस आ जायेगी. 
 
इस लापरवाह व व्यर्थ नोटबंदी के कारण लोगों को हो रही असहनीय कठिनाइयों की कुछ हद तक क्षतिपूर्ति  करने के लिये हम मांग करते हैं कि - 
 
केंद्र सरकार राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत विधवाओं, बुजुगों और विकलांग व्यक्तियों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन में अपना योगदान 200 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 1000 रुपये प्रति माह करे
 
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में दिये गये प्रति बच्चे 6000 रुपये के मातृत्व लाभ को तुरंत लागू करे
आंगनबाड़ी व स्कूल के मध्याहन भोजन में दूध, अंडा व फल शामिल करने के लिये तुरंत केंद्र सरकार राशि दे
नरेगा के वार्षिक बजट को तुरंत 60,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाया जाये, 2016-17 से लागू करते हुए
नोटबंदी के कारण जिन लोगों की मृत्यु हुई है, तुरंत उनके परिवारों को मुआवजा दिया जाये
सामाजिक कार्यक्रमों में होने वाले खर्च  में हुई कटौती को तुरंत वापस लिया जाये
पूरा खुलासा हो कि नोटबंदी का निर्णय कैसे, कब, क्यों और किसके द्वारा लिया गया था
 
रोजी रोटी अधिकार अभियान के संचालन समिति 
 
राष्ट्रीय नेटवर्क : कविता श्रीवास्तव और दीपा सिन्हा (संयोजक, रोजी रोटी अधिकार अभियान), एनी राजा (भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन), कॉलिन गोंसेल्व्स (मानव अधिकार कानून ने नेटवर्क), अरुणा रॉय, निखिल डे और अंजलि भारद्वाज (सूचना के अधिकार के लिये राष्ट्रीय अभियान), मधुरेश, अरुंधती धुरु और उल्का महाजन (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय आंदोलन), आशा मिश्रा (भारत ज्ञान विज्ञान समिति), अशोक भारती (दलित संगठनों के लिये राष्ट्रीय सम्मेलन), अनुराधा तलवार, गौतम मोदी और माधुरी कृष्णास्वामी (न्यू ट्रैंड यूनियन इनिशिएटिव), विनायक सेन (पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीस), सुभाष भटनागर (असंगठित क्षेत्र के लिये राष्ट्रीय अभियान समिति), पॉल दिवाकर और आशा कोव्तल (दलित मानवाधिकार के लिये राष्ट्रीय अभियान), मीरा शिवा, राधा होला और वंदना प्रसाद (जन स्वास्थ्य अभियान), रणजीत कुमार वर्मा, प्रह्लाद रे, प्रवीण कुमार और आनंद मलाकर (राष्ट्रीय विकलांग मंच), लाली धाकर, सरस्वती सिंह, शिल्पा डे और राधा रघवाल (एकल महिलाओं के अधिकारों के लिये राष्ट्रीय फोरम), जीवी रामंजनेयुलू, कविता कुरुगंथी (सतत एवं समग्र कृषि के लिये एलायंस), जशोधरा दास गुप्ता (मातृत्व अधिकार और मानवाधिकार के लिये राष्ट्रीय एलायांस), इलांगो (नेशनल फिश वर्कर्स फेडरेशन), जकिया सोनम और नूरजहां (भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन). राज्य प्रतिनिधि : एम कोदंद्रम, रमा मेल्कप, वीणा शत्रुध्न (आंध्र प्रदेश), गंगाभाई व समीर गर्ग (छत्तीसगढ़), अभय कुमार (कर्नाटक), सुरेश सावंत, मुक्ता श्रीवास्तव (महाराष्ट्र), बलराम, जेम्स हेरेंज, गुरजीत सिंह और धीरज (झारखंड), अशोक खंडेलवाल, श्याम और विजय लक्ष्मी (राजस्थान), सचिन जैन (मध्य प्रदेश), जोसेफ पटेलिया, सेजल दंड व नीता हर्दिकार (गुजरात), सेतो बसुमातरी, राजू नर्जरी, बोंदिता आचार्य व सुनील कॉल (असम), रुपेश (बिहार), वी सुरेश (तमिलनाडु), विद्युत मोहंती, राजकिशोर मिश्रा (ओडिशा), शबीना, सुनीता, देवेंद्र गांधी, कन्हैया व ममता (उत्तर प्रदेश), अमृता जोहरी, अब्दुल शकील, विमला, कोनिनिका रे व राजेंद्र (दिल्ली), फादर जोथी व सरदिंदु (प बंगाल). व्यक्तिगत प्रतिनिधि :  मानस रंजन, विद्या भूषण रावत, अंकिता अग्रवाल, स्वाति नारायण, रितु प्रिया व आदित्य श्रीवास्तव.
 
नोटबंदी के बाद आर्थिक गतिविधियों में गिरावट
(85 दुकान/फुटपाथ दुकानदार/कारोबारी) 
कारोबार की प्रकृति  आय में गिरावट (प्रतिशत में)
ठेका मजदूर (2), फल विक्रेता, दर्जी                                                                 81-100
चिकन दुकान (2), गिफ्ट की दुकान, टेंट वाला, वेल्डिंग दुकान, हार्डवेयर,  मोबाइल दुकान, 
बर्तन की दुकान, चीनी-मिट्टी के बर्तन की दुकान,  कपड़े की दुकान, जूते की दुकान, 
बिजली के सामान की दुकान, फूल बेचने वाला, मोची   61-80
कपड़े की दुकान (3),  दर्जी (2), कारपेंटर (2), वेल्डिंग दुकान (2), मोबाइल दुकान (2), हार्डवेयर (2), 
किराना दुकान (2), मटन दुकान (2), फल विक्रेता (3), सूखा फल विक्रेता, गन्ना रस बेचने वाला, 
एगरोल वाला, साइकिल रिक्शा चलाने वाला (2), घड़ी दुकान, बिजली के सामान, मछली का दुकान,
चीनी मिट्टी के बर्तन  की दुकान, गैरेज, स्टेशनरी, ठेका मजदूर                                        41-60
साइकिल की दुकान (2),  कपड़े की दुकान (2), पान वाला, स्नैक्स वाला,गोलगप्पा वाला, पान गुमटी, किराना दुकान, घड़ी दुकान, चश्मे वाला, स्टेशनरी, एगरोल वाला, फल विक्रेता, मोबाइल वाला, हार्डवेयर, गैरेज     21-40
चीनी मिट्टी का बर्तन बेचने वाला (2), जूते की दुकान, फल विक्रेता, ढाबा  वाला, स्टेशनरी, मोची, गैरेज      01-20
अखबार वाला, ऑटो वाला, किताब की दुकान, चिकन दुकान, हार्डवेयर,  नाई, 
श्रृंगार सामाग्री बेचने वाला, खैनी वाला (b), भाड़े का निजी वाहन (b)                              00
 
(ब्रैकेट के नंबर उस कारोबार को करने वाले जितने लोगों से बात हुई वह संख्या दर्शाया गया है. b- आय में मामूली बढ़ोत्तरी)  
जैसा कि ऊपर की तालिका से स्पष्ट है कि लगभग सभी तरह के कारोबार करने वालों पर नोटबंदी का बुरा असर हुआ है. आय में औसतन 46% का नुकसान हुआ है. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो रांची की कारोबारी गतिविधियां नोटबंदी के पहले की तुलना में लगभग आधी हो गयी है. 
हमलोगों ने यह भी पता करने की कोशिश की है कि नोटबंदी की वजह से लोगों का बैंक या एटीएम में कितना समय बर्बाद हुआ. नोटबंदी की वजह से उत्तरदाताओं का औसतन लगभग 13 घंटे बर्बाद हुआ (बैंक में 11 घंटे और एटीएम में लगभग दो घंटे औसतन बिताने पड़े). कुछ कारोबारियों ने बताया कि आठ नवंबर के बाद उन्हें बैंक में 30 से 40 घंटे बिताने पड़े.