aamukh katha

  • Apr 20 2017 1:39PM

स्वस्थ बचपन सुखी भविष्य

स्वस्थ बचपन सुखी भविष्य

नवजात से दो साल तक के बच्चों की देखभाल बहुत जरूरी है. 1000 दिनों के दृष्टिकोण में भी इस बात पर विशेष जोर दिया गया है. इस दृष्टिकोण में माता के गर्भवती होने से लेकर बच्चे के दो साल होने तक को ध्यान में रखा गया है. ऐसी मान्यता है कि बच्चे खुशहाल होंगे, तो परिवार खुशहाल होगा. इसी अवधारणा को लेकर इस बार की आमुख कथा में छोटे-छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति लोगों को सचेत करने की कोशिश की गयी है. आंकड़ों के साथ यह बताने की कोशिश की गयी है कि पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में बच्चों के स्वास्थ्य की क्या स्थिति है. झारखंड में बच्चों के जीवन को सुरक्षित बनाने के उपाय एवं रणनीति को बताने की कोशिश की गयी है. शिशु मृत्यु दर को कम करने के उपाय बताये गये हैं. इसके अलावा संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के साथ-साथ नवजात से दो साल तक के बच्चों को स्तनपान के अभ्यास को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है. बच्चों के टीकाकरण भी जोर देने की बातें कही गयी है. इन उपायों को अपना कर आप अपने बच्चों को स्वस्थ और खुशहाल रख सकते हैं.

पंचायतनामा डेस्क

पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर (एक साल से कम) और नवजात मृत्यु दर (28 दिनों तक) मानव विकास को मापने के महत्वपूर्ण सूचक हैं. झारखंड में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्म बच्चों में) 44 (एसआरएस-2014), जबकि शिशु मृत्यु दर 32 (एसआरएस -2015) तथा नवजात मृत्यु दर 25 (एसआरएस - 2014 के रिपोर्ट के अनुसार) है. 

संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना

अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव कराये जाने से प्रसव के पहले सप्ताह के दौरान होने वाली मातृ मृत्यु और नवजात मृत्यु की संख्या में कमी लायी जा सकती है. एनएफएचएस 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में प्रत्येक वर्ष 61.9 प्रतिशत महिलाओं का ही संस्थागत प्रसव होता है. इस बात की आवश्यकता है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, उप-केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव की संख्या को बढ़ाया जाये. साथ ही अस्पतालों में सेवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की भी जरूरत है. इसके अलावा ममता वाहन की संख्या को बढ़ाने और गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित किये जाने की भी जरूरत है, क्योंकि संस्थागत प्रसव के माध्यम से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लायी जा सकती है.

स्तनपान के अभ्यास को बढ़ावा देना

मां का दूध नवजात शिशु के लिए अमृत समान माना गया है. यह बच्चों के जीवन की सुरक्षा, पोषण एवं विकास के लिए आवश्यक है. मां के दूध में बीमारी से लड़ने वाले पदार्थ जैसे- आयरन, आवश्यक वसा अम्ल, कैल्सियम, जिंक, फॉलिक एसिड एवं विटामिन होते हैं, जो कि शरीर के प्राकृतिक प्रतिरक्षण प्रणाली को मजबूत बनाते हैं. इससे बच्चों को होने वाली डायरिया एवं श्वास संबंधी संक्रमण से भी बचाव होता है. मां का दूध बच्चे के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है. मां का दूध पीने वाले बच्चे की बौद्धिक क्षमता डिब्बा बंद दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में पांच-आठ प्वाइंट अधिक होती है. स्तनपान के अभ्यास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शिशु को जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान कराया जाना चाहिए. छह महीने तक सिर्फ मां का दूध पिलाना चाहिए. शिशु को सातवें महीने से मां के दूध के साथ-साथ समुचित पूरक आहार देना शुरू करते हुए बच्चे के दो साल पूरे होने तक स्तनपान जारी रखना चाहिए.

जन्म के एक घंटे के अंदर मां का दूध पिलाने से, पहले एक महीने के दौरान होने वाली बच्चे की मौत को 22 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. बच्चे को छह महीने तक सिर्फ मां का दूध देने और 12 महीने तक स्तनपान जारी रखने से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की होने वाली मृत्यु को 13 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. पूरक आहार के साथ-साथ स्तनपान जारी रखने से बच्चे की मृत्यु की संभावना को छह प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. (लांसेट 2003) 

राज्य में स्तनपान के आकंड़े 

माताओं द्वारा अपने नवजात से लेकर छह महीने के बच्चों को स्तनपान कराने के एनएफएचएस 2015-16 के आंकड़े पर गौर करें तो काफी असमानताएं देखने को मिलती है. राज्य में 33.2 प्रतिशत माताएं ही अपने बच्चे को जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान कराती है, जबकि 64.8 प्रतिशत माताएं ऐसी हैं, जो बच्चे के जन्म से छह महीने तक सिर्फ स्तनपान कराती है. यानी अभी भी करीब 30 प्रतिशत माताएं ऐसी हैं जो अपने बच्चों छह माह तक लगातार स्तनपान नहीं कराती है. इसका मुख्य कारण परिवार और समुदायों में स्तनपान को लेकर गलत धारणा का होना भी है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.

नियमित टीकाकरण के प्रसार को मिले बढावा

नियमित टीकाकरण के तहत बच्चों को नौ बीमारियों से बचाव के लिए टीके दिए जाते हैं. ये बीमारियां हैं- टीबी, डिप्थीरिया, कुकुर खांसी, टेटनस, पोलियो, खसरा, हेपेटाइटिस-बी, निमोनिया और जापानी इंसेफ्लाइटिस. ये टीका शिशु मृत्यु को सात प्रतिशत तक कम कर सकती है (लांसेट 2003).

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम

बीसीजी : जन्म के एक महीने के अंदर 

पोलियो : जन्म के 1 महीने के अंदर, 1.5 महीने, 2.5 महीने, 3.5 महीने, 16-24 महीने (बूस्टर) 

पेंटावेलेंट : 1.5 महीने, 2.5 महीने और 3.5 महीने पर

आइपीवी : 1.5 महीने और 3.5 महीने

मिजेल्स (खसरा) , विटामिन-ए : नौ महीने और 16-24 महीने 

हेपेटाइटिस-बी : जन्म के 15 दिनों के अंदर, 1.5 महीने, 2.5 महीने और 3.5 महीने 

जापानी इंसेफ्लाइटिस : नौ महीने और 16-24 महीने पर

(17 जिलों में- रांची, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, पाकुड़, साहेबगंज, दुमका, पलामू, लातेहार, गढ़वा, सरायकेला, हजारीबाग, चतरा, धनबाद, बोकारो, रामगढ़, जामताड़ा एवं गिरिडीह)

डीपीटी (बूस्टर डोज) : 6-24 महीने में और 5-6 साल के होने पर

टीटी बूस्टर : 10 साल में एवं 16 साल में 

बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के अलावा ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण दिवस के अवसर पर एएनएम के द्वारा टीका लगाया जाता है. टीकाकरण के प्रति माता-पिता में जागरूकता के अभाव के कारण बच्चे टीकाकरण से वंचित रह जाते हैं या छूट जाते हैं. सभी सहिया का यह दायित्व है कि वह उन बच्चों को केंद्र तक लेकर आयें, जो वहां नहीं पहुंच पाते हैं. सहिया के पास उन माताओं और बच्चों की सूची होती है.

 सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को करें दूर

विटामिन-ए की कमी, एनीमिया, कुपोषण और डायरिया बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है, जिससे भविष्य में बच्चों के पढ़ने-लिखने की क्षमता और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी असर पड़ता है.

विटामिन-ए की खुराक 

नौ से 59 माह के बच्चों को वर्ष में दो बार विटामिन-ए की खुराक दी जानी चाहिए. इसकी शुरुआत नौ महीने की आयु से करनी चाहिए और पांच साल पूरे होने तक हर छह महीने पर इसकी खुराक दी जानी चाहिए. आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को विटामिन-ए की डोज मुफ्त दिये जाते हैं.

आयरन की कमी

झारखंड में एनीमियाग्रस्त महिलाओं और किशोरियों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है. एनएफएचएस 2005-06 के आंकड़े के मुताबिक, राज्य में करीब 65.2 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं. किशोरियों एवं गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी के कारण होने वाली एनीमिया मातृ मृत्यु का प्रमुख कारण है. एनीमिया ग्रस्त माता से पैदा होने वाले बच्चे की मानसिक क्षमता कम हो जाती है. इसके अलावा यह बच्चों को कुपोषित करने के साथ-साथ मौत के मुंह में भी ले जा सकता है. 

नवजात शिशु की देखभाल व्यवस्था को सशक्त बनाना 

झारखंड में जन्म के प्रथम वर्ष के दौरान मरने वाले 25,600 बच्चों में से 20,000 बच्चों की मृत्यु उनके जन्म के 28 दिनों के दौरान हो जाती है. इसलिए नवजात बच्चों की मौत को कम करने की जरूरत है. इस बात कि आवश्यकता है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और परिवारों को प्रशिक्षित किया जाये, ताकि वो नवजात बच्चों की आवश्यक देखभाल कर सके. देखभाल व्यवस्था में मुख्य है- तापमान का प्रबंधन (कंगारू विधि), स्तनपान का अभ्यास और नवजात शिशु की मृत्यु को रोकने के लिए खतरे के लक्षण की पहचान करना  तथा जरूरत होने पर बच्चे को जिला अस्पताल के विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) या नवजात स्थिरीकरण इकाई (एनबीएसयू) में भर्ती कराना. सरकार ने घरेलू स्तर पर नवजात बच्चों की देखभाल के लिए सहियाओं को प्रशिक्षित करने की पहल की है. इसके तहत बच्चे के जन्म के पहले 42 दिनों के अंदर सहिया नवजात के घर का छह बार दौरा कर उसके स्वास्थ्य एवं देखभाल की जांच करेगी. घरों के अपने दौरे के दौरान सहियाएं एमसीपी कार्ड में नवजात शिशु का वजन दर्ज करेगी तथा यह सुनिश्चित करेगी कि बच्चे को बीसीजी तथा अन्य टीका लगा दी गई है. इसके अलावा वह नवजात को होने वाली बीमारियों की पहचान करेगी और जरूरत महसूस होने पर ममता वाहन के माध्यम से बच्चे को अस्पताल रेफर करेगी. बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए ममता वाहन सेवा की सुविधा मुफ्त में उपलब्ध है, लेकिन बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है. नवजात एवं बच्चों से संबंधित बीमारियों के एकीकृत प्रबंधन (आइएमएनसीआइ) कार्यक्रम के तहत अग्रिम पंक्ति के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया है. आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का यह दायित्व है कि वे बच्चे के जन्म के 10 दिनों के दौरान तीन बार बच्चे के घर का दौरा करें एवं बच्चे के स्वास्थ्य की जांच कर उपचार करें तथा जरूरत पड़ने पर इलाज के लिए अस्पताल रेफर करें.

आयोडिन युक्त नमक का सेवन

एक मनुष्य को अपने संपूर्ण जीवनकाल में केवल एक चम्मच (पांच ग्राम) आयोडिन की आवश्यकता होती है. किसी व्यक्ति को प्रतिदिन अपने आहार में शामिल करने के लिए सिर्फ 100 माइक्रो ग्राम आयोडिन की जरूरत होती है, जो कि सुई की नोक के बराबर होता है. आयोडिन मनुष्य के सामान्य वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है. भोजन में आयरन की कमी होने से थायरायड की बीमारी होती है. इसके कारण सामान्य मानसिक विकास में बाधा पहुंचती है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और निर्णय लेने की क्षमता पर असर पड़ता है. 

आयोडिन की कमी से होनेवाली बीमारी 

आयोडिन की कमी के कारण घेघा रोग, बौनापन, मृत बच्चा पैदा होना, गर्भपात और जन्म दोष से संबंधित समस्याएं हो सकती है. इसके अलावा बोलने और सुनने के दोष, भेंगापन और मंदबुद्धि की समस्याएं भी सामने आ सकती है. आयोडिन की कमी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को 10-15 प्रतिशत तक कम कर सकता है (ग्रंथम-मैकग्रेगर, फर्नल्ड एंड सेथुरैमन, 1999). भारत में मानव उपयोग के लिए आयोडिन रहित नमक की बिक्री पर प्रतिबंध है. 

निमोनिया, डायरिया और मलेरिया के उपचार और प्रबंधन

पांच वर्ष से कम उम्र के 22 प्रतिशत बच्चों के मौत का कारण न्यूमोनिया और डायरिया है. बचाव और उपचार के तरीके को अपना कर इन बीमारियों से होनेवाली बच्चों की मृत्यु को टाला जा सकता है. साबुन से हाथ धोने का अभ्यास डायरिया की बीमारी को 50 प्रतिशत तक कम कर सकता है. इसके अलावा यह सांस से संबंधित संक्रमण की बीमारी को 25 प्रतिशत तक कम कर सकता है, जिसमें न्यूमोनिया भी शामिल है (कर्टिस एंड कैर्नक्रास, 2003). झारखंड में इस अभ्यास को अपनाने से प्रत्येक वर्ष 15-20 प्रतिशत बच्चों (8,000 से 10,000 बच्चों) की मृत्यु को रोका जा सकता है. बचाव और आवश्यक उपचार के माध्यम से निमोनिया, डायरिया और मलेरिया से होने वाली मौतों में कमी लायी जा सकती है. 

घरेलू स्तर पर अपनाये उपाय 

बच्चों को स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और घरों में साबुन से हाथों की सफाई के लिए प्रेरित करना

डायरिया के उपचार के लिए ओआरएस और जिंक का उपयोग करना

मलेरिया से बचाव के लिए उपचारित मच्छरदानी का उपयोग करना

मां और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर आज भी भ्रम की स्थिति

खीस 

प्रायः खीस (प्रसव के बाद माता का पीला गाढ़ा दूध) को यह सोचकर खारिज कर दिया जाता है कि यह गंदा है और बच्चों के लिए नुकसानदायक है. प्राय : नवजात को इसके स्थान पर शहद, गाय/बकरी का दूध या अन्य माताओं का दूध पिलाया जाता है. यह बात पूरी तौर पर प्रमाणित है कि बच्चे को जन्म के एक घंटे के अंदर मां का पीला गाढ़ा दूध (खीस) पिलाने से कई बीमारियों से निजात मिलती है.

पूरक आहार

प्रायः माता-पिता छह महीने से दो साल तक के बच्चे को बिस्कुट और डिब्बा बंद आहार देते हैं. माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को उचित आहार दें. इसमें स्थानीय तौर पर उपलब्ध फल, सब्जियां, अंडे, मीट, मसूर की दाल और बादाम शामिल हो. इसके साथ-साथ मां का दूध भी जारी रखना चाहिए.

स्तनपान 

बहुत से लोगों में ऐसी धारणा है कि बच्चे के छह महीने के होने तक उसे सिर्फ स्तनपान कराना पर्याप्त नहीं है, खासकर गर्मियों के दौरान. ऐसे में कुछ लोग बच्चे को पानी और अन्य दूसरी तरह के तरल पदार्थ देते हैं. कुछ माताएं बच्चों को पाउडर का दूध या दूसरे अन्य उत्पाद देते हैं कि उनके बच्चे का विकास जल्दी होगा. पहले छह महीने के दौरान बच्चे को केवल मां के दूध की आवश्यकता होती है, इसमें एक बूंद भी पानी शामिल नहीं होना चाहिए. छह महीने से कम के बच्चे को मां के दूध के अलावा किसी प्रकार का तरल पदार्थ और भोजन उसमें डायरिया और अन्य बीमारियों के खतरों को बढ़ा सकता है. पानी और अन्य दूसरे तरल पदार्थ और भोजन दूषित हो सकते हैं, जिसके कारण बच्चे को डायरिया हो सकता है.

झारखंड के बचपन का सूरत-ए-हाल

संकेतक   स्रोत झारखंड भारत

5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर

(प्रति 1000 बच्चों के जन्म में)

एनएफएचएस 4 (2015-16) 54 50

एसआरएस – 2014 44 45

एएचएस (2012-13) 51 --

शिशु मृत्यु दर (एक साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर)

(प्रति एक हजार जीवित जन्में बच्चों में)

एनएफएचएस 4 (2015-16) 44 41

एसआरएस (2015) 32 37

एएचएस ( 2012-13) 36 --

नवजात मृत्यु दर ( जन्म के 28 दिनों के दौरान होने वाली मृत्यु)

(प्रति एक हजार जीवित जन्में बच्चों में) 

एसआरएस (2014) 25 26

एएचएस (2012-13) 23 --

संस्थागत प्रसव का प्रतिशत

आरएसओसी (2013-14) 56.6 78.7

एएचएस (2012-13) 46.2 --

एनएफएचएस 4 (2015-16) 61.9 78.9

जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान करने वाले बच्चों का प्रतिशत

आरएसओसी (2013-14) 32.7 44.6

एएचएस (2010 -11) 38 --

एनएफएचएस 4 (2015-16) 33.2 41.6

6 महीने से अधिक उम्र के बच्चे

(जिन्हें कम से कम 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध दिया गया- प्रतिशत में)

आरएसओसी (2013-14) 64.3 64.9

एएचएस (2012-13) 50.2 --

एनएफएचएस 4 (2015-16) 64.8 54.9

6-24 महीने के बच्चे

(जिसे पूरक आहार के साथ-साथ स्तनपान कराया गया- प्रतिशत में)

एनएफएचएस 4 (2015-16) 47.2 42.7

5 साल से कम उम्र के कम वजन वाले बच्चों को प्रतिशत 

एनएफएचएस 4 (2015-16) 47.8 35.7

12 -23 महीने के पूर्ण टीका प्राप्त बच्चों का प्रतिशत 

एएचएस (2012-13) 69.9 --

आरएसओसी (2013-14) 64.9 65.3

एनएफएचएस 4 (2015-16) 61.9 62

15-49 वर्ष की एनीमिया ग्रस्त महिलाओं का प्रतिशत 

एनएफएचएस 4 (2015-16) 65.2 53

6-59 महीने के एनीमिया ग्रस्त बच्चों का प्रतिशत 

एनएफएचएस 4 (2015-16) 69.9 58.4

आयोडिनयुक्त नमक का उपयोग करने वाले घरों का प्रतिशत

आरएसओसी (2013-14) 54.9 67.4

एनएफएचएस 4 (2015-16) 97.6 93.1

विटामिन- ए की खुराक प्राप्त करने वाले 9-59 माह के बच्चों का प्रतिशत 

एनएफएचएस 4 (2015-16) 52.9 60.2

डायरिया ग्रस्त बच्चे, जिन्हें ओआरएस घोल दिया गया (प्रतिशत में)

आरएसओसी (2013-14) 74 54.4

एनएफएचएस 4 (2015-16) 44.8 50.6 

(स्त्रोत : यूनिसेफ झारखंड)

गर्भ के दौरान आहार

इस तरह की मान्यता है कि अगर माताएं गर्भ के दौरान अधिक भोजन ग्रहण करती हैं, तो बच्चे का वजन एवं आकार बड़ा होने के कारण उन्हें काम करने में मुश्किलें आ सकती है. इसकी वजह से बहुत सारी माताएं उचित आहार लेने से परहेज करती हैं, जिसके कारण बच्चे का वजन कम हो सकता है और उसे अन्य कई दूसरी परेशानियां भी हो सकती हैं.

संस्थागत प्रसव

बहुत सारी माताएं घर के पारिवारिक माहौल में बच्चे को जन्म देने में ज्यादा आरामदेह महसूस करती है. कुछ यह भी महसूस करती है कि सरकारी अस्पतालों में उनकी सही देखभाल नहीं की जायेगी. अस्पताल तक पहुंच और परिवहन की सुविधा भी एक कारक है, जिसके कारण घर पर प्रसव को सुविधाजनक मान लिया जाता है, लेकिन यह सुरक्षित नहीं है. हर हाल में संस्थागत प्रसव को तरजीह दी जानी चाहिए, क्योंकि यह बच्चा और जच्चा दोनों के लिए सुरक्षित है.

आयरन की गोली

कुछ लोगों में इस तरह की अवधारणा है कि गर्भवती माताओं को आयरन की गोली के सेवन से चक्कर और मितली की शिकायत हो सकती है. वहीं, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गर्भवती माताओं को आयरन की गोली खाने से उनके बच्चे काले रंग के होंगे. यह पूरी तरह से गलत धारणा है.