aamukh katha

  • Apr 21 2017 12:57PM

बच्चों में हाथ धोने की आदत डालने पर जोर कम पानी अपनाएं, एक-तिहाई बीमारी भगाएं

बच्चों में हाथ धोने की आदत डालने पर जोर कम पानी अपनाएं, एक-तिहाई बीमारी भगाएं
पंचायतनामा डेस्क
पानी की कमी से हर कोई परेशान है. कोई पानी को संजोने की बात कहता है, तो कोई इसके लिए कई उपाय भी खोज निकाले हैं. पानी के साथ अपने आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता अपनाने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है. केवल पानी और शौचालय की बात से ही पूरी स्वच्छता अपनाने की बात नहीं बनती बल्कि हाथ धोने की प्रक्रिया को वृहद स्तर पर अपनाने की जरूरत पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है. इस दिशा में बच्चों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. इसकी चर्चा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जल संरक्षण में इसकी महती भूमिका है. कम पानी का उपयोग कर कई बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है.

इसी को ध्यान में रखकर यूनिसेफ, झारखंड ने स्कूली बच्चों में हाथ धोने की प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया है. यूनिसेफ, झारखंड ने कई स्कूलों में बच्चों को हाथ धोने से होने वाले लाभ और हानि के बारे में विस्तार से बताया. राज्य के सरकारी स्कूलों की त्रासदी है कि औसतन सौ-डेढ सौ बच्चों पर मात्र एक चापानल है, तो ऐसी स्थिति में संभव ही नहीं है कि मिड डे मिल से प्राप्त भोजन करने के बाद सभी बच्चे अच्छी तरह से हाथ धोते हो. इसी परेशानी को देखते हुए यूनिसेफ, झारखंड की टीम ने एक छोटा-सा प्रयास किया और इस प्रयास से अब सभी बच्चे आसानी से खाना खाने के बाद अपना हाथ धोते हैं. इसके तहत चापानल से एक टैंक को जोड़ा और फिर उस टैंक के सहारे छह-सात नल लगा दिये. इससे फायदा यह हुआ कि पहले जहां बच्चे एक ही चापानल के भरोसे रहते थे और बच्चों की काफी भीड़ होने के कारण कई-कई बच्चे खाना खाने या शौच जाने के बाद हाथ भी नहीं धोते थे, वहीं अब इस नल के लग जाने से सभी बच्चे हाथ धोने लगे. इसके लिए बकायदा बच्चों को स्वच्छता के प्रति जागरूक भी किया गया. इस काम में 14वें वित्त से काफी सहायता मिली. हाथ धोने की प्रक्रिया पर विशेष जोर इसलिए दिया जा रहा है कि इससे करीब एक तिहाई बीमारियां अपने आप खत्म हो जाती है. इस काम के लिए बच्चों को चुनने के पीछे यूनिसेफ, झारखंड की सोच है कि अगर बच्चे हाथ धोने की प्रक्रिया को अपनायेंगे, तो वो अपने घरों में अन्य सदस्यों को भी ऐसा करने के लिए बाध्य करेंगे. इस काम में पंचायत जनप्रतिनिधियों की भी अहम भूमिका है और कई पंचायत जनप्रतिनिधियों ने इस दिशा में बेहतर काम भी किया है. 
 
(जल, स्वच्छता एवं स्वस्थ रहना) 
वाश यानी स्कूली बच्चों के बीच स्वच्छता, पीने के पानी और हाथ धोने के व्यवहार को बढावा देने के लिए यूनिसेफ, झारखंड ने एक विशेष पहल की है. यूनिसेफ ने सिमडेगा जिले में 20 स्कूलों में छात्रों को दोपहर के भोजन से पहले हाथ धोने के लिए हाथ धोने की इकाई प्रदान की है. 14वें वित्त के तहत मुखियाओं को भी अपने-अपने क्षेत्रों के स्कूलों में हाथ धोने की इकाइयां स्थापित करने को प्रोत्साहित किया गया है. 
 
बच्चों में स्वच्छता अपनाने को लेकर मुखिया सम्मानित 
सिमडेगा जिले के ठेठइटांगर प्रखंड स्थित मध्य विद्यालय में छात्रों के लिए हाथ धोने की इकाई स्थापित की गयी. यह काम यूनिसेफ की टीम से प्रोत्साहन मिलने के बाद ठेठइटांगर पंचायत के मुखिया ने इस दिशा में पहल शुरू की. यूनिसेफ के मार्गदर्शन और मुखिया के सहयोग से विद्यालय में 14वें वित्त से हाथ धोने की इकाई यानी चापानल से टैंक तक पानी ले जाना और वहां से कई नल के द्वारा पानी देने की व्यवस्था की गयी. इससे जहां छात्रों को स्वच्छता अपनाने में सहूलियत हुई, वहीं अपने परिजनों को भी स्वच्छता अपनाने पर जोर दिया. यह देश के अन्य मुखिया और सरपंचों के लिए एक प्रेरणा है. बच्चों में स्वच्छता अपनाने को लेकर सिमडेगा के तत्कालीन उपायुक्त विजय कुमार सिंह ने मुखिया को सम्मानित भी किया. 
 
 
पंचायतों के पास हो सुरक्षित पानी की पहुंच 
इस साल विश्व जल दिवस का विषय अपशिष्ट जल को कम करने और दोबारा उपयोग करने के तरीके पर केंद्रित है क्योंकि हमारे घरों, शहरों, उद्योगों और कृषि से 80% से अधिक अपशिष्ट जल पर्यावरण से प्रदूषण को वापस प्रदूषित करता है. यह सतत विकास लक्ष्य-छह से जुड़ा है. 2030 तक सभी के लिए पानी और स्वच्छता की उपलब्धता और टिकाऊ प्रबंधन सुनिश्चित करना, इसमें असंसाधित अपशिष्ट जल के अनुपात में कमी करने और जल रीसाइक्लिंग कर दोबारा उपयोग में लाने के लिए एक लक्ष्य भी शामिल है. पंचायत के पास सुरक्षित पानी की पहुंच होनी चाहिए. सुरक्षित पीने के पानी के कारण डायरिया से होनेवाली मृत्यु दरों में कमी आयेगी और इससे पांच साल से कम उम्र के बच्चों में पोषण होगा. इसके अलावा पानी एकत्र करने की जिम्मेवारी हमेशा महिलाओं पर रहता है. कुछ क्षेत्रों में महिलाओं ने दिन में पांच घंटे ईंधन की लकड़ी और पानी का संग्रह करने में खर्च किया है. यह पानी के टिकाऊ प्रबंधन द्वारा किया जाना चाहिए. 
डॉ मधुलिका जोनाथन, प्रमुख, यूनिसेफ झारखंड 
 
बच्चों में हाथ धोने के आदत को मिले बढ़ावा 
स्वच्छ भारत मिशन केवल शौचालयों तक ही सीमित नहीं है बल्कि सुरक्षित पीने के पानी, ठोस तरल अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता पर इसके समान ध्यान केंद्रित है. भोजन से पहले साबुन से हाथ धोना और शौच के बाद हाथ धोने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए कई पंचायत इसको लेकर गंभीर भी है, जिससे भविष्य में बच्चों के स्वास्थ्य और कल्याण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.
कुमार प्रेमचंद, वाश विशेषज्ञ, यूनिसेफ झारखंड
 
पानी व्यवस्था की प्रबंधक भारतीय महिलाएं
यह बात सौ प्रतिशत सच भी है कि भारत में स्त्रियां जन्मजात प्रबंधक होती हैं. वैसे तो एक कुशल प्रबंधन समाज के हित में व्यक्ति का विकास करता है, लेकिन किसी समाज की सबसे आधारभूत इकाई परिवार में प्रबंधन उस घर की मुख्य महिला ही करती है, जो भारत में दादी, मां या पत्नी हो सकती है. इनके अलावा परिवार में जो अन्य महिला सदस्य होती हैं, वे प्रमुख महिला प्रबंधक की सहायिकाओं के रूप में घरेलू प्रबंधन में अपने-अपने अनुकूल हाथ बटांती हैं. कोई भी घरेलू छोटे-बड़े काम हों, भारतीय महिला से अधिक कुशल प्रबंधक कोई हो ही नहीं सकता. इन कामों में सबसे महत्वपूर्ण काम होता है, अपने-अपने घरों में पानी की व्यवस्था सुचारु रूप से बनाये रखना. पानी वैसे भी जीवन का मूलभूत आधार और आहार है, यह बताना कोई नयी बात नहीं है. पानी हमारे लिए कितना अहम है. यह भी हम सभी भलीभांति जानते हैं. हमारे शरीर का 70 प्रतिशत और पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग पानी से बना हुआ है. पृथ्वी की इस कुल जलराशि का 1.6 प्रतिशत पानी भूमिगत है और लगभग 0.001 प्रतिशत पानी वाष्प और मेघों के रूप में विद्यमान है. पृथ्वी की सतह पर जो पानी है उसमें से भी एक बड़ी मात्रा 97 प्रतिशत सागरों और महासागरों में समायी हुई है, जो पेयजल की श्रेणी में नहीं आती. केवल तीन प्रतिशत, जो पानी पीने योग्य है, उसमें से भी 2.4 प्रतिशत हिमनदों और उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों में जमा हुआ है. अब शेष मात्र 0.6 प्रतिशत पानी, जो नदियों, झीलों और तालाबों में मिलता है, वास्तव में पेयजल है. आंकड़ों के अनुसार, एक व्यक्ति औसतन 30-40 लीटर पानी प्रतिदिन इस्तेमाल करता है. भारत के घरों में इस प्रतिदिन वाले पानी की व्यवस्था महिलाएं ही बनाये रखती है. इस विषय पर चिंतन की आवश्यकता है. देखने में या सुनने में ऐसा लगता है कि इसमें चिंतन करने जैसी कौन-सी गहरी बात है. लेकिन, थोड़ा सोचिए एक दिन भी यदि अचानक आपके घर का नल आना बंद हो जाये, तो सबसे पहले चिंता की शिकन उस घर की महिला के चेहरे पर ही दिखाई देती है. वह येन-केन प्रकारेण घर के लिए पानी की जुगाड़ शुरू कर देती है और इंतजाम करने पर घर के ड्रम से लेकर चम्मच तक पानी से लबालब भरकर रखने की व्यवस्था वही करती है. वह अगले कुछ दिनों तक पानी नहीं आने की स्थिति में भी किस तरह घर को सीमित पानी की मात्रा में चलाना है, इससे संबद्ध रणनीति मन-ही-मन बुन लेती है और कपड़े धुलने के बाद बचे गंदे पानी का इस्तेमाल बड़ी निपुणता से शौचालय में कर लेने का प्रबंध भी कर लेती है. अमूमन हर भारतीय घर चाहे वह गांव, कस्बा, नगर, शहर और महानगर का हो, दिन की शुरुआत उस घर की महिला से ही होती है. अतः वही गृह-स्वामिनी होती है. भारत में गरीब, निम्न व मध्यमवर्गीय परिवारों की बहुलता है, इसलिये यहां हम बहुलता वाले घरों में पानी की व्यवस्था पर विमर्श कर रहे हैं, जहां जल प्रबंधन वाकई एक प्रमुख घरेलू व्यवस्था के रूप में मायने रखता है.