aamukh katha

  • Apr 21 2017 1:01PM

पानी को संजो कर रखना हर एक की जिम्मेवारी

पानी को संजो कर रखना हर एक की जिम्मेवारी
लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये हर साल विश्व जल दिवस मनाया जाता है. पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और व्यापार सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जल के महत्व की ओर लोगों की जागरूकता बढ़ाना अहम मुद्दा है. वर्ष 2017 में विश्व जल दिवस का थीम ‘अपशिष्ट जल’ रखा गया है, वहीं वर्ष 2018 में विश्व जल दिवस का थीम ‘जल के लिए प्रकृति के आधार पर समाधान’ होगा. पानी के महत्व को जानने और पानी के संरक्षण के बारे में सचेत होना बहुत जरूरी है. आंकड़े बताते हैं कि विश्व के डेढ़ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है. आम जीवन में पानी की कितनी जरूरत है, इसे इसी से समझा जा सकता है कि देश में महिलाएं हर रोज पीने के पानी के लिए औसतन चार मील पैदल चलती है. यह नजारा ग्रामीण क्षेत्रों में आपको बखूबी देखने को मिलती है. नदियां पानी का सबसे बड़ा स्रोत है. जहां एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं, वहीं कल-कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं. अब समय आ गया है कि हम बारिश के पानी को अधिक-से-अधिक संजो कर रखें. पानी का एक-एक बूंद कीमती है. इन्हें सहेजना बहुत जरूरी है. इसे हम और आप दोनों को संजो कर रखना होगा, तभी हम पानी को नहीं तरसेंगे. 
 
चायतनामा डेस्क
अगर खेत से पानी बह कर बाहर चला जाता है, तो उस के साथ ऊपर की सबसे उपजाऊ मिट्टी भी बह जाती है. इसलिए पानी बचाने से मिट्टी भी बचती है. खेत में अधिक-से-अधिक बरसात का पानी इकट्ठा करें. पानी और मिट्टी बचाने के लिए बरसात से पहले मेढ़ों की संभाल होनी चाहिए. खेत में ढलान वाले कोने में छोटे गड्ढे बना कर पानी संजोया जा सकता है. 
पानी बर्बाद होने से ऐसे बचाएं
 पीने के पानी के लिए छोटे गिलासों का उपयोग करें
पानी पीते समय जूठा पानी न छोड़ें
घर के बगीचे या पौधों को सूर्योदय से पहले या शाम ढलने पर पानी दें
कपड़े निचोड़ने और धोवन से बचे पानी से ही पोंछा लगाये
बच्चों को खुद नहलायें ताकि बच्चे पानी व्यर्थ न बहा पायें
नहाने के टब व बाथरूम फव्वारे का इस्तेमाल न करें, इससे पानी की अधिकाधिक बर्बादी होती है
शौचालय में फ्लश का उपयोग कम करें. घर के अन्य कामों से बचा पानी ही इस्तेमाल करें
दो पहिया और चार पहिया वाहनों को सिर्फ गीले कपड़े से ही पोछें
गांव, शहर या कस्बे से निकलने वाले नालों पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बोल्डर डाल कर पानी की रफ्तार कम करने की कोशिश करें
खेतों के ढलान वाले हिस्से में खेत तलाई बना कर वर्षा का पानी एकत्र करें
जैसे भी संभव हो वर्षा जल को भूमिगत कराने का प्रयास करें
अपने आस-पास के तालाबों को प्रति वर्ष सामूहिक मदद में गहरा करने का प्रयास करें
सिंचाई का पानी बचाने के लिए ड्रिप व फव्वारा सिंचाई अपनायें
क्या है भूजल संचयन 
वर्षा ऋतु में बारिश का पानी व नहरी जल का संचय तथा कृत्रिम ढंग से पानी भरे जाने को लेकर भूमिगत जल को बढ़ाया जाता है. 
 
भूजल संचयन के लाभ 
 
वर्षा जल जीवाणुओं रहित तथा खनिज पदार्थ मुक्त होता है
यह बाढ़ जैसी आपदा को कम करता है
भूमि जल की गुणवत्ता को बढ़ाता है
 
बूंद-बूंद पानी का इस्तेमाल
पानी के नल से अगर एक-एक बूंद भी लगातार रिसती रहे, तो पूरे दिन में करीब 17 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है. इसलिए पानी की बूंद-बूंद का सही इस्तेमाल करना और पानी की बर्बादी रोकना जरूरी है.
 
पानी के स्रोतों का संरक्षण
अधिकांश गांवों में पीने के पानी की आपूर्ति उथले गड्ढेनुमा कुओं से होती है. ये कुएं चारों ओर से व्यवस्थित रूप से बंधे न होने के कारण इनमें जलस्तर जमीन की सतह के पास होता है. इनमें जमीन की धूल और बारिश एवं नाली का गंदा पानी कुएं में जाता रहता है और इस वजह से इस पानी में मच्छर भी पनपते हैं. इसके अलावा गांव में खुले स्थानों पर मलमूत्र विसर्जन की व्यवस्था प्रचलित होती है या फिर घरों में झड़ाउ शौचालय होते हैं और इनकी गंदगी भी अंतत: खुले स्थानों पर फेंके जाने के कारण बरसात के दिनों में यह गंदगी बिना मुंडेर वाले कुओं में बारिश के पानी के साथ चली जाती है, जिससे पीने योग्य पानी के दूषित होने का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. इसलिए पीने योग्य पानी के सभी स्रोतों में मलमूत्र मिले होने की जांच करने के लिए नियमित रूप से एच2एस परीक्षण करना चाहिए. इस लिहाज से पानी को प्रदूषित करने वाले स्रोतों को समाप्त करना और जलस्रोतों के आसपास वाले क्षेत्र को गंदगी से मुक्त करना बेहद जरूरी है, तभी इनके पानी के उपयोग की अनुमति देनी चाहिए.
 
 
सिक्किम सीखा रहा स्प्रिंग्स (धारा) सहेजना
पूर्वोत्तर हिमालय में लगभग 7096 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला सिक्किम वैसे तो है बहुत छोटा राज्य, लेकिन इस छोटे राज्य ने स्प्रिंग्स (धारा) को सहेजने के लिए जो बड़ा काम किया है, उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है. सिक्किम ने स्प्रिंग्स को सहेजकर अपने लोगों के लिए पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित कर दी है. मजेदार बात यह है कि सिक्किम ने सरकारी योजनाओं के बूते ही स्प्रिंग्स को संरक्षित कर लिया है. सरकारी योजनाओं के संबंध में अक्सर कहा जाता है कि इसमें लूटखसोट होती है व इसका लाभ लोगों को नहीं मिल पाता है. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि सिक्किम ने इस मिथक को भी तोड़ा है. सिक्किम की आबादी पांच लाख 40 हजार है. यहां के गांवों में रहने वाली आबादी का 80 प्रतिशत (65,000) हिस्सा पीने व अन्य जरूरतों के लिए स्प्रिंग्स के पानी पर निर्भर है. इससे समझा जा सकता है कि स्प्रिंग्स यहां के लिए कितना जरूरी है, लेकिन रख-रखाव के अभाव व स्प्रिंग्स को बचाने की कोई मजबूत व दूरदर्शी योजना नहीं होने के कारण यहां के स्प्रिंग्स बेहद दयनीय हालत में पहुंच गये थे. स्प्रिंग्स को सिक्किम में धारा भी कहा जाता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सिक्किम में अब तक 704 स्प्रिंग्स की मैपिंग की गयी है, लेकिन रख-रखाव नहीं होने से अधिकतर स्प्रिंग्स की जल संचयन क्षमता कम होने लगी थी व कई सूखने के कगार पर पहुंच गये थे. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी थी कि सिक्किम में बारिश अनियमित हो गयी थी व जितनी भी बारिश होती थी, उसके पानी का बेहतर प्रबंधन नहीं होता था. सिक्किम के सूखते स्प्रिंग्स को बचाने की मुहिम वर्ष 2008 से शुरू हुई थी. इसके लिये स्प्रिंग शेड डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया व डब्ल्यूडब्ल्यूआई-इंडिया, पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट (देहरादून) व एक्वाडैम की भी मदद ली गयी. इस योजना के तहत कलुक, रेनोक, रवांगला, शुंबुक, मनथांग व अन्य ब्लॉक के कम-से-कम 50 स्प्रिंग्स को नया जीवन दिया गया. बताया जाता है कि इन स्प्रिंग्स की वाटर रिचार्ज क्षमता में अब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी है. सिक्किम सरकार के पदाधिकारियों की मानें तो सिक्किम में 82 प्रतिशत स्प्रिंग्स निजी भूखंड पर है. ऐसे में इनके विकास के लिए इन भूखंडों के मालिकों को विश्वास में लेना भी कठिन कार्य था, लेकिन पानी की किल्लत के कारण परेशानी से जूझ रहे लोग तुरंत तैयार हो गये. इस पूरी मुहिम में ग्रामीणों के सहयोग ने बड़ा काम किया. इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर विलेज वाटर सेनिटेशन कमेटी का गठन किया गया व लोगों से अपील की गयी कि वे वनों की कटाई न करें, बल्कि अधिक-से-अधिक पेड़ लगाएं. सिक्किम सरकार के इस काम से प्रभावित होकर ही योजना आयोग ने वर्ष 2012 में मनरेगा के तहत होने वाले कामों की सूची में स्प्रिंग्स शेड डेवलपमेंट में शामिल कर लिया. वहीं, बेहतर काम के िलए ‘प्राइम मिनिस्टर अवार्ड फॉर एक्सिलेंस इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’भी दिया गया.
 
 
वर्षा जल संचय की जरूरत
जल संचयन में घर की छतों, स्थानीय कार्यालयों की छतों या फिर विशेष रूप से बनाये गये क्षेत्र से बारिश के पानी को एकत्रित किया जाता है. इसमें दो तरह के गड्ढे बनाये जाते हैं. एक गड्ढा जिसमें दैनिक प्रयोग के लिए जल संचय किया जाता है और दूसरे गड्ढे का उपयोग सिंचाई के काम में किया जाता है. दैनिक प्रयोग के लिए पक्के गड्ढे को सीमेंट व ईंट से निर्माण करते हैं और इसकी गहरायी सात से दस फीट तथा लंबाई व चौड़ाई लगभग चार फीट होती है. इन गड्ढों को नालियों व नलियों (पाइप) द्वारा छत की नालियों और टोटियों से जोड़ दिया जाता है, जिससे वर्षा का जल सीधे इन गड्ढों में पहुंच सके और दूसरे गड्ढे को ऐसे ही (कच्चा) रखा जाता है. इसके जल से खेतों की सिंचाई की जाती है. घरों की छत से जमा किये गये पानी को तुरंत ही प्रयोग में लाया जा सकता है. 
 
जल स्त्रोतों का बचाव
वर्षा के एकत्रित जल का भरपूर संग्रहण करना जरूरी है. इनमें भूजल का पुनर्भरण, जल गुणवत्ता का संरक्षण व जल स्त्रोतों को सुरक्षित रखना शामिल है. पहले जल का असीमित भंडार था, लेकिन अब स्थिति गंभीर है. ऐसे में जल के स्त्रोतों को बचाना बहुत जरूरी है. बरसात के पानी का संचय और भूमिगत जल स्तर को गिरने से रोकने के लिए हर दिशा में प्रयास होना आवश्यक है.
 
वर्षा जल जमा करने के तरीके
शहरी क्षेत्रों में वर्षा के जल को संचित करने के लिए बहुत-सी संचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल का संचयन वाटर शेड को एक इकाई के रूप लेकर करते हैं. आमतौर पर सतही फैलाव तकनीक अपनायी जाती है क्योंकि ऐसी प्रणाली के लिए जगह प्रचुरता में उपलब्ध होती है तथा जल की मात्रा भी अधिक होती है. ढलान, नदियों व नालों के माध्यम से बेकार बह रहे पानी को बचाने के लिए इन तकनीकों को अपनाया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में छत से प्राप्त वर्षा जल से उत्पन्न अप्रवाह संचित करने के लिए भी बहुत-सी संरचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है.
 
गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में
 
झारखंड में वर्षा जल संवर्द्धन को लोगों तक पहुंचाने के लिए राज्य सरकार की ओर से ‘गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में’ नामक अभियान चलाया गया. इसके अंतर्गत छह लाख से अधिक डोभा का निर्माण किया गया. इसके साथ ही वर्षा जल के बेहतर उपयोग के लिए पुराने तालाबों, डैमों एवं नहरों का कार्य जल संसाधन विभाग द्वारा कराया जा रहा है ताकि वर्षा जल का बेहतर संरक्षण हो सके. शहरी क्षेत्रों में भी सरकारी भवनों एवं बड़े मकानों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था करायी जा रही है. झारखंड मुख्यत: ग्रामीण प्रधान एवं कृषि पर आधारित है. लगभग 76 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं एवं कुल कृषि श्रम शक्ति का 66.85 प्रतिशत कृषि एवं इससे संबंद्ध कार्यकलापों पर आधारित है. राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था में लघु एव सीमांत किसानों की संख्या अधिक है, जिसमें 83 प्रतिशत खेत दो हेक्टेयर से कम आकार के हैं, जो कुल कृषि योग्य भूमि का 37 प्रतिशत है. मात्र 0.69 प्रतिशत खेत ही ऐसे हैं, जिनका रकबा 10 हेक्टेयर से बड़ा है और ऐसे खेत कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र नौ प्रतिशत है. राज्य की कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र 13 प्रतिशत ही सुनिश्चित सिंचाई सुविधा के अंतर्गत आता है तथा शेष 87 प्रतिशत भाग वर्षा आधारित ही है. लगभग 30 प्रतिशत भू-भाग पर सिंचाई सुविधाएं है, लेकिन इन क्षेत्रों पर वृहद कृषि कार्य शुरू नहीं कराये जा सके हैं. राज्य की कृषि में कुल कृषि योग्य भूमि का 90 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन के लिए प्रयोग में लाया जाता है और मात्र चार से छह प्रतिशत अंश ही नकदी फसलों पर उपयोग किया जाता है. इसी तरह कुल कृषि योग्य भूमि का 80 प्रतिशत भाग एक-फसली है, जिस पर धान की पैदावार होती है, शेष 20 प्रतिशत भाग पर ही एक से अधिक फसलों का उत्पादन किया जाता है और यह मुख्यतः सब्जी है.
 
50हजार से अधिक क्षेत्रों का पानी पीने योग्य नहीं
देश के 66,663 इलाके आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित होने के कारण पीने लायक नहीं है
वर्ष 2022 तक पाइप के जरिये 80 प्रतिशत लोगों तक पहुंचाया जायेगा पानी 
पेयजल राज्य का विषय है, जिसे केन्द्र अपनी अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से सहयोग करता है
खनन क्षेत्र में स्वच्छ पीने के पानी के लिये सरकार ने एक अलग योजना बनायी है
पेयजल के सुधार के लिये प्रत्येक राज्य में 800 करोड़ रुपये आवंटन की योजना बनायी है
आर्सेनिक से सबसे अधिक प्रभावित राज्य राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 100-100 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता उपलब्ध करायी
अन्य फ्लोराइड और आर्सेनिक प्रभावित राज्यों के लिये 25,000 करोड़ की विशेष योजना पर सरकार काम कर रही है
देश में लोगों को साफ और स्वच्छ पानी देने के लिये 9113 ड्रिंकिंग वाटर स्टेशन लगाये गये हैं 
एक लाख स्कूलों को प्रतिदिन 1000 लीटर पानी उपलब्ध कराने पर काम चल रहा है, जिस पर 20,000 करोड़ रुपये होंगे
पानी की उपयोगिता 
 
ब्रश करते समय नल खुला न छोड़े, वरना पांच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है
बाथ टब में नहाते समय 300 से 500 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में 100 से 150 पानी लीटर खर्च होता है
विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से दो व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है
प्रति वर्ष तीन अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है
आलू और अनन्नास में 80 प्रतिशत और टमाटर में 15 प्रतिशत पानी है
एक लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है
एक किलो गेहूं उगाने के लिए 1000 लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 4000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है.
देश में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है
 
बूंद-बूंद की कीमत
 
विश्व में मौजूद कुल ताजा पानी का महज चार प्रतिशत ही भारत में है
आज भी करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं
करीब 15 लाख बच्चों की मौत दस्त से होती है
पानी से होने वाली बीमारियों के कारण करीब 7.3 करोड़ कार्य दिवस बर्बाद हो जाते हैं
देश के ग्रामीण इलाकों में लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या पूरी तरह पानी पर ही निर्भर
देश में जमीन की सतह के ऊपर और नीचे कुल 1,869 अरब घनमीटर ताजा पानी मौजूद है, जिसमें करीब 40 प्रतिशत पानी का उपयोग नहीं होता
इस्तेमाल योग्य भूजल का करीब 92 प्रतिशत खेती में, पांच प्रतिशत उद्योगों में और तीन प्रतिशत घरेलू उपयोग में आता है
सतह के ऊपर मौजूद पानी का 89 प्रतिशत खेती में, दो प्रतिशत उद्योग में और नौ प्रतिशत घरों में प्रयोग होता है
देश में बढ़ती जनसंख्या के साथ ही प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटती जा रही है.
 
देश में प्रति व्यक्ति पानी की सालाना उपलब्धता 1545 घनमीटर है
किसी देश में जब प्रति व्यक्ति पानी की सालाना उपलब्धता 1700 घनमीटर से कम हो जाती है, तो उसे पानी की कमी वाला (वाटर स्ट्रेस्ड) देश कहा जाता है. इस लिहाज से भारत अब पानी की कमी वाला देश है. यह एक खतरनाक स्थिति है.
 
भारत के मध्य क्षेत्र की सूखती और प्रदूषित होती नदियों का संदेश
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे सीहोर, अशोक नगर, रायसेन, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले में बहने वाली 32 नदियों में से केवल पांच नदियों में थोड़ा-बहुत प्रवाह बचा है. रायसेन और विदिशा जिले की जीवनरेखा कही जाने वाली बारहमासी बेतवा नदी मार्च के पहले सप्ताह में ही अपने मायके में सूख गयी है. यह पहला मौका है जब औसत (109 मिलीमीटर) से अधिक (139 मिलीमीटर) पानी बरसने के बाद भी, गर्मी के मौसम के दस्तक देने के पहले ही, भारत के मध्य क्षेत्र में बहने वाली, गंगा नदी कछार की इतनी सारी नदियों को जल अभाव का सामना करना पड़ रहा है. यह संकेत अच्छा नहीं है. गौरतलब है कि बेतवा नदी की देशव्यापी पहचान प्रस्तावित केन-बेतवा लिंक योजना के कारण है. लगभग 590 किलोमीटर लंबी इस नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के झिरी ग्राम से है. बेतवा का उसके प्रारंभिक मार्ग में ही मार्च के पहले सप्ताह में सूखना, आनेवाले दिनों की हकीकत का संकेत है. इसके अलावा पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदीजोड़ योजना की पार्वती नदी सीहोर, गुना, राजगढ़ जिलों में सूखने के कगार पर है. वही हाल कालीसिंध नदी का है, जो राजगढ़ और विदिशा में अपना प्रवाह खो रही है. इन संकेतों की हकीकत को समझने के लिए भारत के मध्य क्षेत्र में स्थित पहाड़ी नदी तंत्र और इलाके की कुछ बुनियादी बातें जानना बेहतर होगा. इसके लिए उदाहरण के बतौर अगले हिस्से में बहुचर्चित बेतवा से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों को समझने का प्रयास किया जा रहा है. बेतवा और उसकी सहायक नदियों का उद्गम विन्ध्याचल पर्वत की पहाड़ियों से है. उनके उद्गम का प्रारंभिक भाग पहाड़ी है और कठोर बलुआ पत्थर से बना है. नदियां जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, जमीन का ढाल घटता है. बलुआ पत्थर का स्थान, बेसाल्ट की काली चट्टानें ग्रहण करती हैं. बेसाल्ट के साथ ही काली मिट्टी शुरू होती है. इन सभी चट्टानों में भूजल को सहेजने वाले परत (एक्वीफर) की मोटाई सामान्यतः बहुत ही कम होती है. उसकी पानी उपलब्ध कराने की ताकत भी कम होती है. वह परत, मोटाई के कम होने के कारण, बरसात के दिनों में बहुत जल्दी भर जाती है और सीमा से अधिक पानी निकालने की स्थिति में बहुत जल्दी रीत भी जाती है. इस हकीकत के बावजूद, कुछ साल पहले तक बेतवा और उसकी सहायक नदियों में साल भर पर्याप्त पानी बहता था. प्रवाह की निरंतरता ने भ्रम पैदा किया और सभी लोग भूल गये कि ऐसे इलाकों में जमीन के नीचे के पानी की निकासी बहुत सोच-समझ कर की जानी चाहिए. वे भूल गये कि ऐसी भूल कालान्तर में त्रासद हो सकती है. नदी-नाले, कुएं, तालाब और नलकूप असमय सूख सकते हैं. बेतवा और उसकी सहायक नदियों के मैदानी इलाके में पहुंचते ही गेहूं का इलाका प्रारंभ हो जाता है. यह इलाका पूरे देश में गेहूं के उत्पादन के लिए जाना जाता है. उल्लेखनीय है कि लगभग 50 साल पहले तक इस इलाके में मुख्यतः सूखी खेती की जाती थी, पर 1960 के बाद के सालों में कुओं और नलकूपों के बढ़ते प्रचलन के कारण इस इलाके की खेती में बदलाव आया.