aamukh katha

  • Jun 2 2017 12:39PM

किसानों की खातिर: योजनाएं अनेक, पर नहीं भरते पेट

किसानों की खातिर: योजनाएं अनेक, पर नहीं भरते पेट
किसान भाइयों के लिए राज्य व केंद्र सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की गयी है. इसका उद्देश्य है खेत-खलिहानी में काम करनेवाले किसानों की आजीविका सुगम करना. लेकिन, क्या किसानों के लिये लाये गये योजनाएं सही रूप में किसान भाइयों को मिल पा रहा है. अगर योजनाओं का लाभ किसान भाई उठाते, तो आज किसान भाइयों की ऐसी दशा कैसे होती. सवाल अनेक हैं, पर जवाब किसी के पास नहीं है. आखिर किसान भाइयों का हक कौन मार ले रहा है. अगर आपको नहीं मिल रही है जानकारी, तो आमुख कथा के इस अंक में आपके लिए बहुउपयोगी जानकारी दी जा रही है, ताकि आप अपने हक को प्राप्त कर सके. पढ़िए समीर रंजन का यह आलेख.
 
राज्य सरकार ने किसान भाइयों के लिए कई योजनाएं संचालित की है. खेत-खलिहान से लेकर सिंचाई, उन्नत बीज, मिट्टी की जांच, फसल उत्पादन की विधि, कटाई, बाजार आदि जानकारी मुहैया करा रही है. साथ ही कई योजनाओं के तहत किसानों को ऋण भी देने की व्यवस्था है. वित्तीय वर्ष 2017-18 में प्रत्येक जिले में पूर्व के अतिरिक्त 25 नये बीज ग्राम बनाये जायेंगे. साथ ही इस वर्ष 25 लाख किसानों को फसल बीमा योजना से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इसके अलावा गांव व पंचायत स्तर पर मृदा परीक्षण का कार्य, मिशन मोड नमूना संग्रह का कार्य 15 जून तक पूरा करने तथा इस वित्तीय वर्ष में दो लाख मिट्टी जांच का लक्ष्य रखा गया है. इस वित्तीय वर्ष यानी 2017-18 में 200 तालाबों के निर्माण का लक्ष्य और हर पंचायत में कम-से-कम एक-एक तालाब बनाना अनिवार्य है. बीज खरीद में तेजी लाने, परती जमीन को कृषि योग्य बनाने समेत अन्य कृषि कार्य योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है. 
 
 
वित्तीय वर्ष 2017-18 में राज्य सरकार की ओर से किसान भाइयों के लिए सिंचाई संबंधी कई योजनाएं हैं. इसमें बंजर भूमि/राइस फैलो विकास की योजना, जलनिधि योजना, छोटे एवं सीमांत कृषकों तथा स्वयं सहायता समूहों/किसान क्लब को पंप सेट वितरण योजना, महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कृषि यांत्रिकीकरण प्रोत्साहन योजना तथा केंद्र सरकार की ओर से कृषि मशीनीकरण पर उप मिशन (sub mission on agricultural machanization- SMAM) योजना किसान भाइयों के लिए संचालित की गयी है. कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, झारखंड सरकार कृषि कार्य के लिए मुख्य रूप से सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, कृषि यांत्रिकीकरण का प्रसार करने, बंजर भूमि/राइस फैलो के प्रसार तथा किसान भाइयों को गुणवत्तायुक्त प्रशिक्षण आदि कार्यक्रमों को प्राथमिकता के आधार पर कराया जा रहा है. 
 
बंजर भूमि/राइस फैलो विकास की योजना 
इस योजना के तहत प्रत्येक प्रखंड में सामान्यत: एक तालाब का जीर्णोद्धार किया जायेगा, जिससे अधिक से अधिक कृषि योग भूमि सिंचित हो सके. राज्य के विभिन्न जिलों में अतिरिक्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए करीब दो हजार सरकारी/निजी तालाबों के गहरीकरण/जीर्णोद्धार की योजना स्वीकृत हुई है. इस योजना का उद्देश्य मशीन द्वारा बड़े-बड़े सरकारी तालाबों के गहरीकरण/जीर्णोद्धार कराया जाना है, जिससे तालाबों के माध्यम से कृषि कार्यों के लिए अतिरिक्त सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध करायी जा सके. 
 
इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसान भाइयों को कुछ मापदंडों का अनुपालन करना चाहिए 
प्रस्तावित सरकारी या निजी तालाब का जल क्षेत्रफल अधिकतम पांच एकड़ होना 
सरकारी या निजी तालाब से न्यूनतम आठ से दस हेक्टेयर भूमि के पटवन सुविधा की क्षमता विकसित करना 
इन तालाबों का पिछले पांच वर्षों के दौरान किसी प्रकार का मरम्मत/जीर्णोद्धार कार्य नहीं किया गया हो
ऐसे जिला या प्रखंड, जहां पांच एकड़ से कम के सरकारी तालाब जीर्णोद्धार के लिए उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी स्थिति में निजी तालाब, जिनका सार्वजनिक उपयोग किया जा रहा है, का गहरीकरण/जीर्णोद्धार मशीन द्वारा कराया जाना है
 
कैसे होगा कार्य
इस योजना का कार्यान्वयन ग्राम/पंचायत स्तर पर गठित पानी पंचायत के लाभुकों द्वारा कराया जायेगा. इस योजना के तहत योजना प्राक्कलन की 90 फीसदी राशि सरकारी अनुदान के रूप में तथा 10 फीसदी राशि का पानी पंचायत के लाभुकों के द्वारा भुगतान किया जायेगा. इस योजना के कार्यान्वयन से करीब 2080 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में सिंचाई की सुविधा होगी. 
 
कृषि क्लिनिक योजना
इस योजना के तहत राज्य सरकार किसानों को तकनीकी परामर्श उपलब्ध कराने के लिए कृषि क्लीनिक की शुरुआत की है. इस क्लीनिक में कृषि स्नातकों द्वारा किसानों को मृदा स्वास्थ्य, पौधा संरक्षण, फसल बीमा, कटाई उपरांत तकनीकी, पशुचारा एवं चारा प्रबंधन पर जानकारी मुहैया करायी जायेगी. साथ ही आप अपना खुद का एग्रीक्लीनिक या कृषि व्यवसाय केंद्र की स्थापना कर सकते हैं और बड़ी संख्या में किसानों को व्यावसायिक विस्तार सेवाओं की पेशकश कर सकते हैं. कृषि स्नातकों या कृषि से संबंद्ध क्षेत्रों बागवानी, रेशम उत्पादन, पशु चिकित्सा विज्ञान, वानिकी, डेयरी, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन आदि में प्रारंभिक प्रशिक्षण देना है. प्रशिक्षण पूरा करनेवाले उद्यम के लिए प्रारंभिक ऋण के लिए आवेदन भी कर सकते हैं. कृषि क्लीनिकों के माध्यम से प्रोद्योगिकी, फसल, कीटों और रोगों से सुरक्षा, बाजार रुझान, बाजारों में विभिन्न फसलों के मूल्य और पशु स्वास्थ्य के लिए क्लीनिक सेवाएं इत्यादि के बारे में किसानों को विशेषज्ञ की राय और सेवाएं प्रदान करने की परिकल्पना की गयी है, जिससे फसलों/ पशुओं की उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि होगी.
 
बीज ग्राम योजना
बीज खरीद में तेजी लाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में प्रत्येक जिले में पूर्व के अतिरिक्त 25 नये बीज ग्राम बनाये जाने का लक्ष्य है. राज्य पहली बार बीज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम आगे बढ़ा रहा है. पहली बार राज्य में तीन लाख क्विंटल बीजों का उत्पादन हुआ है, जो पिछले वर्ष (एक लाख क्विटंल बीज) के उत्पादन का तीन गुना है. 
 
विशेष फसल योजना
इस योजना को सफल बनाने के लिए राज्य के विभिन्न जिलों में अलग-अलग फसलों की खेती के लिए वातावरण के अनुकूल योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है. मूंगफली, राजमा, तिल आदि की खेती के लिए हर क्लस्टर में योजना बनाने के साथ-साथ सभी प्रखंडों में 50-50 हेक्टेयर के क्लस्टर की कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया गया है, ताकि अगले वित्तीय वर्ष में खेती का काम समय पर शुरू किया जा सके. गढ़वा, लातेहार, दुमका सहित कई ऐसे जिले हैं, जहां विशेष फसल का उत्पादन हो रहा है. 
 
5000 बागवान मित्र को मिलेगा प्रशिक्षण
राज्य में बागवानी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बागवान मित्र बहाल हो रहे हैं. राज्य की मिट्टी उद्यानिकी के लिए अत्यंत उपयुक्त है. इसके विकास के लिए मानव बल की जरूरत है. राज्य में 5000 बागवान मित्र बनाकर उन्हें प्रशिक्षण किया जाना है, इससे राज्य के युवाओं का कौशल विकास तो होगा ही, साथ ही वे आत्मनिर्भर भी बनेंगे.
 
सभी बीज उत्पादकों का भुगतान डीबीटी से होगा
सभी बीज उत्पादकों को बीज अधिप्राप्ति का भुगतान डीबीटी के माध्यम से सुनिश्चित करें. सभी बीज उत्पादकों का बैंक खाता नंबर तथा मोबाइल नंबर लेकर उनका आधार सीडिंग का काम पूरा करना निर्धारित किया गया है. बीज खरीब की राशि सीधे किसानों के खाते में जाना चाहिए. बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए राज्य में जितनी भी बंजर भूमि है, उसकी ग्राम वार प्रोफाइलिंग करने तथा उसमें जुताई का काम शुरू करने पर जोर दिया गया है, ताकि खरीफ मौसम में खेती का कार्य अच्छी तरीके से किया जा सके.
 
जीवाणु एवं जैविक खाद :रसायनिक खादों एवं विभिन्न कृषि रसायनों ( कीटनाशक, फफूंद नाशक एवं खर-पतवार नाशक) के प्रयोग से खेतों की मिट्टी, जल, वायु एवं मानक सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि इन रसायनिक खादों की विकल्प के रूप में जीवाणु एवं जैविक खाद का प्रयोग किया जाए. जीवाणु खाद में दलहनी फसलों के लिए मुख्य रूप से अनाज के लिए ‘राइजोबियम कल्चर’, सब्जी वाली फसलों के लिए ‘एजोटोबैक्टर कल्चर’, धान फसल के लिए ‘नील हरित शैवाल (ब्लू ग्रीन एल्गी) कल्चर’ एवं जैविक खाद के लिए ‘वर्मी कम्पोस्ट’ एवं ‘इनरिच्ड’ का प्रयोग किया जाना आवश्यक है. जीवाणु खाद के लिए किसान भाई सावधानी भी बरतें. जीवाणु खाद को धूप एंव अधिक गर्मी से बचा कर सुरक्षित स्थान पर रखें. कल्चर जिस फसल का हो, उसका प्रयोग उसी फसल के बीज के लिए करना आवश्यक है. 
 
1. राइजोबियम कल्चर : दलहनी फसलों के जड़ों में गुलाबी रंग का गांठ बनता है. इन गाठों में ही राइजोबियम जीवाणु का निवास है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को जमीन में भेजा जाता है, जिन्हें पौधों द्वारा आसानी से शोषित कर लिया जाता है. इस कल्चर के प्रयोग से भूमि में लगभग 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन खाद का लाभ होता है. इसके आलावा उपज में लगभग 10 फीसदी की वृद्धि होती है. इस कल्चर खाद का प्रयोग मूंग, उरद, अरहर, सोयाबीन, मटर, चना, मूंगफली, मसूर एवं बरसीम के फसल में करते हैं. 
 
2. एजोटोबैक्टर कल्चर :यह सूक्ष्म जीवाणु भी राइजोबियम जीवाणु की तरह ही वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को भूमि में स्थापित करता है. ये जीवाणु जड़ों में किसी प्रकार का गांठ नहीं बनाते. ये जीवाणु मिट्टी में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रूप में पाये जाते हैं तथा नाइट्रोजन गैस के अमोनिया में परिवर्त्तित कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं. इस जीवाणु खाद के प्रयोग से 10-20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की प्राप्ति होती है. अनाज वाली फसलों में 10-20 फीसदी एवं सब्जियों में 10 फीसदी तक की उपज में वृद्धि पायी जाती है. इस कल्चर का प्रयोग गेहूं, जौ, मक्का, बैगन, टमाटर, आलू एवं तेलहनी फसलों में करते हैं.
 
3. एजोसिपरिलम कल्चर :इसके जीवाणु पौधों के जड़ों के आसपास और जड़ों पर समूह बना कर रहते हैं तथा पौधों को वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस उपलब्ध कराते हैं. इस कल्चर का प्रयोग ज्वार, बाजरा, महुआ, मक्का, घास एवं चारेवाली फसलों के पैदावार बढ़ाने के लिए करते हैं. इस जीवाणु खाद के प्रयोग से 15-20 किलोग्राम नेत्रजन प्रीत हेक्टेयर की प्राप्ति होती है.
 
4. नील हरित काई :नील हरित शैवाल यानी काई एक तंतुदार प्रकाश संश्लेषी सूक्ष्मजीव होते हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को जमीन स्थापित करते हैं एवं पौधों को उपलब्ध कराते है. काई, प्रकृति में उपलब्ध ऐसा जैविक स्रोत है, जिनका उपयोग धान की खेती में जैविक उर्वरक के रूप में किया जाता है. इसके उपयोग से खेत की मिट्टी में सुधार होता है. यह उसर भूमि सुधारने में भी लाभदायक है. शैवाल खाद के प्रयोग से रसायनिक उर्वरक का बचत होता है. इस खाद को किसान अपने घरों में खुद भी तैयार कर सकते हैं. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके, रांची के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग में किये गये अनुसंधान में यह पाया गया है कि नील हरित शैवाल खाद के प्रयोग से 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन की प्राप्ति होती है, जो लगभग 65 किलोग्राम रसायनिक उवर्रक (यूरिया) के बराबर है.
 
फास्को कम्पोस्ट :इस खाद में फास्फोरस (स्फुर) की मात्रा अन्य कम्पोस्ट खादों की अपेक्षा ज्यादा होता है. फास्को कम्पोस्ट में 3-7 फीसदी फास्फोरस (स्फुर) होता है, जबकि साध कम्पोस्ट में यह अधिकतम एक फीसदी तक पाया जाता है.
 
वर्मी कम्पोस्ट (केचुआ खाद) :वर्मी कम्पोस्ट में कार्बनिक पदार्थ एवं ह्युम्यस ज्यादा मात्रा में पाया जाता है. इस खाद में मुख्य पोषक तत्व के अतिरिक्त दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व कुछ हॉर्मोनस एवं इन्जाइस भी पाये जाते हैं, जो पौधों के वृद्धि के लिए लाभदायक हैं. वर्मी कम्पोस्टिंग में स्थानीय केंचुआ के किस्म का प्रयोग करें. यहां छोटानागपुर में एसेनिया फोटिडा नामक किस्म पायी जाती है, जो यहां के वातावरण के लिए उपयुक्त है.
 
खरीफ फसलों का बीजोपचार :25 मई के बाद से राज्य के किसान खरीफ मौसम के लिए धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मडुआ, उड़द, अरहर, तील, मूंगफली, सरगुजा आदि की बुआई के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं. इन फसलों की बुआई के पहले किसान भाई यह जान लें कि खड़ी फसलों में अधिकांश रोग का संक्रमण मुख्य रूप से बीज एवं मिट्टी के द्वारा होता है. बहुत छोटे-छोटे रोगाणु बीज की सतह पर या इसके अंदर स्थिर रहते हैं. इस प्रकार के दूषित बीजों की बुआई के बाद बीज पर चिपके हुए रोगाणु मिट्टी में अनुकूल वातावरण पाते ही काफी तेजी से वृद्धि कर मिट्टी में पतला सफेद धागा जैसा रोग के जाल का निर्माण करते हैं. जैसे ही बीज अंकुरित होना शुरू होता है, रोगाणु के सफेद जाल इसके अंदर प्रवेश कर पौधे को छोटी ही अवस्था में सूखा देते हैं. जब पौधा बड़ा होता है, तब बीज के द्वारा मिट्टी में पहुंचाये गये रोगाणु हवा के माध्यम से उड़ कर खड़ी फसल को भी रोगी बना देते हैं, जिससे उपज में काफी कमी आ जाती है. बुआई से पहले बीज को अनुशंसित रसायनों से उपचारित कर लेने से फसल के कई प्रकार की बीमारियों को रोका जा सकता है. किसान भाई, आप अपने फसल लगाने से पहले बीज का उपचार जरूर कर लें. अगर आप धान का फसल लगा रहे हैं, तो अनुशंसित रसायन कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर से अपने बीज को उपचारित कर लें. इसी तरह अगर आप मकई का फसल लगाने को सोच रहे हैं, तो अाप कैपटान या थीरम 75 प्रतिशत घुलनशील पाउडर से अपने बीजों को उपचारित कर लें. इसके अलावा मडुआ फसल के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, ज्वार या बाजरा के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, उड़द या अरहर के लिए कैपटान या थीरम 75 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, तील, मूंगफली, सुरगुजा के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर और अदरख का फसल लगाने से पहले आप अपने बीजों को ट्राइकोडर्मा के अनुशंसित रसायन से उपाचरित कर सक अपने फसलों को बीमारियों से बचा सकते हैं. इसके अलाव दलहनी बीजों का उपचार ट्राइकोडर्मा जैव कल्चर से किया जा सकता है. इससे बीज को उपचारित करने पर आपकी खड़ी फसल में उखड़ा रोग का प्रकोप नहीं होगा. किसान भाई, आप यह भी ध्यान रखें कि दलहनी फसलों को बोरे से पहले आप राइजोबियम कल्चर से अपने बीजों को उपचारित कर सकते हैं. इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी और पौधों को वायुमंडलीय नाइट्रोजन भी मिलता रहेगा. 
 
ड्रिप एरिगेशन से बचाएं पानी :ड्रिप सिंचाई की उन्नत विधि है. इसके उपयोग से पानी की बचत की जा सकती है. यह विधि मिट्टी के प्रकार, खेत के ढाल, जलस्त्रोत और किसानों की दक्षता के अनुसार अधिकतर फसलों के लिए अपनायी जा सकती है. फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ इस विधि से उपज की उच्च गुणवत्ता, रसायन एवं खाद का दक्ष उपयोग, जल के अप्रवाह में कमी, खरपतवारों में कमी और जल की बचत सुनिश्चित की जा सकती है. सीमित जल संसाधनों और दिन-ब-दिन बढ़ती पानी की मांग और पर्यावरण की समस्या को कम करने के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक कारगर साबित हुई है. रांची जिले की जमीन व उपलब्ध जल संसाधनों के मद्देनजर यह विधि वरदान साबित हो रही है. ड्रिप एरिगेशन, एक ऐसा सिंचाई तंत्र है, जिसमें जल को पौधों के मूल क्षेत्र के आसपास दिया जाता है. ड्रिप सिंचाई से 30 से 40 प्रतिशत खाद की बचत, 70 प्रतिशत तक जल की बचत और 100 प्रतिशत पैदावार में वृद्धि की जा सकती है. इसके अलावा खरपतवार में काफी कमी, कीट के प्रकोप, कम ऊर्जा की खपत और उत्पाद की गुणवत्ता में बढ़ोतरी भी होती है. ड्रिप तंत्र मुख्य, उप मुख्य और लेटरल पाइप होते हैं. रांची के सिल्ली, अनगड़ा, बेड़ो, नगड़ी, नामकुम सहित 10 प्रखंडों में एक हजार से अधिक लाभुकों को ड्रिप एरिगेशन की सुविधा उपलब्ध करायी गयी है. इस संबंध में विशेष जानकारी के लिए किसान प्रखंड कार्यालय अथवा जिला आत्मा केंद्र में संपर्क कर सकते हैं. 
 
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना :
किसानों के फसलों के नुकसान की भरपायी के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लेकर आयी है. केंद्र सरकार ने अगले दो साल में इसे 50 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है. वर्ष 2016 से शुरू हुए इस योजना के तहत राज्य के आठ लाख किसानों ने इससे जुड़ कर अपनी फसलों को सुरक्षित कराया था. किसान भाइयों को खरीफ फसलों के लिए दो फीसदी, रबी फसल के लिए डेढ़ फीसदी, वाणिज्यिक खेती के लिए पांच फीसदी और बागवानी के लिए पांच फीसदी प्रीमियम देय करना होगा. देश में 15 कंपनियों की फसलों का बीमा करवाने का अधिकार मिल चुका है, जिनमें 11 निजी, एक एग्रीकल्चर बीमा कंपनी और चार सरकारी बीमा कंपनियां शामिल हैं. झारखंड में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी को फसलों को बीमा कराने का अधिकार मिला है. किसान भाई, इस योजना का लाभ उठाने के लिए दो तरीके से फॉर्म भर सकते हैं. इसके तहत ऑफ लाइन में बैंक जाकर आवेदन कर सकते हैं, वहीं दूसरा ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. इस बीमा योजना को लेना किसान का व्यक्तिगत फैसला है. वो चाहें तो ले और चाहें तो ना ले, लेकिन जिन किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड ले रखा है, उनके लिए इस योजना में शामिल होना अनिवार्य है. इस योजना में शामिल होने के लिए किसान आवेदकों को एक फोटो, किसान का आइडी कार्ड (पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आइडी कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड), एड्रेस प्रूफ (ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आइडी कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड), अपने खेत का खसरा नंबर / खाता नंबर के कागजात को रखना जरूरी है. अगर खेत बटाई या किराये पर लेकर फसल बोई गयी है, तो खेत के असली मालिक के साथ करार की कॉपी की फोटोकॉपी साथ जरूर रखें. फसल बोने के अधिकतम 10 दिनों के अंदर ही आपको प्रधानमंत्री बीमा फसल योजना का फॉर्म भरना जरूरी है. फसल कटाई से लेकर अगले 14 दिनों तक अगर आपकी फसल को प्राकृतिक आपदा के कारण नुकसान होता है, तो भी आप इस बीमा योजना का लाभ उठा सकते हैं. इस योजना में आपको फसल खराब होने पर तभी बीमा की रकम मिल सकेगी, जब आपकी फसल किसी भी प्राकृतिक आपदा के ही कारण खराब हुई हो, जैसे- औला, जल भराव, बाढ़, तूफान, तूफानी बरसात, जमीन धंसना आदि. 
 
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना :
मॉनसून पर खेती की निर्भरता कम करने और हर खेत को पानी पहुंचाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत हुई है. इसके तहत हर जिले के सभी खेतों तक सिंचाई के लिए पानी पहुंचाने की योजना है. इस योजना को अमीलजामा पहनाने की जिम्मेवारी कृषि मंत्रालय के साथ-साथ ग्रामीण विकास विभाग एवं जल संसाधन मंत्रालय को दी गयी है. सभी कृषि फार्म में संरक्षित सिंचाई की पहुंच को सुनिश्चित किये जाने का प्रयास किया जायेगा, ताकि प्रति बूंद-अधिक फसल उत्पादन लिया जा सकेगा. इस योजना में नये जल स्त्रोतों का निर्माण, पुराने जल स्त्रोतों को ठीक कर कारगर बनाना, जल संचयन के साधनों का निर्माण, अन्य छोटे भंडारण, भू-जल विकास, ग्रामीण स्तर पर परंपरागत जल तालाबों आदि की क्षमता बढ़ाने जैसे काम कराये जायेंगे. उपलब्ध पानी की मात्रा को फव्वारा और बूंद-बूंद सिंचाई विधियों का प्रयोग करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा जिन क्षेत्रों में भूमिगत पानी की उपलब्धता है, वहां पर नलकूप लगा कर सिंचाई को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. किसान भाई, इस योजना के अंतर्गत अपने खेतों में छोटे तालाब, सूक्ष्म सिंचाई के साधन, जैसे- फव्वारा (स्प्रिंकलर) सिंचाई, बूंद-बूंद सिंचाई (ड्रिप एरीगेशन) के उपकरण प्राप्त कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त सुनिश्चित सिंचाई के माध्यम से उचित फसल प्रबंधन एवं जल संचयन/प्रबंधन विधियों आदि के बारे में प्रशिक्षण भी प्राप्त कर सकते हैं. इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसान भाई आप अपने खेत एवं क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ग्राम पंचायत के माध्यम से संबंधित प्रखंड एवं जिला सिंचाई योजना में शामिल हो सकते हैं. इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए आप अपने जिले या प्रखंड के कृषि पदाधिकारी से संपर्क कर सकते हैं या फिर किसान कॉल सेंटर के टोल फ्री नंबर 1800-180-1551 से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. 
 
 
जलनिधि योजना
राज्य के किसान भाइयों को उनके खेतों में पानी की कमी न हो, इसके लिए राज्य सरकार सिंचाई की व्यवस्था के तहत जलनिधि योजना की शुरुआत की है. इस योजना के तहत राज्य के सभी जिलों में विशेष सिंचाई सुविधा अंतर्गत 1353 डीप बोरिंग का कार्य एवं 1353 रिसाव तालाब (परकोलेशन टैंक) का निर्माण हो रहा है. रिसाव तालाबों का निर्माण वर्षा जल को तीव्र गति से भूगर्भ में भेजने के उद्देश्यों से किया जाता है. इस तालाब का निर्माण ऐसे स्थान पर किया जाता है, जहां कि मिट्टी रेतली हो तथा उसमें वर्षा जल का रिसाव तेज हो. ऐसे तालाबों की गहराई कम तथा फैलाव ज्यादा रखा जाता है, जिससे वर्षा जल रिसाव के लिये ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र मिल सके. इस योजना के तहत किसान समूहों को 90 फीसदी अनुदान की राशि उपलब्ध कराया जायेगा. अनुसूचित जाति, जनजाति, लघु व सीमांत किसान, महिला किसान, इच्छुक किसान समूहों का चयन प्राथमिकता के आधार पर ग्रामसभा द्वारा किया जायेगा. समिति के सदस्यों के पास डीप बोरिंग के लिए कलस्टर में कम-से-कम पांच एकड़ भूमि तथा रिसाव तालाब के लिए कलस्टर में न्यूनतम 10 एकड़ भूमि होना अनिवार्य है. 
 
 
कृषि क्लिनिक योजना
इस योजना के तहत राज्य सरकार किसानों को तकनीकी परामर्श उपलब्ध कराने के लिए कृषि क्लीनिक की शुरुआत की है. इस क्लीनिक में कृषि स्नातकों द्वारा किसानों को मृदा स्वास्थ्य, पौधा संरक्षण, फसल बीमा, कटाई उपरांत तकनीकी, पशुचारा एवं चारा प्रबंधन पर जानकारी मुहैया करायी जायेगी. साथ ही आप अपना खुद का एग्रीक्लीनिक या कृषि व्यवसाय केंद्र की स्थापना कर सकते हैं और बड़ी संख्या में किसानों को व्यावसायिक विस्तार सेवाओं की पेशकश कर सकते हैं. कृषि स्नातकों या कृषि से संबंद्ध क्षेत्रों बागवानी, रेशम उत्पादन, पशु चिकित्सा विज्ञान, वानिकी, डेयरी, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन आदि में प्रारंभिक प्रशिक्षण देना है. प्रशिक्षण पूरा करनेवाले उद्यम के लिए प्रारंभिक ऋण के लिए आवेदन भी कर सकते हैं. कृषि क्लीनिकों के माध्यम से प्रोद्योगिकी, फसल, कीटों और रोगों से सुरक्षा, बाजार रुझान, बाजारों में विभिन्न फसलों के मूल्य और पशु स्वास्थ्य के लिए क्लीनिक सेवाएं इत्यादि के बारे में किसानों को विशेषज्ञ की राय और सेवाएं प्रदान करने की परिकल्पना की गयी है, जिससे फसलों/ पशुओं की उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि होगी.
 
बीज ग्राम योजना
बीज खरीद में तेजी लाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में प्रत्येक जिले में पूर्व के अतिरिक्त 25 नये बीज ग्राम बनाये जाने का लक्ष्य है. राज्य पहली बार बीज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम आगे बढ़ा रहा है. पहली बार राज्य में तीन लाख क्विंटल बीजों का उत्पादन हुआ है, जो पिछले वर्ष (एक लाख क्विटंल बीज) के उत्पादन का तीन गुना है. 
 
विशेष फसल योजना
इस योजना को सफल बनाने के लिए राज्य के विभिन्न जिलों में अलग-अलग फसलों की खेती के लिए वातावरण के अनुकूल योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है. मूंगफली, राजमा, तिल आदि की खेती के लिए हर क्लस्टर में योजना बनाने के साथ-साथ सभी प्रखंडों में 50-50 हेक्टेयर के क्लस्टर की कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया गया है, ताकि अगले वित्तीय वर्ष में खेती का काम समय पर शुरू किया जा सके. गढ़वा, लातेहार, दुमका सहित कई ऐसे जिले हैं, जहां विशेष फसल का उत्पादन हो रहा है. 
 
5000 बागवान मित्र को मिलेगा प्रशिक्षण
राज्य में बागवानी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बागवान मित्र बहाल हो रहे हैं. राज्य की मिट्टी उद्यानिकी के लिए अत्यंत उपयुक्त है. इसके विकास के लिए मानव बल की जरूरत है. राज्य में 5000 बागवान मित्र बनाकर उन्हें प्रशिक्षण किया जाना है, इससे राज्य के युवाओं का कौशल विकास तो होगा ही, साथ ही वे आत्मनिर्भर भी बनेंगे.
 
सभी बीज उत्पादकों का भुगतान डीबीटी से होगा
सभी बीज उत्पादकों को बीज अधिप्राप्ति का भुगतान डीबीटी के माध्यम से सुनिश्चित करें. सभी बीज उत्पादकों का बैंक खाता नंबर तथा मोबाइल नंबर लेकर उनका आधार सीडिंग का काम पूरा करना निर्धारित किया गया है. बीज खरीब की राशि सीधे किसानों के खाते में जाना चाहिए. बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए राज्य में जितनी भी बंजर भूमि है, उसकी ग्राम वार प्रोफाइलिंग करने तथा उसमें जुताई का काम शुरू करने पर जोर दिया गया है, ताकि खरीफ मौसम में खेती का कार्य अच्छी तरीके से किया जा सके.
 
जीवाणु एवं जैविक खाद :रसायनिक खादों एवं विभिन्न कृषि रसायनों ( कीटनाशक, फफूंद नाशक एवं खर-पतवार नाशक) के प्रयोग से खेतों की मिट्टी, जल, वायु एवं मानक सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि इन रसायनिक खादों की विकल्प के रूप में जीवाणु एवं जैविक खाद का प्रयोग किया जाए. जीवाणु खाद में दलहनी फसलों के लिए मुख्य रूप से अनाज के लिए ‘राइजोबियम कल्चर’, सब्जी वाली फसलों के लिए ‘एजोटोबैक्टर कल्चर’, धान फसल के लिए ‘नील हरित शैवाल (ब्लू ग्रीन एल्गी) कल्चर’ एवं जैविक खाद के लिए ‘वर्मी कम्पोस्ट’ एवं ‘इनरिच्ड’ का प्रयोग किया जाना आवश्यक है. जीवाणु खाद के लिए किसान भाई सावधानी भी बरतें. जीवाणु खाद को धूप एंव अधिक गर्मी से बचा कर सुरक्षित स्थान पर रखें. कल्चर जिस फसल का हो, उसका प्रयोग उसी फसल के बीज के लिए करना आवश्यक है. 
 
1. राइजोबियम कल्चर : दलहनी फसलों के जड़ों में गुलाबी रंग का गांठ बनता है. इन गाठों में ही राइजोबियम जीवाणु का निवास है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को जमीन में भेजा जाता है, जिन्हें पौधों द्वारा आसानी से शोषित कर लिया जाता है. इस कल्चर के प्रयोग से भूमि में लगभग 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन खाद का लाभ होता है. इसके आलावा उपज में लगभग 10 फीसदी की वृद्धि होती है. इस कल्चर खाद का प्रयोग मूंग, उरद, अरहर, सोयाबीन, मटर, चना, मूंगफली, मसूर एवं बरसीम के फसल में करते हैं. 
 
2. एजोटोबैक्टर कल्चर :यह सूक्ष्म जीवाणु भी राइजोबियम जीवाणु की तरह ही वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को भूमि में स्थापित करता है. ये जीवाणु जड़ों में किसी प्रकार का गांठ नहीं बनाते. ये जीवाणु मिट्टी में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रूप में पाये जाते हैं तथा नाइट्रोजन गैस के अमोनिया में परिवर्त्तित कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं. इस जीवाणु खाद के प्रयोग से 10-20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की प्राप्ति होती है. अनाज वाली फसलों में 10-20 फीसदी एवं सब्जियों में 10 फीसदी तक की उपज में वृद्धि पायी जाती है. इस कल्चर का प्रयोग गेहूं, जौ, मक्का, बैगन, टमाटर, आलू एवं तेलहनी फसलों में करते हैं.
 
3. एजोसिपरिलम कल्चर :इसके जीवाणु पौधों के जड़ों के आसपास और जड़ों पर समूह बना कर रहते हैं तथा पौधों को वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस उपलब्ध कराते हैं. इस कल्चर का प्रयोग ज्वार, बाजरा, महुआ, मक्का, घास एवं चारेवाली फसलों के पैदावार बढ़ाने के लिए करते हैं. इस जीवाणु खाद के प्रयोग से 15-20 किलोग्राम नेत्रजन प्रीत हेक्टेयर की प्राप्ति होती है.
 
4. नील हरित काई :नील हरित शैवाल यानी काई एक तंतुदार प्रकाश संश्लेषी सूक्ष्मजीव होते हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को जमीन स्थापित करते हैं एवं पौधों को उपलब्ध कराते है. काई, प्रकृति में उपलब्ध ऐसा जैविक स्रोत है, जिनका उपयोग धान की खेती में जैविक उर्वरक के रूप में किया जाता है. इसके उपयोग से खेत की मिट्टी में सुधार होता है. यह उसर भूमि सुधारने में भी लाभदायक है. शैवाल खाद के प्रयोग से रसायनिक उर्वरक का बचत होता है. इस खाद को किसान अपने घरों में खुद भी तैयार कर सकते हैं. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके, रांची के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग में किये गये अनुसंधान में यह पाया गया है कि नील हरित शैवाल खाद के प्रयोग से 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन की प्राप्ति होती है, जो लगभग 65 किलोग्राम रसायनिक उवर्रक (यूरिया) के बराबर है.
 
फास्को कम्पोस्ट :इस खाद में फास्फोरस (स्फुर) की मात्रा अन्य कम्पोस्ट खादों की अपेक्षा ज्यादा होता है. फास्को कम्पोस्ट में 3-7 फीसदी फास्फोरस (स्फुर) होता है, जबकि साध कम्पोस्ट में यह अधिकतम एक फीसदी तक पाया जाता है.
 
वर्मी कम्पोस्ट (केचुआ खाद) :वर्मी कम्पोस्ट में कार्बनिक पदार्थ एवं ह्युम्यस ज्यादा मात्रा में पाया जाता है. इस खाद में मुख्य पोषक तत्व के अतिरिक्त दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व कुछ हॉर्मोनस एवं इन्जाइस भी पाये जाते हैं, जो पौधों के वृद्धि के लिए लाभदायक हैं. वर्मी कम्पोस्टिंग में स्थानीय केंचुआ के किस्म का प्रयोग करें. यहां छोटानागपुर में एसेनिया फोटिडा नामक किस्म पायी जाती है, जो यहां के वातावरण के लिए उपयुक्त है.
 
खरीफ फसलों का बीजोपचार :25 मई के बाद से राज्य के किसान खरीफ मौसम के लिए धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मडुआ, उड़द, अरहर, तील, मूंगफली, सरगुजा आदि की बुआई के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं. इन फसलों की बुआई के पहले किसान भाई यह जान लें कि खड़ी फसलों में अधिकांश रोग का संक्रमण मुख्य रूप से बीज एवं मिट्टी के द्वारा होता है. बहुत छोटे-छोटे रोगाणु बीज की सतह पर या इसके अंदर स्थिर रहते हैं. इस प्रकार के दूषित बीजों की बुआई के बाद बीज पर चिपके हुए रोगाणु मिट्टी में अनुकूल वातावरण पाते ही काफी तेजी से वृद्धि कर मिट्टी में पतला सफेद धागा जैसा रोग के जाल का निर्माण करते हैं. जैसे ही बीज अंकुरित होना शुरू होता है, रोगाणु के सफेद जाल इसके अंदर प्रवेश कर पौधे को छोटी ही अवस्था में सूखा देते हैं. जब पौधा बड़ा होता है, तब बीज के द्वारा मिट्टी में पहुंचाये गये रोगाणु हवा के माध्यम से उड़ कर खड़ी फसल को भी रोगी बना देते हैं, जिससे उपज में काफी कमी आ जाती है. बुआई से पहले बीज को अनुशंसित रसायनों से उपचारित कर लेने से फसल के कई प्रकार की बीमारियों को रोका जा सकता है. किसान भाई, आप अपने फसल लगाने से पहले बीज का उपचार जरूर कर लें. अगर आप धान का फसल लगा रहे हैं, तो अनुशंसित रसायन कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर से अपने बीज को उपचारित कर लें. इसी तरह अगर आप मकई का फसल लगाने को सोच रहे हैं, तो अाप कैपटान या थीरम 75 प्रतिशत घुलनशील पाउडर से अपने बीजों को उपचारित कर लें. इसके अलावा मडुआ फसल के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, ज्वार या बाजरा के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, उड़द या अरहर के लिए कैपटान या थीरम 75 प्रतिशत घुलनशील पाउडर, तील, मूंगफली, सुरगुजा के लिए कार्बनडेजिम 50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर और अदरख का फसल लगाने से पहले आप अपने बीजों को ट्राइकोडर्मा के अनुशंसित रसायन से उपाचरित कर सक अपने फसलों को बीमारियों से बचा सकते हैं. इसके अलाव दलहनी बीजों का उपचार ट्राइकोडर्मा जैव कल्चर से किया जा सकता है. इससे बीज को उपचारित करने पर आपकी खड़ी फसल में उखड़ा रोग का प्रकोप नहीं होगा. किसान भाई, आप यह भी ध्यान रखें कि दलहनी फसलों को बोरे से पहले आप राइजोबियम कल्चर से अपने बीजों को उपचारित कर सकते हैं. इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी और पौधों को वायुमंडलीय नाइट्रोजन भी मिलता रहेगा. 
 
ड्रिप एरिगेशन से बचाएं पानी :ड्रिप सिंचाई की उन्नत विधि है. इसके उपयोग से पानी की बचत की जा सकती है. यह विधि मिट्टी के प्रकार, खेत के ढाल, जलस्त्रोत और किसानों की दक्षता के अनुसार अधिकतर फसलों के लिए अपनायी जा सकती है. फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ इस विधि से उपज की उच्च गुणवत्ता, रसायन एवं खाद का दक्ष उपयोग, जल के अप्रवाह में कमी, खरपतवारों में कमी और जल की बचत सुनिश्चित की जा सकती है. सीमित जल संसाधनों और दिन-ब-दिन बढ़ती पानी की मांग और पर्यावरण की समस्या को कम करने के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक कारगर साबित हुई है. रांची जिले की जमीन व उपलब्ध जल संसाधनों के मद्देनजर यह विधि वरदान साबित हो रही है. ड्रिप एरिगेशन, एक ऐसा सिंचाई तंत्र है, जिसमें जल को पौधों के मूल क्षेत्र के आसपास दिया जाता है. ड्रिप सिंचाई से 30 से 40 प्रतिशत खाद की बचत, 70 प्रतिशत तक जल की बचत और 100 प्रतिशत पैदावार में वृद्धि की जा सकती है. इसके अलावा खरपतवार में काफी कमी, कीट के प्रकोप, कम ऊर्जा की खपत और उत्पाद की गुणवत्ता में बढ़ोतरी भी होती है. ड्रिप तंत्र मुख्य, उप मुख्य और लेटरल पाइप होते हैं. रांची के सिल्ली, अनगड़ा, बेड़ो, नगड़ी, नामकुम सहित 10 प्रखंडों में एक हजार से अधिक लाभुकों को ड्रिप एरिगेशन की सुविधा उपलब्ध करायी गयी है. इस संबंध में विशेष जानकारी के लिए किसान प्रखंड कार्यालय अथवा जिला आत्मा केंद्र में संपर्क कर सकते हैं. 
 
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना :किसानों के फसलों के नुकसान की भरपायी के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लेकर आयी है. केंद्र सरकार ने अगले दो साल में इसे 50 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है. वर्ष 2016 से शुरू हुए इस योजना के तहत राज्य के आठ लाख किसानों ने इससे जुड़ कर अपनी फसलों को सुरक्षित कराया था. किसान भाइयों को खरीफ फसलों के लिए दो फीसदी, रबी फसल के लिए डेढ़ फीसदी, वाणिज्यिक खेती के लिए पांच फीसदी और बागवानी के लिए पांच फीसदी प्रीमियम देय करना होगा. देश में 15 कंपनियों की फसलों का बीमा करवाने का अधिकार मिल चुका है, जिनमें 11 निजी, एक एग्रीकल्चर बीमा कंपनी और चार सरकारी बीमा कंपनियां शामिल हैं. झारखंड में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी को फसलों को बीमा कराने का अधिकार मिला है. किसान भाई, इस योजना का लाभ उठाने के लिए दो तरीके से फॉर्म भर सकते हैं. इसके तहत ऑफ लाइन में बैंक जाकर आवेदन कर सकते हैं, वहीं दूसरा ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. इस बीमा योजना को लेना किसान का व्यक्तिगत फैसला है. वो चाहें तो ले और चाहें तो ना ले, लेकिन जिन किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड ले रखा है, उनके लिए इस योजना में शामिल होना अनिवार्य है. इस योजना में शामिल होने के लिए किसान आवेदकों को एक फोटो, किसान का आइडी कार्ड (पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आइडी कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड), एड्रेस प्रूफ (ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आइडी कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड), अपने खेत का खसरा नंबर / खाता नंबर के कागजात को रखना जरूरी है. अगर खेत बटाई या किराये पर लेकर फसल बोई गयी है, तो खेत के असली मालिक के साथ करार की कॉपी की फोटोकॉपी साथ जरूर रखें. फसल बोने के अधिकतम 10 दिनों के अंदर ही आपको प्रधानमंत्री बीमा फसल योजना का फॉर्म भरना जरूरी है. फसल कटाई से लेकर अगले 14 दिनों तक अगर आपकी फसल को प्राकृतिक आपदा के कारण नुकसान होता है, तो भी आप इस बीमा योजना का लाभ उठा सकते हैं. इस योजना में आपको फसल खराब होने पर तभी बीमा की रकम मिल सकेगी, जब आपकी फसल किसी भी प्राकृतिक आपदा के ही कारण खराब हुई हो, जैसे- औला, जल भराव, बाढ़, तूफान, तूफानी बरसात, जमीन धंसना आदि. 

महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कृषि यांत्रिकीकरण प्रोत्साहन योजना
महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कृषि यांत्रिकीकरण प्रोत्साहन योजना  के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को छोटे उपकरण लेने के लिए सहयोग मिलेगा. इसके तहत टैक्टर, जमीन जोतने का यंत्र, बीज उपचार ड्रम, उर्वरक प्रसारक, चार पंक्तियों वाला धान ड्रम सीडर, दो पंक्तियों वाला चावल ट्रांसप्लांटर, पेडल संचालित चावल थ्रेसर, चावल हाउलर, लघु दाल मील, हेंडी स्प्रेयर, विद्युत संचालित स्प्रेयर, लघु तेल एक्सप्लोरर, फसल कटाई मशीन आदि कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराया जाता है. इस योजना का लाभ उन महिला स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा, जिसमें कम-से-कम 10-12 सदस्य होंगे.
 
छोटे एवं सीमांत कृषकों तथा स्वयं सहायता समूहों/किसान क्लब को पंप सेट वितरण योजना
इस योजना के अंतर्गत संचित जल का उपयोग सिंचाई कार्य में करने के लिए 20 हजार पंपसेट एवं एचडीपीआइ पाइप का वितरण किया जाना है. इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसान भाई या उनके समूहों को 25 हजार रुपये पंपसेट एवं एचडीपीआइ पाइप के लिए अनुदान उपलब्ध कराया जायेगा. इसके लिए ग्राम पंचायत/कृषि मित्र/प्रखंड विकास पदाधिकारी/प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी/ भूमि संरक्षण कार्यालय से संपर्क कर इस योजना का लाभ किसान भाई उठा सकते हैं.