aamukh katha

  • Aug 21 2017 2:23PM

बाल सुधार गृह में भी बच्चे बन रहे हुनरमंद

बाल सुधार गृह में भी बच्चे बन रहे हुनरमंद

झालसा राज्य के लोगों, खासकर ग्रामीणों को कानूनी रूप से जागरूक करना चाहता है. उन तक कानूनी सुविधाओं का लाभ पहुंचाना चाहता है. बाल अधिकारों के क्षेत्र में भी इसके द्वारा सफल प्रयास किये जा रहे हैं. धीरे-धीरे इसका असर दिख भी रहा है. झालसा का प्रयास है कि जो भी बच्चा एक बार किसी कारण से बाल सुधार गृह में आता है, वो दोबारा यहां नहीं आये. 

आत्मनिर्भर हो रहे बाल सुधार गृह के बच्चे

राजधानी रांची के डुमरदगा में बाल सुधार गृह है. यहां बच्चों की अच्छी देखभाल हो रही है. इन्हें अच्छी शिक्षा मिल रही है. इतना ही नहीं अब बच्चों को हुनरमंद भी बनाया जा रहा है. बच्चों में सीखने की ललक बड़ों से ज्यादा होती है. 

बच्चों की इसी क्षमता को देखते हुए झालसा ने यहां अनूठा प्रयोग किया और इसका सकारात्मक असर भी दिख रहा है. कई बच्चे ऐसे थे, जो यहां से जाने के बाद छोटी-मोटी गलती करते थे और फिर वापस आ जाते थे. गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के कारण वे ऐसा करने पर मजबूर थे. ऐसे में इन समस्याओं को दूर किये बिना इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ना थोड़ा मुश्किल काम था. इसके लिए सबसे पहले बच्चों का चयन किया गया और उन्हें ऑफसेट प्रिंटिंग का प्रशिक्षण दिया गया.15 बच्चों को इस प्रशिक्षण में शामिल किया था, जिसमें सात बच्चों को काम भी मिल गया है. 

काम मिलने से बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी काफी खुश थे. बाल सुधार गृह में आयोजित एक कार्यक्रम में झारखंड हाइकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल ने कहा कि प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके बच्चों को काम देने के लिए कई संस्थाएं आगे आ रहे हैं. इससे उत्साहित होकर झालसा द्वारा इस बार बच्चों को हिंदी कंप्यूटर टाइपिंग और सोहराई पेंटिग सीखाने की व्यवस्था की गयी है. अब बच्चों को फोटोग्राफी सीखाने की योजना है.

कोर्ट नोटिस के साथ अब कानूनी लाभ की जानकारी भी होगी उपलब्ध

पुलिस जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो उस व्यक्ति और उसके परिवार के सामने कई समस्याएं आ जाती हैं. कानूनी जानकारी का अभाव होने के कारण वो समझ नहीं पाते हैं कि तुरंत कहां से उन्हें कानूनी मदद मिलेगी. झालसा ने इस परेशानी को दूर करने का प्रयास किया है. 

विधिक सेवा प्राधिकार अधिनियम 1987 की धारा-12 के तहत बच्चे (18 वर्ष से कम), महिलाएं, अनुसूचित जाति व जनजाति, फैक्ट्री मजदूर, जेल में बंद कैदी और वैसे व्यक्ति जिनकी आय एक लाख रुपये या उससे कम है, वो सभी मुफ्त और सक्षम विधिक सेवा पाने के हकदार हैं. झालसा के नये प्रयोग के तहत अब किसी व्यक्ति को कोर्ट से कानूनी नोटिस या वारंट मिलता है, तो नोटिस और वारंट के साथ अब उस व्यक्ति को एक और कागज दिया जाता है, जिसमें कानूनी लाभ पाने की पूरी जानकारी दी जाती है. साथ ही मध्यस्थता केंद्र में जाने का विकल्प भी दिया रहता है. 

झारखंड हाइकोर्ट मध्यम आय वर्ग विधिक सहायता योजना

हाइकोर्ट में केस करने या अपने बचाव के लिए मामूली फीस पर झारखंड हाइकोर्ट मध्यम आय वर्ग विधिक सहायता योजना के तहत बनाये गये अच्छे वकीलों की पैनल से अधिवक्ता की सेवा ली जा सकती है. इसका लाभ सालाना पांच लाख या इससे कम आय वर्ग के लोग उठा सकते हैं. 

निर्धारित श्रेणी के लोगों के लिए भुगतान करने संबंधी विधिक सहायता योजना

वक्त के साथ व्यावसायिक एवं पारिवारिक विवाद के मामले बढ़ गये हैं. इसमें कभी-कभी दोनों पक्ष अलग-अलग राज्यों के होते हैं, इसके चलते एक पक्ष को ज्यादा परेशानी होती है. उसे दूसरे राज्य में जाकर केस लड़ना पड़ता है. हालांकि, ऐसे मामले हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर हो जाते हैं. चेक बाउंस, अंतरराज्यीय व्यापार मामले एवं पारिवारिक विवाद में झालसा की योजनाओं और सहयोग से ऐसे लोगों की परेशानी काफी कम हो गयी है. 

नि:शुल्क िमल सकती है वकील की सुविधा

विधिक सेवा के तहत किसी कोर्ट में मामला दायर करने या कोर्ट में दायर मामले में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के लिए मुफ्त में वकील दिया जाता है. कोर्ट फीस, कागज तैयार करने और नकल निकालने का सारा खर्च भी जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डीएलएसए) ही उठाता है. अनुमंडल कोर्ट, जिला कोर्ट एवं हाइकोर्ट में केस करने या अपना बचाव करने के लिए सचिव, अनुमंडल कोर्ट, जिला कोर्ट, हाइकोर्ट विधिक सेवा समिति से संपर्क किया जा सकता है.

कहां से करें संपर्क

किसी भी तरह की जानकारी अथवा मदद के लिए हाइकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी से संपर्क किया जा सकता है. इसके अलावा झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार से भी इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है.  

सचिव, हाइकोर्ट लीगल सर्विस कमिटी 9431100488 

उप सचिव 9431387130

सदस्य सचिव 8986601912 

झालसा का टॉल फ्री नंबर18003457019 

इन नंबरों पर दिन के 10 बजे से रात नौ बजे तक संपर्क कर कानूनी मदद ले सकते हैं. ई-मेल- jhalsaranchi@gmail.com व वेबसाइट www. jhalsa.org से भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.  q

मध्यस्थता से सुलझते मामले

मध्यस्थता के जरिये विवाद को कोर्ट के बाहर सुलझाना झालसा का एक और सफल प्रयोग है. इसके जरिये 75 फीसदी मामले कोर्ट के बाहर सुलझ रहे हैं और लोग मध्यस्थता के फैसले से संतुष्ट भी हो रहे हैं. सबसे पहले बात मध्यस्थता की. मध्यस्थता, किसी मध्यस्थ के माध्यम से विवादों को निपटाने का एक तरीका है. जिसमें तटस्थ होकर मध्यस्थ दोनों पक्षों की मौजूदगी में सुलह कराते हैं. पहले मध्यस्थ के तौर पर सिर्फ न्यायिक अधिकारी, अधिवक्ता और पेशेवर ही होते थे. लेकिन, अब झालसा के नये प्रयोग के तहत मध्यस्थ के तौर पर समाज के बुद्धिजीवी वर्ग जैसे आइएएस, आइपीएस, वरीय अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर एवं पत्रकार इत्यादि का सहयोग लिया जा रहा है. 

इसके लिए इन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है. मध्यस्थता के जरिये विवाद को सुलझाने में सफलता की दर 75 फीसदी है, जो एक बड़े बदलाव का संकेत है. एक मध्यस्थ दोस्ताना माहौल में किसी भी विवाद को निपटाने का कार्य करता है. वह दोनों पक्षों के बीच आपसी तालमेल बैठाने का काम करता है, ताकि विवाद के मूल तक पहुंचा जा सके. झालसा द्वारा बनाये मध्यस्थ का मुख्य कार्य होता है कि उस विवाद के मूल में जाकर मूल विवाद को ही खत्म कर दिया जाये, ताकि आगे कोई विवाद नहीं रहे. मध्यस्थता के दौरान मध्यस्थ दोनों पक्षों से मिल कर उनसे बातचीत कर विवाद का हल निकालते हैं, इस दौरान कई आवश्यक जानकारियां जुटायी जाती हैं. इस कार्य के लिए कोई औपचारिक विधि निर्धारित नहीं की गयी है, जिसके कारण दोनों ही पक्षों को अपनी बात खुल कर रखने का मौका मिलता है. इस दौरान मध्यस्थ दोनों पक्षों की मजबूती और कमजोरी समझने का प्रयास करते हैं, ताकि वे मामले को सुलझा सकें. किसी भी विवाद को मध्यस्थता तक लाने के लिए पहले दोनों पक्षों को कोर्ट की ओर से प्रोत्साहित किया जाता है.

दोनों ही पक्षों से बातचीत की जाती है. दोनों पक्ष जब इसके लिए तैयार हो जाते हैं, तब विवाद को मध्यस्थता केंद्र में लाया जाता है. विवादों का निपटारा कोर्ट से जल्दी हो जाता है. इसमें पैसे के साथ-साथ समय की भी बचत होती है. साथ ही दो पक्षों के बीच एक मजबूत रिश्ता भी बना रह जाता है, ताकि भविष्य में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं रहे. मध्यस्थता एडीआर के सिद्धांत पर कार्य करती है. एडीआर यानी वैकल्पिक विवाद समझौता प्रणाली की तर्ज पर कार्य किया जाता है. पहले पारिवारिक मामले ज्यादा आते थे, पर इसकी सफलता को देखते हुए अब कई प्रकार के वित्तीय व अन्य विवाद आ रहे हैं

मध्यस्थता के फायदे

मध्यस्थता के कई फायदे हैं. यही वजह है कि अब ज्यादा मामले यहां आ रहे हैं. मध्यस्थता में किसी भी विवाद का निपटारा कोर्ट के मुकाबले ज्यादा होता है. यहां दोनों पक्षों के सहयोग से एक बीच का रास्ता निकाला जाता है, जो दोनों पक्षों को स्वीकार होता है. बाद में विवाद होने की संभावना खत्म हो जाती है और दोनों पक्षों के बीच व्यक्तिगत रिश्ता बना रहता है. 

इससे दोनों पक्ष के लोग संतुष्ट होते हैं. पैसे और समय की बचत होती है और समाधान की उम्मीद बढ़ जाती है. इस दौरान विवाद से जुड़े कई और पहलू भी सामने आते हैं, जिसके चलते विवाद को समझने और उसे जड़ से खत्म करने में आसानी होती है. मध्यस्थता से आपसी दुश्मनी खत्म करने का प्रयास किया जाता है.