aamukh katha

  • Sep 13 2017 1:05PM

कैग की परीक्षा में स्वास्थ्य विभाग फेल

कैग की परीक्षा में स्वास्थ्य विभाग फेल

पंचायतनामा डेस्क

स्वास्थ्य विभाग, झारखंड ने अपना कार्य बेहतर तरीके से नहीं किया है. ये हम नहीं, बल्कि 2015-16 के भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा विभाग यानी कैग रिपोर्ट कह रही है. मंत्री से लेकर अधिकारियों ने राज्य की सवा तीन करोड़ जनता को भाग्य भरोसे छोड़ दिया. जनता स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए त्राहिमाम कर रही है, लेकिन मंत्री से लेकर अधिकारी तक अपना ही सुर अलाप रहे हैं.

कैग रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बजट में बढ़ोतरी के बावजूद स्वास्थ्य देखभाल पर लोक व्यय में विभाग जीएसडीपी के दो से तीन फीसदी लक्ष्य को भी प्राप्त करने में असफल रहा है. वहीं वर्ष 2011-16 के दौरान स्वास्थ्य विभाग का आधारभूत सर्वेक्षण और वार्षिक सुविधा सर्वेक्षण आयोजित नहीं किया गया. स्वास्थ्य विभाग के 3.21 करोड़ रुपये की 26 मशीनों और उपकरणों का कोई उपयोग नहीं हो रहा है. वर्ष 2011 में खरीदे जाने के बाद से ही यह उपकरण निष्क्रिय पड़े थे. प्रशिक्षित कर्मियों की कमी के कारण ये मशीनें बेकार पड़ी थीं.

स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी के कार्यकाल में विभाग ने मशीनों की उपयोगिता में सुधार लाने का वादा किया था, लेकिन हाल जस के तस है. ग्रामीण स्वास्थ्य कार्ययोजना नहीं बनाये जा रहे हैं. राज्य में आवश्यक व उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं में भी काफी कमी देखी गयी. वर्ष 2011-16 की अगर बात करें, तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 51 फीसदी की कमी देखी गयी. वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों  में 79 % और स्वास्थ्य उपकेंद्रों में 60 % की कमी आयी है. भारतीय लोक स्वास्थ्य मानक के मानदंडों के अनुसार और स्वीकृत बल की तुलना में अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक की 92 और 78 % की कमी आयी है. वहीं चिकित्सा पदाधिकारियों की 61 और 36 %, स्टाफ नर्स या एएनएम की 27 और 26 % तथा चिकित्सा सहायकों की 52 और 40% की कमी आयी है. इसके अलावा जिला व सदर अस्पतालों में 92 और 31 % तक आवश्यक दवाइयों की कमी है. चिकित्सा के लिए जरूरी उपकरण में भी 92 और 42 % तक की कमी देखी गयी.

मानदंडों के खिलाफ अतिरिक्त भवनों का हुआ निर्माण 

भारतीय लोक स्वास्थ्य मिशन के मानदंडों के अनुसार, तीन से पांच हजार की जनसंख्या के लिए एक स्वास्थ्य उपकेंद्र की आवश्यकता है. जांच के दौरान पश्चिमी सिंहभूम जिले में नौ स्वास्थ्य उपकेंद्र के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत 18 भवनों का निर्माण हुआ. जिले के मनोहरपुर प्रखंड स्थित मकरंडा के एक स्वास्थ्य उपकेंद्र के लिए आइएपी के तहत दो भवन बने. कुमारडुंगी प्रखंड के कुसमिता स्वास्थ्य उपकेंद्र के लिए आइएपी के तहत एक भवन का निर्माण अप्रैल, 2011 से हो रहा है. बावजूद इसके राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत उसी स्थान पर एक अन्य भवन का निर्माण किया गया. मंझारी प्रखंड के पुटेसिया में आइएपी के तहत दिसंबर, 2011 में एक भवन का िनर्माण किया गया, जबकि फिर से अगस्त, 2014 में राज्य निधि के तहत एक अन्य भवन का निर्माण कराया गया. आलम देखिये कि मानदंडों के मुताबिक नये स्वास्थ्य उपकेद्र का निर्माण तीन से पांच हजार की जनसंख्या पर होना निर्धारित है. इसके बाद भी इन नियमों की अनदेखी की गयी और 1378 से 2548 की जनसंख्या वाले गांवों में स्वास्थ्य उपकेंद्र के लिए नये भवन बनाये गये. 

एंबुलेंस तो खरीदाया, पर एक भी चलने लायक नहीं

साल 2015-16 के बीच 50.30 करोड़ की राशि से 503 एंबुलेंस खरीदने का लक्ष्य रखा गया था. इनमें से 39.30 करोड़ रुपये खर्च कर 369 एंबुलेंस ही खरीदे गये, जिसमें बीएलएस व एएलएस एंबुलेंस खरीदने के मद में 39.30 करोड़ रुपये खर्च किये गये. लेकिन, इनमें से एक भी एंबुलेंस आज तक नहीं चला.

बॉयो मेडिकल वेस्टेज प्रबंधन का भी हाल बेहाल

बॉयो मेडिकल वेस्टेज के प्रबंधन के लिए 18.40 लाख रुपये स्वीकृत हुए थे. गुमला व चाईबासा में बॉयो मेडिकल वेस्टेज निपटान के लिए 29.98 लाख का इंसीनेटर लगाया गया था, पर यह भी बेकार पड़ा है. इस पर आपत्ति जताने के बाद गुमला सदर अस्पताल के उपाधीक्षक ने 2016 में कहा था कि पर्याप्त बिजली की कमी के कारण इंसीनेटर बंद है. विभाग के प्रधान सचिव को इसके लिए पत्र लिखा गया था, लेकिन आज तक प्रधान सचिव ने पत्र का जवाब नहीं दिया.

मोबाइल मेडिकल यूनिट से वंचित ग्रामीण

राज्य के सुदूर क्षेत्रों के ग्रामीणों को मोबाइल मेडिकल यूनिट का लाभ नहीं मिला. कैग रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए यह यूनिट वैसे स्थानों पर कार्य कर रहे थे, जहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या स्वास्थ्य उपकेंद्र पहले से परिचालित थे. इन क्षेत्रों में मोबाइल मेडिकल यूनिट के होने से सुदूर ग्रामीणों को इसका लाभ नहीं िमल पा रहा था.

घटिया पारासिटामोल बोतलों की आपूर्ति 

दुमका में सहियाओं के बीच 9028 घटिया पारासिटामोल बोतलों की आपूर्ति स्वास्थ्य विभाग की ओर से की गयी है. मेसर्स बंगाल केमिकल एवं फार्मास्यूिटकल लिमिटेड रांची के द्वारा जून 2015 में 1.54 लाख की पारासिटामोल सिरप के 14,052 बोतलों की आपूर्ति जिला ग्रामीण स्वास्थ्य समिति दुमका को की गयी थी, जिसे 2813 सहियाओं के बीच वितरित किया गया था. लेखा परीक्षक ने इन 14,052 में से 9028 बोतलों को राज्य औषधि जांच प्रयोगशाला, रांची द्वारा अपने जांच में घटिया पाया. घटिया दवाओं के उपयोग से निश्चित रूप से हजारों बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा.

बिस्तर की कमी

भारतीय लोक स्वास्थ्य मानकों के मानदंडो के मुताबिक, नमूना जांचित जिला अस्पतालों में 50-76 फीसदी के बीच बिस्तर की कमी है. वहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 47-90 फीसदी के बीच बिस्तर की कमी है. 

मानव संसाधन की कमी 

स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की भारी कमी है. 92 % विशेषज्ञ डॉक्टर, 61 % चिकित्सा पदाधिकारी, 27 % स्टाफ नर्स एवं एएनएम और 52 % पारा मेडिकल स्टॉफ की कमी है. सरकार दावा करती है कि तीन साल में हजारों नौकरियों का सृजन हुआ है, तो फिर स्वास्थ्य विभाग में नियुक्ति क्यों लंबित है.

आपात िस्थतियों के लिए प्रशिक्षित नहीं कई सहिया

जननी सुरक्षा योजना के तहत सहियाओं को आपात स्थितियों के लिए प्रशिक्षित किया जाना है. 207 सहियाओं के बीच सर्वेक्षण के उपरांत जो नतीजे आये, उसके तहत 162 सहिया आपात स्थितियों के लिए प्रशिक्षित नहीं थी, जबकि मात्र 45 सहिया ही प्रशिक्षित मिली. किट के उपयोग संबंधी अगर बात करें, तो सर्वेक्षण में पाया गया कि 16 सहियाओं के पास गर्भावस्था परीक्षण किट था, लेकिन उपयोग संबंधी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. 

दवाई व आवश्यक सामग्रियों की खरीद में गड़बड़झाला 

दवाई एवं स्वास्थ्य विभाग की आवश्यक सामग्रियों की खरीद में करोड़ों रुपये का घोटाला सामने आया है. टायफाइड, ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस स्क्रीनिंग, यूरिन और हेपेटाइटिस-बी के परीक्षण उपकरणों की खरीद में काफी गड़बड़झाला सामने आया है. सिविल सर्जन दुमका और गिरिडीह द्वारा केंद्रीय भंडार, रांची से अधिकतम खुदरा मूल्य दर से दो से 13 गुणा दर पर उपकरणों की खरीद हुई. इसके कारण 1.33 करोड़ रुपये का अतिरिक्त  भुगतान करना पड़ा. इसके अलावा जिला अस्पताल दुमका और पश्चिमी सिंहभूम ने अनुमोदित अनुबंध दर से अधिक दर पर दवाओं/उपभोज्य वस्तुएं की खरीद में 42.86 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान किया. दवाई के बॉक्स पर छपे हुए अधिकतम मूल्य को मिटा कर उसकी जगह मनमाफिक मूल्य लिख दिये गये थे.

बेकार पड़ी हैं करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये की मशीनें 

राज्य में आज भी कई ऐसे अस्पताल हैं, जहां मशीनें बिना उपयोग के धूल फांक रही है. मार्च, 2011 में खरीदी गयीं मशीनों में से 26 मशीनें ऐसी मिली, जो आज भी बेकार पड़ी हैं. इन मशीनों/उपकरणों में ऑटो एनेलाइजर, पार्थ फास्ट, थ्री चेनल इसीजी मशीन, मल्टी पारामोनिटर पेसेंट मोनिटर एवं डेफिव्रिलेअर के साथ कार्डियक मोनिटर आदि मुख्य था. इन मशीनों एवं उपकरणों को खरीदने में सरकार ने 3.11 करोड़ रुपये खर्च किये. हालांकि, संबंधित विभाग ने बिना उपयोग वाली मशीनों या उपकरणों को जल्द उपयोग में लाने का आश्वासन दिया.

प्रसवपूर्व देखभाल संबंधित  सेवाएं देने में विभाग विफल 

गर्भवती महिलाओं की प्रसवपूर्व देखभाल से संबंधित सेवाएं प्रदान करने में भी स्वास्थ्य विभाग विफल रहा है. वर्ष 2011-16 के दौरान प्रसव पूर्व देखभाल के लिए 37.51 लाख गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण हुआ. इन गर्भवती महिलाओं में से 16 फीसदी महिलाओं को टेटनस टॉक्साइट का पहला इंजेक्शन मिला ही नहीं. वहीं दूसरे टेटनस टॉक्साइट का इंजेक्शन देने में 21 फीसदी की कमी आयी. राज्य में पंजीकृत गर्भवती महिलाओं का पता लगाने की प्रणाली विकसित नहीं किये जाने के कारण वर्ष 2011-16 के दौरान छह लाख यानी 16 फीसदी गर्भवती महिलाओं का पता नहीं लग पाया. इससे यह माना जाता है कि गर्भवती महिलाएं या तो बाहर चली गयी या उनके प्रसव निजी अस्पताल में हुए.