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  • Sep 13 2017 1:09PM

दुमका : कालाजार का प्रकोप, अब तक 200 रोगी चिह्नित, कालाजार रोगियों को अब भी दवा व सहायता का इंतजार

दुमका : कालाजार का प्रकोप, अब तक 200 रोगी चिह्नित, कालाजार रोगियों को अब भी दवा व सहायता का इंतजार
शैलेंद्र सिन्हा
संताल परगना के दुमका, गोड्डा, पाकुड़ और साहेबगंज जिला को कालाजार प्रभावित जिला माना गया है. केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कालाजार की भयावह स्थिति का आकलन किया गया. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आला अधिकारी संताल परगना आये और जायजा लिया. केंद्र सरकार द्वारा कालाजार के उन्मूलन को लेकर कई योजना बनायी गयी.

मुख्यमंत्री ने जिला के सिविल सर्जन को कालाजार उन्मूलन के लिए अभियान चलाने को कहा. पंचायत और ग्राम स्तर पर कालाजार से पीड़ित रोगियों की पहचान के लिए सघन अभियान चलाया जा रहा है. संताल परगना में कालाजार बीमारी कोई नयी नहीं है. वर्ष 2004 में डॉ बिंदेश्वर राम ने संताल परगना क्षेत्र में जब पहली बार कालाजार बीमारी को लेकर स्वास्थ्य विभाग को अवगत कराया था, तो उस पर जम कर बवाल मचा था. स्वास्थ्य विभाग कालाजार के रोगियों को स्वीकार नहीं कर रहा था. 

डाॅ राम ने कालाजार से पीड़ित पहाड़िया रोगियों के ब्योरा के साथ उनकी स्थिति के संबंध में विस्तार से अपनी रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग को सौंपी थी. उन्होंने लिखा था कि पहाड़िया की आबादी लगातार गिर रही है और वे कालाजार एवं ब्रेन मलेरिया के शिकार हो रहे हैं. तत्कालीन दुमका के सिविल सर्जन ने डाॅ राम की रिपोर्ट को झूठा करार दिया था और सरकार को एक साजिश के तहत पहाड़िया की वास्तविक स्थिति को छुपा कर गलत जांच प्रतिवेदन भेजा था. तत्कालीन सिविल सर्जन ने स्वास्थ्य विभाग को सूचित किया था कि दुमका जिला में कालाजार का कोई मामला नहीं है. 

दुमका के तत्कालीन उपायुक्त ने अपने स्तर से एक जांच टीम गठित कर पहाड़िया परिवारों की वास्तविक स्थिति की जांच करायी. जांच दल ने आदिम जनजाति पहाड़िया के गांवों में जाकर स्वास्थ्य संबंधी विस्तार से जानकारी हासिल की. जांच दल ने पाया कि वास्तव में पहाड़िया परिवार कालाजार एवं ब्रेन मलेरिया के शिकार हैं. जांच दल ने सिविल सर्जन द्वारा स्वास्थ्य विभाग को भेजे 11 जनवरी, 2004 की रिपोर्ट को पूर्णतः गलत पाया. बाद में उपायुक्त ने दुमका को कालाजार प्रभावित जिला घोषित कर दिया. दुमका प्रखंड के पहाड़िया बहुल गांव फिटकोरिया, मुर्गाथली, कैराबनी सहित दर्जनों पहाड़िया गांवों का सर्वे किया गया, तो कालाजार एवं ब्रेन मलेरिया के सर्वाधिक रोगी पाये गये. केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से लिया और इसका परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संताल परगना के दुमका, गोड्डा, पाकुड़ और साहेबगंज को कालाजार से सर्वाधिक प्रभावित जिला माना. कालाजार के उन्मूलन के लिए सिविल सर्जन को आदेश भी निर्गत किया. इसके बावजूद आदिवासी बहुल गांवों में अब तक कीटनाशक का छिड़काव नहीं हो सका है. हर प्रखंड के सुदूर गांवों में रोगी की पहचान नहीं हो सकी है. सहिया को इसके लिए जिम्मेवार बनाया गया है. गांवों में अब भी कालाजार के रोगी को स्वास्थ्य विभाग से दवा और सहायता का इंतजार है. 

कालाजार उन्मूलन को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा सघन अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन, आदिवासी बहुल गांवों में कालाजार से संबंधित जानकारी नहीं दी जा रही है. इसका परिणाम यह हो रहा है कि ग्रामीण अनजाने में कालाजार के शिकार हो रहे हैं. सरकार द्वारा सहिया को इस मामले में सर्तक रहने को कहा गया है. ग्रामीण मरीज प्रखंड के पीएचसी नहीं आ पाते, इसलिए उनका इलाज नहीं हो पा रहा है.
 
क्या है कालाजार
कालाजार एक संक्रामक रोग है. इसका संक्रमण बालू मक्खी द्वारा होता है. यह कालाजार को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आसानी से फैलाता है. यदि कालाजार के रोगी का समय पर इलाज नहीं किया जाता है, तो उसकी मौत भी हो सकती है. बालू मक्खी कम रोशनी और नमी वाले स्थान पर रहती है, जैसे- मिट्टी की दीवारों और चूहे के बिलों में. ग्रामीण क्षेत्रों में अब तक कीटनाशक का छिड़काव नहीं किया गया है.
 
बचाव के उपाय
इस बीमारी के उपचार के लिए नयी चिकित्सा पद्धति शुरू की गयी है. इसमें मात्र एक सूई के द्वारा इस बीमारी का इलाज होता है. कालाजार मरीजों का इलाज माइल्टे फोसिन दवा से भी किया जाता है. कालाजार के फैलाव को रोकने के लिए वर्ष में दो बार कीटनाशक दवा सिंथेटिक पाइरेथ्रॉयड (अल्फा-साइपरमेथ्रिन) का छिड़काव किया जाता है. इससे रोग वाहक बालू मक्खी मर जाती है.

लक्षण
इससे पीड़ित रोगियों को बुखार अक्सर रुक-रुक कर या तेजी से तथा दोहरी गति से आता है
भूख न लगना, पीलापन और वजन में कमी से शरीर में कमजोरी आ जाती है
प्लीहा तेजी से अधिक बढ़ता है और सामान्यतः यह नरम और कड़ा होता है
जिगर का बढ़ना, लेकिन प्लीहा के जितना नहीं. यह नरम होता है और इसकी सतह चिकनी होती है तथा इसके किनारे तेज होते हैं
त्वचा सूखी, पतली और शल्की होती है तथा बाल झड़ सकते हैं. गोरे व्यक्तियों के हाथ, पैर, पेट और चेहरे का रंग भूरा हो जाता है