aamukh katha

  • Oct 5 2017 1:45PM

आधुनिक तकनीक से कीजिए फायदे की खेती

आधुनिक तकनीक से कीजिए फायदे की खेती

झारखंड के किसानों को वैज्ञानिक व व्यावसायिक तकनीक से खेती करने से काफी लाभ होगा. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मानते हैं कि आधुनिक तरीके और सोच-समझ कर खेती करने से किसान भाई-बहनों को काफी फायदा होगा. वैज्ञानिक तकनीक अपनाने के लिए इसलिए जोर दिया जाता है, ताकि अब किसान पारंपरिक खेती की तकनीक छोड़ कर आधुनिक तकनीक को अपनायें. व्यावसायिक तरीके इसलिए, क्योंकि बेहतर उपज और मुनाफा पाने के लिए किसानों को पूंजी भी लगानी होती है.

राजधानी रांची के आसपास के किसानों ने फूल की खेती में वैज्ञानिक और व्यावसायिक तरीकों को अपनाया और आज रांची के खेतों में लहलहाते गुलाब के फूल की सुंदरता, बड़े आकार और उसकी खुशबू न्यूजीलैंड के गुलाब के फूल की तरह है, क्योंकि राजधानी रांची की आबोहवा गुलाब के फूल के लिए काफी उपयुक्त है. इसलिए किसानों को फायदे की खेती करनी चाहिए. किसान भाई-बहन ध्यान रखें कि अगर आपको गेहूं की खेती से फायदा नहीं है, तो चना और सरसों की खेती करें. अगर चने और सरसों से भी फायदा नहीं हो रहा है, तो सब्जी की खेती करें. अगर सब्जी उत्पादन में भी फायदा नहीं है, तो मधुमक्खी पालन और मशरूम की खेती करें. इसके साथ-साथ किसान पशुपालन भी कर सकते हैं, इससे उन्हें अवश्य लाभ होगा. राज्य में रबी फसल की स्थिति, दलहन-तिलहन से लाभ और किसानों को खेती के माध्यम से अपनी आय बढ़ाने के तरीके पर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक (अनुसंधान) डॉ डीएन सिंह से पवन कुमार ने बातचीत की. पेश है बातचीत का मुख्य अंश.

सवाल : झारखंड में रबी फसल की क्या स्थिति है.
जवाब : झारखंड में 38 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है, लेकिन उसमें से सिर्फ 17 लाख हेक्टेयर में ही खेती होती है. शेष 13 लाख हेक्टेयर भूमि खाली रह जाती है, जिसमें उत्पादन नहीं हो पाता है. खेती योग्य 17 लाख हेक्टेयर भूमि में से 70 फीसदी क्षेत्र में धान की खेती की जाती है. बाकी 30 प्रतिशत में सब्जी, मक्का, अरहर और उड़द की खेती होती है. राज्य में सबसे अधिक लोग चावल खाते हैं. राज्य में चार तरह की जमीन पायी जाती है. ऊपरी जमीन, जिसे टांड कहते हैं और निचली जमीन, जिसे दोन कहते हैं. रबी की बात करें, तो 17 लाख हेक्टेयर में से मात्र छह-सात लाख हेक्टेयर में रबी की खेती होती है. बाकी जमीन यूं ही खाली पड़ी रहती है.
   
सब्जियों के अलावा इस मौसम में दलहन-तिलहन और गेंहू की पैदावार होती है, हालांकि पिछले दो-तीन सालों में राज्य में सरसों के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है. दलहन के उत्पादन में भी झारखंड में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है. सब्जियों की बात करें, तो सब्जी उत्पादन में झारखंड काफी आगे बढ़ा है. रांची और इसके आसपास के इलाके में बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. सब्जी उत्पादन से किसानों को ज्यादा फायदा होता है, क्योंकि फसलों की अपेक्षा उतनी ही जमीन पर सब्जियों का उत्पादन ज्यादा होता है. रब फसल की राष्ट्रीय औसत की बात करें, तो दलहन को छोड़ कर बाकी अन्य सब्जियों और तिलहन के उत्पादन में राज्य काफी पीछे है. सिंचाई की पूरी व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण भी किसान समुचित रूप से खेती नहीं कर पाते हैं. हमारा उद्देश्य है कि कम-से-कम लागत में कैसे ज्यादा-से-ज्यादा उत्पादन हो सकता है.

सवाल : दलहन और तिलहन की खेती से किसानों को कैसे लाभ मिलेगा.
जवाब : खाद्यान्न के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं, लेकिन दलहन-तिलहन में हम आत्मनिर्भर नहीं हो पाये हैं. कुपोषण एक बड़ी समस्या है. कुपोषण से लड़ने के लिए प्रोटीन जरूरी है, जो दाल से मिलती है या मांस, मुर्गा या अंडा से मिलती है, हालांकि हर रोज मांसाहारी भोजन करना संभव नहीं है, इसलिए हमारी निर्भरता दाल पर काफी बढ़ जाती है. पूरे देश में 24 से 25 मिलियन टन दाल की जरूरत होती है, जबकि 17 से 18 मिलियन टन का ही उत्पादन देश में होता है. झारखंड की बात करें, तो राज्य की जलवायु दलहन के उत्पादन के लिए अनुकूल है. राज्य में दलहन का उत्पादन राष्ट्रीय औसत के बराबर होता है. बाकी चीजों में हम पीछे हैं. देश में दाल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए देश के 674 जिलों में पल्स हब सीड प्रोडक्शन प्रोग्राम की शुरुआत की गयी. 150 जगहों पर इसकी शुरुआत भी हुई और हर एक पल्स हब को डेढ़ करोड़ रुपये दिये गये. प्रत्येक साल 1000 क्विंटल उच्च गुणवत्ता वाले बीज पैदा करने के लिए कहा गया है. इससे किसानों को उच्च गुणवत्तायुक्त व अधिक उपजवाले बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हुए. इसका फायदा यह हुआ कि देश के इतिहास में पहली बार साल 2016 में दलहन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ और 21 से 22 मिलियन टन की पैदावार हुई. संयोग देखिये, इसी साल यानी 2016 को अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष भी घोषित हुआ. झारखंड की बात करें, तो मैंने पहले ही कहा है कि राज्य में दलहन उत्पादन के लिए मौसम अनुकूल है. राज्य के किसान दलहन और तिलहन की खेती करके अच्छी आमदनी कर सकते हैं. चना, सरसों, मसूर और तिसी की खेती करने से किसानों को काफी फायदा होता है. जिन किसानों के पास एक बार पटवन करने के लिए पानी है, वो तिसी और मसूर की खेती कर सकते हैं. वहीं जिन किसानों के पास दो बार पटवन करने के लिए पानी की व्यवस्था है, वो किसान सरसों और चने की खेती कर सकते हैं. किसान एक चीज का अवश्य ध्यान रखें कि उच्च गुणवत्तायुक्त और अधिक उपज देनेवाले बीज का ही इस्तेमाल करें, ताकि पैदावार अच्छी हो. मौसम के मुताबिक, राज्य के किसान दलहन उत्पादन पर खासा जोर दे सकते हैं. बशर्ते किसान अच्छी गुणवत्तायुक्त बीज को ही अपने खेतों में लगाये. केंद्र सरकार 2010 से ब्रिंगिग ग्रीन रिवोल्यूशन इन इस्टर्न इंडिया की योजना चला रही है. यह योजना देश के सात पूर्वी राज्यों में चलायी जा रही है, ताकि इन राज्यों में दलहन-तिलहन और अनाज के उत्पादन को बढ़ावा मिल सके. झारखंड में धान की कटाई के बाद से 14.5 लाख हेक्टेयर जमीन खाली पड़ी रहती है. उस जमीन पर दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा दिया सकता है.

सवाल : रबी फसल के तहत किसानों को लाभ कैसे मिलेगा. किसान अपनी आय बढ़ाने के लिए खेती के अलावा और किन तकनीकों को अपना सकते हैं.


जवाब : झारखंड की मिट्टी में सालोंभर फूलगोभी, पत्तागोभी, मूली जैसी सब्जियां पैदा होती हैं. सब्जी उत्पादन के जरिये किसान अच्छी कमायी कर सकते हैं, क्योंकि इनका उत्पादन अधिक होता है और कम समय में तैयार भी हो जाता है. नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन के जरिये पॉली हाउस और नेट हाउस का निर्माण करा कर ऑफ सीजन की सब्जियां उगा कर किसान अच्छी आमदनी कर सकते हैं. यह तो खेती की बात हो गयी. किसान सिर्फ अकेले विकास नहीं कर सकता है. इसके समग्र विकास लिए बागबानी, सब्जी उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन पर भी किसानों को विशेष ध्यान देना चाहिए. खाद के लिए पशुधन जरूरी है.
   
सब्जी खेतों में लगाने के बाद किसान को तीन से चार महीने का इंतजार करना पड़ता है, तब जाकर पैसे आते हैं, लेकिन अगर किसान कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी करें, तो पैसों के लिए उन्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा. अगर किसान बकरी, मुर्गी, गाय और सूकर पालन करते हैं, तो जरूरत पड़ने पर पशुओं या पशु उत्पाद सामग्री को बेच कर पैसों की कमी दूर कर सकते हैं. पशुपालन से किसानों को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे मिल जाते हैं. झारखंड में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक है. ऐसे किसान पशुपालन के जरिये आर्थिक तौर पर मजबूत हो सकते हैं.