aamukh katha

  • Oct 5 2017 1:49PM

दलहन की बंपर पैदावार चाहते हैं, तो इन बातों का रखें ख्याल

दलहन की बंपर पैदावार चाहते हैं, तो इन बातों का रखें ख्याल

पंचायतनामा डेस्क
दलहन और चना के उत्पादन को देशभर में बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार गंभीर है. परती जमीन पर दलहन की खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है, ताकि किसान दलहन की खेती पर जोर दे और उसका उत्पादन बढ़ाया जा सके. किसानों को दलहन उत्पादन से दोगुना फायदा होता है. दलहन की खेती करने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है. मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, जिसका लाभ किसानों को दूसरी फसल के उत्पादन में मिलता है. खेती-बारी से जुड़े किसान अगर दलहन की बंपर पैदावार चाहते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखकर वह पैदावार बढ़ा सकते हैं. चने की खेती कैसे करें, खेत कैसे तैयार करें, खाद की मात्रा कितनी हो , इन तमाम बातों का विशेष ध्यान रखकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है.

दलहन के लिए काली मिट्टी उपयुक्त
दलहन के उत्पादन के लिए काली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है, क्योंकि काली मिट्टी में पानी को रखने की क्षमता ज्यादा होती है. इससे पैदावार अच्छी होती है.

खेतों की मिट्टी की जांच अवश्य करायें

खेती-बारी से जुड़े किसान भाई-बहन सबसे पहले अपने खेतों की मिट्टी की जांच अवश्य करा लें. अगर आपके पास मिट्टी हेल्थ कार्ड है, तो मिट्टी में नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटाशियम (एनपीके) की मात्रा कितनी है, यह जान सकते हैं, साथ ही इसके जरिये मिट्टी में गंधक की कितनी मात्रा है, इसकी भी जानकारी मिल सकती है. दलहन फसल के उत्पादन में गंधक का महत्वपूर्ण योगदान होता है. मिट्टी की स्थिति भी आप जान सकते हैं कि आपके खेतों की मिट्टी अम्लीय (एसिडिक) है या क्षारीय (अल्कलाइन).

अम्लीय मिट्टी हो, तो रखें ध्यान
झारखंड में लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि अम्लीय है. फसलों के उत्पादन को ध्यान में रखते हुए 6.0 पीएच मान तक की मिट्टी को ही सुधारने की आवश्यकता है. अम्लीय मिट्टियों में पैदावार एवं उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए अम्लीयता का सुधार चूना तत्व डाल कर किया जाता है. जिस खेत की मिट्टी का पीएच मान 5.5 से कम हो, ऐसी मिट्टियों में खास कर दलहनी, तेलहनी एवं मक्का जैसी फसलों की बंपर पैदावार के लिए चूना तत्व जैसे- बूझा चूना या डोलोमाइट या बेसिक स्लैग का प्रयोग आवश्यक है, साथ ही फॉस्फेट तथा कैल्शियम की कमी पायी जानेवाली मिट्टी में भी चूनायुक्त तत्वों का प्रयोग किया जाना चाहिए.

बीजोपचार
खेत तैयार करने के साथ-साथ किसान चने के बीज का भी उपचार करें, ताकि उपज अच्छी हो. बीजोपचार करने के लिए डेढ़ ग्राम प्रति किलो चने की दर से बैबिस्टीन पाउडर को डाल कर अच्छे से मिला दें. इसके बाद उसमें थीरम मिला दें. दवा को इस तरह मिलायें कि बीज पर एक पतली परत दिखायी दे. चने की बुआई से पहले फॉस्फेट सॉल्युबल बैक्टिरिया के जरिये उपचार कर सकते हैं. इस विधि से उपचार करने पर चने की फसल में रोग नहीं लगते हैं.

बुआई की विधि
खेत तैयार करने के बाद और बीजोपचार के बाद किसान खेत में चने की बुआई कर सकते हैं. अच्छी फसल के लिये किसान एक लाइन में चने की बुआई करें. दो लाइन के बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर और दो पौधों के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिये. किसान यह जरूर सुनिश्चित करें कि बुआई के समय खेत में नमी है या नहीं. अगर खेत में नमी नहीं है, तो किसान बुआई के साथ पटवन कर सकते हैं और अगर खेत में नमी है, तो भूल कर भी पटवन नहीं करें वरना अंकुरित होने से पहले ही चना सड़ सकता है.

बीज के चयन और बीजों की मात्रा
बीज के चयन की बात करें, तो अगर किसान एक नवंबर से 20 नवंबर तक बुआई करते हैं, तो केडब्लयूआर-108 बीज ले सकते हैं, जो फार्म में उपलब्ध है. अगर किसान एक दिसंबर से 20 दिसंबर तक बुआई करते हैं, तो केपीजी-59 बीज का उपयोग कर सकते हैं. किसान यहां ध्यान रखें कि 20 दिसंबर के बाद चने की बुआई से परहेज करें, क्योंकि इसके बाद बुआई करने से फसल के उत्पादन में कमी आ जाती है. बीज की मात्रा भी जानना बेहद जरूरी है. किसान प्रति हेक्टेयर 70 से 75 किलो की दर से देसी चने की बुआई कर सकते हैं.

सिंचाई
अगर बुआई के वक्त खेत में नमी है, तो किसान सिर्फ दो बार पटवन कर चने की अच्छी पैदावार कर सकते हैं. पहली बार किसान पौधों में फूल लगने के समय सिंचाई करें और दूसरी बार जब फल लग रहा हो, तब चने के खेतों में पटवन अवश्य करें. अगर बारिश हो जाती है, तो पटवन की आवश्यकता नहीं है.

निकाई-गुड़ाई
बुआई के 30 से 40 दिन बाद किसान खेतों में निकाई-गुड़ाई कर सकते हैं. इससे खेतों में खर-पतवार और घास साफ हो जायेगा, साथ ही खुरपी से चने की जड़ के आसपास हल्की-हल्की मिट्टी खोद दें, ताकि नाइट्रोजन बनाने में दलहन की फसल को आसानी होगी और उससे पैदावार बढ़ेगी. किसान ध्यान दें कि पौधों का विकास सही से हो रहा है या नहीं. अगर पौधा कमजोर है, तो खेत में नमी देख कर नाइट्रोजन का छिड़काव करें. बाद में 60 से 70 दिनों के बाद पौधे के ऊपरी भाग को तोड़ कर साग निकाल सकते हैं. इससे चने के पौधे को भी फायदा होगा और अधिक फैलाव होगा. चने की साग बाजार में बेच कर भी किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. इस दौरान ध्यान रखें कि पौधे के ऊपरी भाग को ही तोड़ें.

खर-पतवार नियंत्रण

खर-पतवार नियंत्रण के लिए किसान पेंडी मेथलीन के घोल का उपयोग कर सकते हैं. किसान एक किलो ग्राम पेंडी मेथलीन को 600 लीटर पानी में मिला कर घोल तैयार कर सकते हैं. इसका छिड़काव जमीन में नमी होने पर ही करें.

रोग और कीट नियंत्रण
झारखंड में विल्ट रोग से ही चने की फसल को बहुत अधिक नुकसान पहुंचता है. विल्ट रोग के निवारण के लिए थीरम या वैभिष्टिन का घोल बना कर चने की जड़ के पास छिड़काव कर सकते हैं. विल्ट रोग होने पर चने के पौधे की पत्तियां पीली होकर सूखने लगती है. चने में फली छेदक अथवा ग्राम पोड बोरक नामक किट लगता है, जो फली को छेद कर उसमें अपना घर बना लेता है. फली छेदक के नियंत्रण के लिए किसान 0.5 एमएल इंडोक्साकार्प प्रति लीटर पानी में मिला कर पौधों में छिड़काव करें. इन सब उपायों को अपना कर किसान बंपर उत्पादन कर सकते हैं.   

कहां करायें अपने  खेतों की मिट्टी की जांच
अपने खेतों में उत्पादन वृद्धि की इच्छा रखनेवाले सभी किसान भाई-बहनों को अपने खेतों की मिट्टी की जांच अवश्य करानी चाहिए. इसके लिए विभिन्न संस्थाओं में मिट्टी जांच की सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध है. इन संस्थानों में मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (कांके, रांची), क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र (दुमका, चियांकी-पलामू एवं दारिसाई-पूर्वी सिंहभूम), कृषि विज्ञान केंद्र (सभी जिले में), रामकृष्ण मिशन (मोरहाबादी, रांची), कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग की मिट्टी जांच प्रयोगशाला (रांची, चक्रधरपुर, लातेहार, दुमका) एवं दामोदर घाटी निगम, हजारीबाग व कई गैर सरकारी संस्थाओं में भी मिट्टी की जांच होती है, वहां अपने खेतों की मिट्टी की जांच करा सकते हैं.

कैसे करें अपने  खेतों को तैयार
किसान भाई-बहन अपने खेतों को दो से तीन बार अच्छी तरह से जुताई कर लें. जुताई के समय अगर खेतों की मिट्टी अम्लीय हो, तो उसमें तीन से चार क्विंटल प्रति हेक्टयर की दर से पाउडर किया हुआ चूना छिड़क दें. सड़ा हुआ गोबर खाद भी जुताई के समय मिला सकते हैं. जुताई करने के बाद खेत को ठीक से बराबर कर लें. अगर खेत में काली मिट्टी हो, तो चूना डालने की आवश्यकता नहीं है. अम्लीय मिट्टी में खाद,  नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटाशियम (एनपीके) की मात्रा 25:50:25 होनी चाहिए. सब कुछ करने के बाद किसान खेत से खर-पतवार अच्छी तरह साफ कर लें.

वैज्ञानिक तरीके से करें खेती, पैदावार होगी अच्छी
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के कृषि वैज्ञानिक कमलेश्वर कुमार कहते हैं कि राज्य में खेती-किसानी से जुड़े किसान भाई-बहनों का भविष्य उज्ज्वल है. अगर आधुनिक और वैज्ञानिक विधि से खेती की जाये, तो उनके खेतों में बंपर पैदावार होगी. इसके लिए छोटी-छोटी बातों का भी किसान भाई-बहनों को ध्यान देना होगा. चने की बात करें, तो मात्र दो बार सिंचाई करने से ही यह फसल तैयार हो जाता है. इसके साथ-साथ किसान चने के साग को भी बेच कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है. दलहन की फसल के लिए किसानों को तुरंत बाजार की आवश्यकता भी नहीं होती है. किसान अपने हिसाब से दाम घटने-बढ़ने पर इसे बेच सकते हैं. दलहन की खेती करने से जमीन को भी फायदा होता है. जमीन में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, जो दूसरे फसलों के लिए काम आता है और दूसरे फसलों की भी उपज में बढ़ोतरी होती है.

कमलेश्वर कुमार
कृिष वैज्ञानिक