aamukh katha

  • Oct 5 2017 2:02PM

‘सोना’ उगाने की तैयारी

‘सोना’ उगाने की  तैयारी

झारखंड के किसान भाई-बहनों ने रबी की खेती की तैयारी शुरू कर दी है. लक्ष्य से अधिक उत्पादन की संभावना जतायी जा रही है. ऐसे में किसान भाई-बहनों को रबी फसल के बंपर उत्पादन के लिए हर पहलू को जानना जरूरी है, ताकि ‍उनके खेत सोना उगल सकें. मिट्टी की जांच, बीजोपचार, बुआई, फसलों की देखरेख, सिंचाई की सुविधा, जैविक खाद का उपयोग एवं परंपरागत खेती की बजाय आधुनिक और वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की सलाह कृषि वैज्ञानिक दे रहे हैं. आमुख कथा के इस अंक में खेतों में ‘सोना’ उगाने की तैयारी को लेकर सभी आवश्यक जानकारी देने की कोशिश की गयी है, ताकि किसान भाई-बहनों को इसका बेहतर लाभ मिल सके़ ...

रबी की खेती सोना उगाने की तैयारी
रबी के मौसम में खेत सोना उगले, इसके लिए किसानों ने तैयारी पूरी कर ली है.राज्य सरकार ने 10 लाख हेक्टेयर भूमि पर रबी की खेती करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. लक्ष्य प्राप्ति के लिए राज्य सरकार खेती-किसानी से जुड़े सभी किसान भाई-बहनों को कई तरह की योजनाओं का लाभ दे रही है, साथ ही समय पर खाद उपलब्ध कराने के अलावा तकनीकी सलाह और प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है. राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2017-18 के बजट में कृषि क्षेत्र के लिए 5,375.22 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. यह राशि पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी अधिक है. राज्य के करीब 27-28 लाख किसान कृषि पर आश्रित हैं. राज्य में अन्य फसलों की तरह रबी फसल खासकर दलहन और तिलहन पर विशेष जोर दिया जा रहा है. आमुख कथा के इस अंक में रबी की मुख्य फसल गेहूं व दलहन की पैदावार को बढ़ाने के उपाय, जिलावार स्थिति एवं फसलों को रोगमुक्त करने के उपाय संबंधी अन्य जानकारी विस्तार से दी जा रही है. पढ़िए समीर रंजन का यह आलेख.

कृषि क्षेत्र से जुड़े किसान भाई-बहन खासकर ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के लिए सरकार ग्रामीण कृषि हाट का निर्माण कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है. राज्य की 38 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से मात्र 8.24 लाख हेक्टेयर भूमि ही सिंचित भूमि है. शेष भूमि पर समुचित सिंचाई की सुविधा नहीं होने के कारण उत्पादन पर इसका असर पड़ता है. इसकी गंभीरता को देखते हुए सरकार ने सिंचाई सुविधा की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए सिंचाई आयोग के गठन पर भी जोर दिया है, वहीं ग्रामीण कृषि हाट के निर्माण से किसानों को अपनी पैदावार को बेचने में सहूलियत होगी. किसानों के साथ सीधा संवाद, उनके प्रशिक्षण व नवीन तकनीक की जानकारी के लिए राज्य की प्रत्येक पंचायत में किसान पाठशाला का आयोजन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से झारखंड जैविक कृषि प्राधिकार के माध्यम से चयनित जिलों में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जायेगा.

किसानों के बीच आठ लाख मिट्टी हेल्थ कार्ड का वितरण
किसान भाई-बहन के खेतों में लगी फसलों की पैदावार बढ़े और मिट्टी की उर्वरता बरकरार रहे, इसके लिए सरकार ने कई योजनाएं चला रखी है. इसके तहत जल संचयन, बीज उत्पादन, परती भूमि को उपजाऊ बनाना, दलहन उत्पादन, मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, कृषि उपकरण बैंक की स्थापना, कृषि महोत्सव रथ यात्रा, किसानों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम मुख्य है. झारखंड सिंगल विंडो सिस्टम को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. वित्तीय वर्ष 2016-17 में 100 स्वीकृत सिंगल विंडो सिस्टम में से 78 कार्यशील है, वहीं वित्तीय वर्ष 2017-18 में स्वीकृत 100 सिंगल विंडो सिस्टम का भी कार्य शुरू हो चुका है.उर्वरक के अग्रिम भंडारण के लिए 8,898 मैट्रिक टन उर्वरक का वितरण किसानों के बीच लैम्पस/पैक्स के माध्यम से किया गया है, वहीं झारखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जहां मिट्टी हेल्थ कार्ड योजना के तहत अब तक 7.95 लाख कार्ड का वितरण किसानों के बीच किया गया है. कृषि यंत्रों एवं सिंचाई पंप के परिचालन में सौर ऊर्जा के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है. राज्य में किसानों के लिए अब तक 539 बीज ग्रामों की स्थापना हुई है.

राज्य की कृषि व गैर कृषि योग्य भूमि की स्थिति
राज्य की करीब 76 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है. कुल श्रम शक्ति का लगभग 67 फीसदी कृषि पर आश्रित है. राज्य में कुल 79.71 लाख हेक्टेयर भूमि है. इसमें से 38 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है यानी राज्य का कुल कृषि योग्य भूमि 47.67 फीसदी है. हालांकि कृषि योग्य भूमि में से 25.75 लाख हेक्टेयर भूमि यानी 32.30 फीसदी ही खेती लायक है, जो मॉनसून पर आधारित है.शेष करीब13लाख हेक्टेयर भूमि आज भी परती है. वर्ष 2016-17 में दो लाख हेक्टेयर भूमि को खेती योग्य बनाया गया, साथ ही दो लाख हेक्टेयर जमीन में मेड़बंदी भी की गयी. भूमि में उर्वरक तत्वों की कमी, असमान भूमि वितरण, कृषि प्रक्षेत्र में कम पूंजी का होना भी कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है. रबी फसल के अंतर्गत आनेवाले गेंहू, रबी मक्का,चना, मसूर, मटर, राई या सरसों, तिसी, जौ, कुसुम, सूर्यमुखी और आलू के उत्पादन पर विशेष जोर दिया जाता है. इसके अलावा विभिन्न सब्जियों के उत्पादन पर भी जोर दिया जा रहा है.

डबल क्रॉपिंग राइस फेलो स्कीम
राज्य में धान मुख्य फसल के रूप में उपजाया जाता है. धान की खेती के बाद खेत खाली पड़े रह जाते हैं. इन खाली पड़े खेतों में द्वितीय फसल के रूप में दलहन, तिलहन एवं मोटे अनाज जैसे-रागी, गुंदली, मकई, मड़ुआ आदि की खेती को प्रोत्साहित करने की योजना है. इसके लिए लगभग एक लाख हेक्टेयर में द्वितीय फसल की खेती 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में क्रियान्वित की जायेगी. इस योजना को सफल बनाने के लिए शत-प्रतिशत अनुदान पर जीरो सीड ड्रिल मशीन, कृषकों को प्रोत्साहन राशि, विशेषज्ञ सलाह, स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से प्रचार-प्रचार का प्रावधान किया गया है.

बीज उत्पादन की स्थिति
राज्य में किसानों के बीच धान, गेहूं, दलहन, मक्का आदि के बीज किसानों के बीच 50 फीसदी अधिकतम अनुदानित दर पर वितरित किया जाता है. इस योजना के अंतर्गत राज्य को बीज उत्पादन में स्वावलंबी बनाने के लिए राज्य के विभिन्न बीज गुणन प्रक्षेत्रों में बीज उत्पादन कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं.

रबी की फसलें
यह फसल अक्तूबर-नवंबर में बोई जाती है और मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है. इन फसलों की बुआई के समय कम तापमान तथा पकते समय खुश्क और गर्म वातावरण की आवश्यकता होती है.

गेंहू
मक्का
चना
मसूर
मटर
राई
सरसों
तिसी
जौ
कुसुम
सूर्यमुखी
आलू
लक्ष्य निर्धारण

राज्य सरकार ने रबी फसल 2016-17 के लिए 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती करने का लक्ष्य निर्धारित किया है.
फसल                 लक्ष्य (हेक्टेयर)
 गेहूं                         2.41 लाख
 दलहन                   4.015 लाख
 तिलहन                  3.95175 लाख
मक्का                    0.2745 लाख


2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य
किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने एक लक्ष्य रखा है. यह लक्ष्य है वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का. देश के सभी जिलों में 16 अगस्त 2017 से केवीके के संयोजन में किसानों की आय दोगुनी करने के लिए संकल्प सम्मेलनों में काफी संख्या में किसान एवं अधिकारी संकल्प ले रहे हैं. इसके तहत सरकार सात सूत्री कार्यक्रमों पर भी जोर दे रही हैं,ताकि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो सके.

उत्पादन में बढ़ोत्तरी
फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई में सुधार की जरूरत है. इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र व राज्य सरकार ने सूखे की समस्या से छुटकारा पाने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की. इसका लक्ष्य हर खेत को पानी पहुंचना है. इसके तहत लंबित मध्यम एवं बड़ी सिंचाई योजनाओं को पूर्ण करने की दिशा में काम हो रहा है. इसके अलावा जल संचयन व जल प्रबंधन के साथ वाटरशेड डेवलपमेंट का कार्य भी तेज गति से क्रियान्वित हो रहा है.

लागत का प्रभावी उपयोग
किसानों को उनके खेतों की उर्वरता बरकरार रखने के उद्देश्य से मिट्टी हेल्थ कार्ड की शुरुआत की गयी है. इस प्रावधान से संतुलित उर्वरकों के
उपयोग के कारण किसानों की लागत में कमी हो रही है एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है. इसी प्रकार नीम कोटेड यूरिया के माध्यम से यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता तथा यूरिया का अवैध रूप से रासायनिक उद्योग में दुरुपयोग भी खत्म हो गया है. सरकार जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रही है. कृषि प्रक्षेत्र में नयी तकनीकों का उपयोग, जैसे-कृषि प्रक्षेत्र के लिए स्पेस टेक्नोलॉजी राष्‍ट्रीय कार्यक्रम के माध्यम से उत्पादकता एवं कृषि क्षेत्र का अनुमान, सूखा का पूर्वानुमान, धान खाली क्षेत्र का रबी मौसम में बेहतर उपयोग आदि से प्लानिंग एवं उत्पादन बढ़ोतरी में सहायता मिल रही है. इसके अतिरिक्त किसान कॉल सेंटर, किसान सुविधा ऐप जैसे दूरसंचार एवं ऑनलाइन माध्यमों से किसानों तक ससमय सूचना एवं सलाह भी पहुंचायी जा रही है.

उपज के बाद घाटा कम करना
फसलों की उपज के बाद उसका भंडारण करना किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है. मजबूरी में कम कीमत पर उपज की बिक्री करनी पड़ती है. इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान किसानों को प्रोत्साहित करना है कि अपनी फसल को मजबूरी में औने-पौने दामों में न बेचें.


ऐसे बढ़ेगी रबी की पैदावार
गेहूं
गेहूं की खेती करते समय भूमि का चुनाव अच्छे से कर लेें. अच्छी फसल के उत्पादन के लिए मटियार दोमट भूमि को सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन पौधों को सही मात्रा में खाद दिया जाये और सही समय पर  सिंचाई की जाये, तो किसी भी हल्की भूमि पर गेहूं की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है.खेती से पहले मिट्टी की ठीक से जुताई कर उसे भुरभुरा बना लें और फिर उस मिट्टी को ट्रैक्टर चला कर समतल कर दें. गेहूं की खेती में बुआई के वक्त कम तापमान और फसल पकते समय शुष्क और गर्म वातावरण की जरूरत होती है. इसलिए गेहूं की खेती ज्यादातर अक्तूबर या नवंबर महीने में की जाती है.

बीजोपचार
बीज बुआई से पहले बीज की अंकुरण क्षमता की जांच अवश्य करनी चाहिए. अगर गेहूं के बीज उपचारित नहीं हैं, तो बुआई से पहले बीज को किसी फफूंदी नाशक दवा से उपचारित करना आवश्यक है.

सिंचाई प्रबंधन

अच्छी फसल के लिए समय पर सिंचाई करना जरूरी है. ठंड के मौसम में अगर वर्षा हो जाये, तो सिंचाई कम भी कर सकते हैं. गेहूं की खेती में पहली सिंचाई, बुआई के लगभग 25 दिन बाद करनी चाहिए,वहीं दूसरी सिंचाई लगभग 60 दिन बाद और तीसरी सिंचाई लगभग 80 दिन बाद अच्छी होती है.

खर-पतवार प्रबंधन
खर-पतवार के कारण गेहूं की खेती में उपज में 10 से 40 प्रतिशत कमी आ जाती है. इसलिए इसका नियंत्रण जरूरी है. बीज बुआई के 30 से 35 दिन बाद तक खर-पतवार को साफ करते रहना चाहिए. गेहूं की खेती में दो तरह के खर-पतवार होते हैं. पहला सकड़ी पत्तेवाला खर-पतवार, जो गेहूं के पौधे की तरह ही दिखता है और दूसरा चौड़े पत्तेवाला खर-पतवार. इसके नियंत्रण के लिए 2-4डी का छिड़काव करें.

फसल की कटनी और भंडारण
गेहूं की फसल लगभग 125 से 130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. फसल पकने के बाद सुबह-सुबह फसल की कटनी करनी चाहिए, फिर उसका थ्रेसिंग करना चाहिए. थ्रेसिंग के बाद उसको सुखा लें. जब बीज पर1 0 से 12 फीसदी नमी हो, तभी इसका भंडारण करना चाहिए.

जौ
सिंचाई एवं उर्वरक के सीमित साधन एवं असिंचित दशा में गेहूं की अपेक्षा जौ की खेती अधिक लाभप्रद है. हालांकि देश समेत झारखंड में भी जौ की खपत बहुत कम है, लेकिन इसकी पैदावार औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है. खास कर जिन लोगों को डायबिटीज होती है,उनके लिए ये बहुत ही लाभदायक है. जौ की उन्नतशील प्रजातियां तीन तरह की पायी जाती हैं. इसमें छिलका युक्त,छिलका रहित और माल्ट मुख्य है. छिलका युक्त जौ छीलने के बाद रोटी बनाने में प्रयोग किया जाता है.

उपयुक्त जलवायु
जौ की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है. इसकी खेती के लिए बुआई के समय 25-30 डिग्री सेंटीग्रेट उपयुक्त माना जाता है. बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है, वहीं उसरीली भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है.

कैसे करें खेती
जौ के खेत की तैयारी के लिए देसी हल या हैरो या कल्टीवेटर से दो-तीन बार जुताई करके खेत की मिट्टी को भुरभुरा बनाते हुए पाटा लगा कर तैयार करना चाहिए.

कब करें बुआई
जौ की फसल प्राप्ति के लिए बुआई का सही समय असिंचित क्षेत्र में 20अक्तूबर से 10 नवंबर तक, सिंचित क्षेत्र में 25 नवंबर तक तथा देर से बुआई के लिए दिसंबर के दूसरे पखवाड़े तक बुआई करनी चाहिए. बुआई करने के लिए हल के पीछे लाइनों में 23 सेंटीमीटर लाइन से लाइन की दूरी एवं पांच-छह सेंटीमीटर गहराई पर बुआई करनी चाहिए तथा सिंचित दशा में सात-आठ सेंटीमीटर गहराई पर बुआई करनी चाहिए, जिससे जमाव अच्छा हो सके.

सिंचाई प्रबंधन
गेंहू की अपेक्षा जौ की सिंचाई में थोड़ा अंतर है. पहली सिंचाई, बुआई के 30-35 दिन बाद कल्ले फूटते समय एवं दूसरी, गांठें बनते समय करनी चाहिए. माल्टा प्रजातियों में एक अतिरिक्त सिंचाई की भी आवश्यकता पड़ती है.

खर-पतवार प्रबंधन
जौ की फसल में रबी के खर-पतवार सभी उगते हैं. इनका नियंत्रण निराई-गुड़ाई तथा रसायनों के प्रयोग के माध्यम से करना चाहिए.

कीट प्रबंधन
जौ की खड़ी फसल को चूहा सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, साथ ही दीमक भी जौ की फसल को नुकसान करते हैं. इनकी रोकथाम के लिए दीमक लगे क्षेत्र में नीम की खली 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी करते समय प्रयोग करते हुए पिछली फसल के सभी अवशेष नष्ट कर देना चाहिए, वहीं चूहों की रोकथाम के लिए जिंक फॉस्फाइट या बेरियम कार्बोनेट के बने नशीले चारे का प्रयोग करना चाहिए. एक भाग दवा,एक भाग सरसों का तेल तथा 48भाग दाना मिला कर चारा बनाया जा सकता है.

फसल कटाई
जौ की कटाई फसल पकने पर सुबह या शाम को करें. इसके तुरंत बाद मड़ाई करके अनाज का भंडारण कर देना चाहिए.जौ की फसल में भंडारण करने पर भी बहुत से कीट लगते हैं. मौसम का बिना इंतजार किये हुए उपज को बोरों में भर कर साफ-सुथरे एवं सूखे स्थान पर नीम की पत्ती बिछा कर रखना चाहिए, साथ ही रसायनों का प्रयोग करना चाहिए.

जिलावार लक्ष्य व आच्छादन (हजार हेक्टेयर में)
जिला    लक्ष्य     आच्छादन    प्रतिशत
रांची    15    12    79
गुमला     10     7.2    72.35
सिमडेगा    10.5     09     85.10
लोहरदगा    08     03    33.43
खूंटी    07    06    84.24
पलामू     17    11.12    65.45
गढ़वा    16.5    18.57    113
लातेहार    09    08    85
पूर्वी सिंहभूम    6.5    6.18    95.20
पश्चिमी सिंहभूम    7.5    0.93    12.51
सरायकेला-खरसावां     05    4.2    85
हजारीबाग    15    12     81
चतरा    11       11.12    101.14
कोडरमा    9    7.28    81
धनबाद     04    03    70
बोकारो      04     3.23      81
गिरिडीह    12       10       84
देवघर      11       09       80
रामगढ़      04       3.46       87
दुमका      16       12       73
साहेबगंज      13       12       90.19
पाकुड़      09       07       76
जामताड़ा      08       6.12       77
गोड्डा      13       12       92