aamukh katha

  • Oct 25 2017 2:03PM

हर किसी को भरपेट भोजन का है संवैधानिक अधिकार

हर किसी को भरपेट भोजन का है संवैधानिक अधिकार
हर साल 16 अक्तूबर को विश्व खाद्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. झारखंड में भी खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू है. इसके तहत सभी को भरपेट भोजन मिले, यह सुनिश्चित करने का काम राज्य सरकार का है. अधिनियम बन जाने के बावजूद राज्य के कई लोगों को आज भी दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है. अनाजों की कालाबाजारी आज भी जारी है. भले ही सरकार ई-पॉस मशीन व अन्य आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर कालाबाजारी रोकने और सही लाभुकों तक राशन पहुंचाने का दंभ भर रही है, लेकिन आज भी स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. आज भी लाभुकों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है. आज भी पीडीएस दुकानदारों के खिलाफ लगातार शिकायतें आ रही हैं. विभाग कर्मचारियों के अभाव का रोना रोता है और जनता कम अनाज पाने का. आमुख कथा के इस अंक में लाभुकों को कैसे मिले अनाज, क्या है उनका संवैधानिक हक और कैसे भरे अपना और अपने परिवार का पेट, इस संदर्भ में बताने की कोशिश की गयी है, ताकि राज्य में खाद्य सुरक्षा का सपना सच हो सके.
 
पंचायतनामा डेस्क
लोगों को पर्याप्त मात्रा में अनाज और भरपेट भोजन मिले, इसके लिए झारखंड में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू है. खाद्य सुरक्षा यानी समाज के सभी लोगों को पर्याप्त मात्रा में भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है. इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया था. इसमें लोगों को सस्ती कीमत पर गुणवत्तायुक्त भोजन और पोषण सुरक्षा की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इस अधिनियम को लागू किया गया था. झारखंड में अक्तूबर 2015 को यह अधिनियम लागू किया गया था. इसके लागू होने से राज्य की 80.16 फीसदी आबादी लाभान्वित हो रही है. इसके तहत राज्य की 86.48 फीसदी ग्रामीण आबादी तथा 60.20 फीसदी शहरी आबादी इसका लाभ उठा रही है. 

अधिनियम लागू होने से पहले अंत्योदय अन्न योजना, मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना (बीपीएल) एवं अतिरिक्त ग्रामीण बीपीएल परिवारों को खाद्यान्न वितरण योजना के अंतर्गत 35 लाख 9 हजार 833 परिवारों को अनुदानित दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता था. इस केंद्रीय कानून के तहत चावल की आपूर्ति तीन रुपये प्रति किलोग्राम की दर से करने का प्रावधान है, लेकिन राज्य सरकार ने इसे मात्र एक रुपये प्रति किलोग्राम की दर से देने की घोषणा करते हुए शेष खर्च स्वयं वहन करने का निर्णय लिया था. वर्तमान में 56 लाख 06 हजार 879 परिवारों को एक रुपये प्रति किलोग्राम की दर से चावल/गेहूं उपलब्ध कराया जा रहा है. अधिनियम के अंतर्गत पात्र गृहस्थ योजना (पीएचएच) एवं अंत्योदय अन्न योजना के तहत प्रतिमाह 1.44 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है. इस तरह राज्य में खाद्यान्न वितरण 97 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर एक लाख 45 हजार मीट्रिक टन हो गया है. राज्य में लक्षित जन वितरण प्रणाली के जरिये गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले और अंत्योदय परिवारों को एक रुपये प्रति किलोग्राम की दर से चावल दिया जाता है. इसके तहत दिये जानेवाले आयोडिन नमक की गुणवत्ता में सुधार करते हुए अब डबल फोर्टिफाईड आयोडिनयुक्त नमक का वितरण किया जा रहा है. आयरन और आयोडीन युक्त नमक (डबल फोर्टिफाइड साल्ट) बांटने वाला झारखंड देश का दूसरा राज्य बन गया है. इससे खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राज्य के लगभग 58.40 लाख परिवार लाभान्वित हो रहे हैं. 

अधिनियम को लागू करने के लिए वर्ष 2011 की जाति आधारित जनगणना को आधार बनाया गया है. जिन जनजाति परिवारों का अब तक राशन कार्ड नहीं बना है, उनके आधार सीडिंग का कार्य चल रहा है. जल्द ही उन्हें भी जोड़ दिया जायेगा. इस अधिनियम के तहत अब तक 10,38,714 राशन कार्ड रद्द किये जा चुके हैं और 9,31,079 नये राशन कार्ड जोड़े गये हैं. 

अगस्त 2017 तक 72 हजार मीट्रिक टन अनाज यानी रुपयों में सवा 200 करोड़ की बचत हुई है. शत प्रतिशत राशन कार्ड को आधार से लिंक कराने का कार्य पूरा हो चुका है. अब तक मात्र 19 हजार परिवारों का ही राशन कार्ड नहीं बन पाया है. इसके दायरे में सही लोगों के नाम और गलत नामों को बाहर करने के लिए मतदान केंद्र स्तर पर सत्यापन का व्यापक अभियान चलाया गया था. धान अधिप्राप्ति के लिए बोनस भुगतान योजना के तहत किसानों को धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1470 रुपये के अतिरिक्त 130 रुपये प्रति क्विंटल बोनस दिया जा रहा है. डीलरों को दिये जानेवाले कमीशन को भी 26 पैसे से बढ़ा कर एक रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है. सरकार ने इस संबंध में किसी प्रकार की शिकायत के लिए नि:शुल्क हेल्पलाइन नंबर 0651-7122723 और +91896-9583111 जारी किया है, जिसके जरिये उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों की जानकारी दी जाती है.

क्या है खाद्य सुरक्षा अधिनियम
सबको भरपेट भोजन मिले, यह सुनिश्चित करने का काम राज्य सरकारों का है. संविधान के अनुच्छेद 47 में भी कहा गया है कि ‘राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर व जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा’. देश में हर किसी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे संविधान की इस भावना के आलोक में आगे बढ़ता हुआ कदम है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित एक कानून है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित करना है कि देश में जनसाधारण को खाद्यान्न सही तरीके से उपलब्ध हो सके.
 
उद्देश्य
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्य लोगों को सस्ती दर पर पर्याप्त मात्रा में उत्तम खाद्यान्न उपलब्ध कराना है, ताकि उन्हें खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मिले और वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें.
 
मुख्य प्रावधान
इस कानून के तहत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 75 फीसदी तथा शहरी क्षेत्रों की 50 प्रतिशत तक की आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान है. इस तरह देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या को इसका लाभ मिलता है. अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) में शामिल परिवारों को प्रति परिवार 35 किलोग्राम अनाज मिल रहा है. गर्भव‍ती तथा स्तनपान करानेवाली महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान तथा प्रसव के छह माह के उपरांत भोजन के अलावा कम-से-कम छह हजार रुपये का मातृत्व लाभ भी मिलेगा, वहीं 14 वर्ष तक की आयु के बच्चे पौष्टिक आहार अथवा निर्धारित पौष्टिक मानदंड अनुसार घर राशन ले जा सकें. खाद्यान्न अथवा भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाने की स्थिति में लाभार्थी को खाद्य सुरक्षा भत्ता दिया जायेगा. इस अधिनियम में जिला और राज्य स्तरों पर शिकायत निपटान तंत्र के गठन का भी प्रावधान है. पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी इस अधिनियम में अलग से प्रावधान किये गये हैं.
 
भोजन का अधिकार
भोजन का अधिकार व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है. अनाज के साथ-साथ पोषणयुक्त चीजों का होना भी जरूरी है. अनाज, दाल, तेल, सब्जियां, फल, अंडे, दूध, फलियां, गुड़ और कंदमूल की उपलब्धता हर एक व्यक्ति को हो, ताकि कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा किया जा सके. इस अधिकार को सुनिश्चित करने में सरकार की सीधी भूमिका है. पीने का साफ पानी, स्वच्छता और सम्मान भी भोजन के अधिकार में शामिल है.