aamukh katha

  • Nov 3 2017 1:35PM

जितना होगा हाइब्रिड बीज का उपयोग, उतनी बढ़ेंगी बीमारियां

जितना होगा हाइब्रिड बीज का उपयोग, उतनी बढ़ेंगी बीमारियां

 झारखंड की जलवायु और मिट्टी का असर कहिए कि यहां कीट का प्रभाव पहले बहुत कम था. प्रकृति ने झारखंड को इस कदर संवारा था कि यहां की मिट्टी में मित्र कीटों की संख्या काफी अधिक थी, जिसके कारण यहां के खेतों में कीट और बीमारियों की समस्या बहुत कम थी. जो बीमारियां और कीट होते भी थे, उनका असर उतना नहीं होता था. फसल पर बीमारियों का असर कहीं- कहीं पर दिखता भी था, तो उसकी संख्या काफी कम होती थी, लेकिन उत्पादन बढ़ाने के नाम पर जब से हाइब्रिड बीजों का दौर शुरू हुआ, तब से झारखंड के खेतों में नये कीट और बीमारियों का आगमन हुआ. हाइब्रिड बीज के साथ-साथ नयी बीमारियां भी आयीं़  अब किसानों को चेतना होगा, नहीं तो कीट और बीमारियों का प्रभाव और बढ़ जायेगा. किसान कीटनाशक का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं.

इससे यहां के मित्र कीटों को नुकसान पहुंच रहा है और पर्यावरण पर भी इसका असर पड़ रहा है. राज्य के किसान चाहें, तो प्राकृतिक तरीके से भी कीट और बीमारियों पर नियंत्रण पा सकते हैं़  देसी कीट उपचार के तरीके और देसी नस्ल के बीज से भी किसान हाइब्रिड से अधिक उत्पादन कर सकते हैं. इसका एक लाभ यह होगा कि मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी और किसान आराम से खेती कर पायेंगे़  किसानों की विभिन्न समस्याओं के बारे में जिला कृषि पदाधिकारी (रांची) अशोक कुमार सिन्हा से पंचायतनामा ने विस्तार से बातचीत की. पेश है बातचीत पर आधारित यह आलेख.

 
ईश्वर ने झारखंड को अच्छी कृषि योग्य भूमि का तोहफा दिया है. यहां की मिट्टी और पर्यावरण ने कृषि को सहयोग करनेवाले इतने मित्र कीट दिये थे कि बीमारियां और कीट यहां की फसलों और सब्जियों में न के बराबर होती थीं. अब भी यहां कीट और बीमारियों का असर उतना ज्यादा नहीं है, लेकिन अगर यही स्थिति रही, तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं. जहां तक बात झारखंड में कीट और बीमारियों की है, तो राज्य में जबसे हाइब्रिड बीज लगाने का दौर शुरू हुआ, तब से ही बीमारियां शुरू हुईं. अब तो हाइब्रिड बीज लगाने का चलन ही हो गया है. हर साल किसान धान खरीदते हैं और खेतों में लगाते हैं. जो भी हाइब्रिड बीज हैं, वो हमारे राज्य में पैदा नहीं होते हैं. उन्हें झारखंड के बाहर दूसरे राज्यों से लाया जाता है. इसके बाद झारखंड के किसान उस धान को खरीद कर अपने खेतों में लगाते हैं.

किसानों को तो यह पता भी नहीं होता है कि जिस धान को वो लगा रहे हैं, उस धान के साथ कुछ बीमारियां या कीट भी आ रहे हैं, जैसे- अगर किसान हाइब्रिड बीज लगा रहे हैं, जिसका उत्पादन ओड़िशा या आंध्र प्रदेश में हुआ है, तो उस बीज के साथ वहां की बीमारियां और कीट भी आ रहे हैं. आजकल धान में एक बीमारी फॉल्स स्मट अक्सर देखने को मिल रही है,जबकि यह बीमारी ओड़िशा और आंध्र प्रदेश में देखने को मिलती थी, पर अब यह बीमारी झारखंड में पहुंच गयी है. यह हाइब्रिड धान के जरिये ही झारखंड में पहुंची है. हमने ग्रामसभा के माध्यम से भी किसानों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि झारखंड में बीमारियों का प्रभाव अभी भी कम है, लेकिन किसानों को अभी से ही चेतना होगा, नहीं तो कीट और बीमारियों की समस्या आगे विकराल बन जायेगी. किसानों को कीटनाशक के इस्तेमाल से बचना होगा. स्थानीय हाइब्रिड बीज की उपज दूसरे राज्यों के हाइब्रिड बीज से अच्छी होती है. इसमें बीमारियों का खतरा भी नहीं होता. इसलिए बेहतर उपज वाले स्थानीय प्रभेद का इस्तेमाल करना चाहिए. आजकल किसान सबसे अधिक पायोनियर या धान्या हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल करते हैं, पर झारखंड के हजारीबाग स्थित अनुसंधान केंद्र में विकसित की गयी अभिषेक धान की उपज पायोनियर और धान्या से कहीं अधिक है. अभिषेक को झारखंड में विकसित किया गया है, जो यहां के वातावरण के अनुकूल है और बीमरियों का खतरा भी नहीं के बराबर है. चतरा के दो किसानों के बारे में बताना चाहूंगा. एक किसान ने अभिषेक धान लगाया और दूसरे ने सिजेंटा का बीज लगाया था.

दोनों के खेत अगल-बगल में थे. दोनों खेतों में लगी धान की बालियां देखीं और धान को तोड़ कर देखा. अभिषेक धान की बाली में अधिक धान था और वजन भी अधिक था. इससे आप समझ सकते हैं कि झारखंड में विकसित धान किसी हाइब्रिड बीज से कम नहीं है. अभिषेक का उत्पादन हजारीबाग स्थित आइसीएआर की धान अनुसंधान इकाई क्रश के द्वारा किया गया है. अभिषेक धान 10 दिन पहले ही तैयार हो जाता है. सब्जियों की बात करें, तो सब्जियों में भी जबर्दस्त तरीके से हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि हमारे यहां प्लांडू में विकसित की गयी सब्जियों के प्रभेद अच्छी पैदावार देते हैं.
 
 
फायदा कम, नुकसान ज्यादा
जिस हाइब्रिड बीज और कीटनाशक का इस्तेमाल किसान कर रहे हैं, उससे उन्हें फायदा की बजाए नुकसान ही हो रहा है. मिट्टी कमजोर हो रही है. उत्पादन क्षमता घट रही है. बीमारियों और कीटों का प्रकोप और बढ़ रहा है. समय के साथ यह समस्या और बढ़ती जायेगी. जिसके कारण किसानों को और अधिक खाद एवं कीटनाशक के साथ-साथ महंगे हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल करना पड़ेगा. इससे आखिरकार खेत बंजर हो जाएंगे. सब्जियों में हाइब्रिड बीज का उपयोग काफी तेजी से हो रहा है, जिससे फसलों में बीमारियां बढ़ रही हैं, जबकि सच्चाई यह है कि झारखंड में तैयार की गयी सब्जियों की उपज भी काफी अच्छी होती है. इसकी रोगरोधी क्षमता भी अच्छी होती है. किसानों को जागरूक करने के प्रयास किये जा रहे हैं. यह देखा जाता है कि गांव के हाट-बाजारों में किसान जाते हैं और दुकानदार जो भी कीटनाशक देता है, उसे लाकर उसका छिड़काव करते हैं. दुकानदार वही कीटनाशक किसानों को देते हैं, जिसे बेचने पर उन्हें ज्यादा मुनाफा मिलता है. किसानों में भी यह देखा गया है कि किसान शुरुआती दौर में कीट या बीमारी होने पर फसलों पर ध्यान नहीं देते हैं. जब क्षति का स्तर बहुत ज्यादा हो जाता है, तब जाकर कीटनाशक का छिड़काव करते हैं. अगर किसान पहले से ही ध्यान रखें और जिस समय फसल में कीड़े लगने शुरू हों, उस समय उपचार कर दें, तो बीमारी आगे नहीं बढ़ेगी और कीटनाशक खरीदने में किसानों के पैसे भी ज्यादा खर्च नहीं होंगे. इन सबके साथ-साथ कीटनाशक बेचनेवाले दुकानदारों को भी प्रशिक्षित होना बेहद जरूरी है. सरकार इसके लिए मैनेज संस्था के जरिये दुकानदारों को प्रशिक्षण दिलाने के लिए प्रयास कर रही है.  इस प्रशिक्षण में दुकानदारों को इतनी जानकारी दी जा रही है कि कम से कम वो बीमारी की पहचान करके किसानों को अच्छे कीटनाशक दे सकें, ताकि किसानों को परेशानी नहीं हो. कीटनाशक के इस्तेमाल के प्रति किसानों को यह सलाह देना भी उचित है कि इसका इस्तेमाल नहीं ही करें, तो बेहतर है, क्योंकि इससे सिर्फ नुकसान ही होता है. किसान जैविक खेती की ओर बढ़ें. इसके कई फायदे हैं. अगर कीटनाशक की आवश्यकता पड़ भी जाती है, तो किसान खुद से जैविक कीटनाशक बनाकर इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके निर्माण की प्रक्रिया आसान होती है और उसे अपने घर में भी बना सकते हैं.