aamukh katha

  • Nov 3 2017 1:37PM

कीटनाशक दवाइयों का अब कीटों पर बहुत असर ही नहीं होता

कीटनाशक दवाइयों का अब कीटों पर बहुत असर ही नहीं होता
बढ़ती जनसंख्या के कारण जमीन पर पहले की अपेक्षा दबाव बढ़ गया है. इस कारण खेती-किसानी पर भी दबाव बढ़ा है. ऐसे में अधिक उत्पादन व बेहतर मुनाफा के लिए किसानों का झुकाव हाइब्रिड बीज की ओर हुआ. पहले किसानों के खेत दूर-दूर होते थे, पर जमीन की कमी के कारण अब एक ही जगह पर कई खेत हो गये और उनमें अलग-अलग फसल लगायी जाने लगी. झारखंड में सब्जी की खेती की तरफ किसान ज्यादा आकर्षित हुए, क्योंकि इसमें मुनाफा ज्यादा था. सब्जी की अधिक उपज के लिए रासायनिक खाद का भी अंधाधुंध इस्तेमाल होना शुरू हो गया. किसान अपनी मर्जी से खेतों में खाद डालने लगे़  इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम होने लगी और यहीं से कीट का प्रकोप शुरू हो गया. पहले किसान पारंपरिक तरीके से प्राकृतिक खाद जैसे-गोबर और राख का उपयोग करते थे, लेकिन आधुनिकीकरण के कारण किसान इससे दूर होते चले गये. इस कारण खेतों में कीट की शुरुआत हुई. अत्यधिक रासायनिक कीटनाशक के प्रयोग से कीटों के अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गयी है. वर्तमान में देश में ऐसे पांच सौ कीट चिह्नित किये गये हैं, जिन पर कीटनाशकों का असर नहीं होता है. आखिर कृषि में यह स्थिति कैसे आयी, किसानों के लिए यह कितना बड़ा संकट है और कैसे इससे निपटा जा सकता है. इन तमाम मुद्दों पर पंचायतनामा ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके, रांची के कीट विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ देवेंद्र प्रसाद से बातचीत की. पेश है बातचीत के आधार पर यह आलेख.
 
सबसे पहले बात करते हैं खेती में आये बदलाव और सब्जियों व फसलों में बढ़ती बीमारियों की. जब से किसानों को सब्जियों की खेती में फायदा होने लगा और सब्जी की खेती जम कर होने लगी, तब से ही कीटों के पनपने की शुरुआत हो गयी. पहले किसानों के खेत दूर-दूर होते थे. बहुतायत में खेती होने के कारण सघन खेती की शुरुआत हुई. इसके साथ-साथ हाइब्रिड बीज का दौर आया और किसान बाजार से बीज लेकर खेतों में लगाने लगे, जिसके कारण अन्य जगहों की बीमारियां भी बीज के साथ यहां आ गयीं. बीज कंपनियों की मार्केटिंग के कारण किसान पारंपरिक बीज से दूर होते गये और समय के साथ अब किसान बीज के लिए पूरी तरह बीज कंपनियों पर ही निर्भर हो गये हैं. इसके कारण भी खेतों में कीट आने शुरू हो गये. फसलों और सब्जियों में कई तरह की बीमारियां होने लगीं. अब बात करते हैं खाद की. किस तरीके से किसान रासायनिक खाद के चक्कर में पड़ कर अपने खेतों में अधिक से अधिक खाद का प्रयोग करने लगे. खेतों में अत्यधिक रासायनिक खाद के प्रयोग के कारण जमीन पर इसका असर हुआ. फसलों व सब्जियों पर भी इसका प्रभाव पड़ा. इस कारण फसलों व सब्जियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती गयी. 
किसान बिना कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लिए खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग करने लगे, इसे भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा सकता है. इस तरह कहा जा सकता है कि यहीं से कीटनाशकों के इस्तेमाल की शुरुआत हुई. इसके बाद किसान बेहतर उपज के लिए अधिक से अधिक कीटनाशक का इस्तेमाल करने लगे. कीटनाशक और हाइब्रिड बीज बेचने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि गांव-गांव जाकर अपना प्रचार-प्रसार करने लगे. उन उत्पादों को बेचने और किसानों को देने से पहले राज्य के कृषि वैज्ञानिकों से भी राय-मशविरा नहीं लिया गया,जबकि जो कृषि वैज्ञानिक झारखंड के काम कर रहे हैं, वो और बेहतर उपाय बता सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. बस अधिक मुनाफा कमाने पर जोर दिया गया. भले ही लोगों के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव क्यों न पड़े.
 
अब बात समेकित कीट प्रबंधन की. समेकित कीट प्रबंधन, फसल और सब्जियों को कीट व रोगों से बचाने का एक कारगर प्राकृतिक उपाय है. बीमारी से पहले ही सुरक्षा इसका मूलमंत्र है. इसके तहत रोग आने से पहले ही बचाव के उपाय कर लिये जाते हैं. यह सदियों से चली आ रही परंपरा है. इसके तहत किसान गरमी में ही खेतों में गहरी जुताई कर देते थे, ताकि पूरी मिट्टी में धूप लग सके. जो हानिकारक कीट या बीमारियां मिट्टी में हैं, वो गर्मी से खत्म हो जायें. इस प्रक्रिया का किसानों को लाभ भी होता था और जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती थी. धूप के बाद जब मिट्टी में बारिश की बूंदें पड़ती थीं, तो मिट्टी नरम हो जाती थी और खेती के लिए उपयुक्त होती थी, लेकिन अब किसान फसल काटने के बाद गर्मी में खेतों की जुताई करने की बजाए उसे यूं ही छोड़ देते हैं. इतना ही नहीं, किसानों को खर-पतवार के नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए. खेतों से पौधों की खूंटियां, डंठल और पत्तों को जलाना नहीं चाहिए, उन्हें खेत के किसी कोने में दबा देना चाहिए. जलाने से मित्र कीट भी जल जाते हैं.
 
किसानों को बीज की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करना चाहिए, क्योंकि बीज खराब होगा, तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा. किसानों को  बीजोपचार पर भी ध्यान देने की जरूरत है. किसान आसान तरीके से भी बीजोपचार कर सकते हैं. इसके अलावा किसानों को बुआई करने से कम से कम एक-दो महीने पहले कृषि वैज्ञानिक या कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क जरूर करना चाहिए. अगर कृषि क्षेत्र से जुड़ा कोई एनजीओ क्षेत्र में कार्य कर रहा है, तो उससे संपर्क कर सकते हैं.
 
बेहतर उपज तथा कीट व रोग पर नियंत्रण के लिए मिट्टी का उपचार बेहद जरूरी है.  गोबर के साथ ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करना चाहिए और प्रारंभिक अवस्था में ही खास ध्यान देना चाहिए. दीमक को खत्म करने के लिए खल्ली का प्रयोग करना चाहिए. किसान हमेशा अधिक लाभ पाने की चाहत में खेत में जरूरत से ज्यादा उर्वरक का उपयोग करते हैं. पोटास का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते हैं, जबकि किसानों को पोटास का इस्तेमाल करना चाहिए. नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटैशियम (एनपीके) का उपयोग करना चाहिए. कीटनाशक दवाइयों के इस्तेमाल को लेकर किसान भाई-बहनों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए. किसानों को कीटनाशक का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के तौर पर करना चाहिए. हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि दो या तीन कीटनाशकों का इस्तेमाल भूल कर एक साथ नहीं करें. बाजार में कीटनाशकों का मिश्रण मिलता है. इसलिए उसे मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. किसान हमेशा उचित मात्रा और उचित समय पर कीटनाशकों का छिड़काव करें. एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसानों को हमेशा कीटनाशक का इस्तेमाल करने से पहले विशेषज्ञों की राय लेनी चाहिए. . किसान अंधाधुंध कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि मात्र एक फीसदी कीटनाशक ही कीटों पर असर करता है, बाकी हवा में उड़ जाता है.

कीट और रोगों में अंतर होता है, किसान भाई-बहनों को इस बात को समझना होगा. आपको जानकार हैरानी होगी कि वर्तमान में पूरे देश में ऐसे पांच सौ प्रजाति के कीट पाये गये हैं, जिन पर कीटनाशकों का असर नहीं होता है. उन कीटों के अंदर कीटनाशक प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गयी है, जो आनेवाले संकट की ओर इशारा कर रहा है. इस समस्या से बचने के लिए किसानों को जागरूक होने की जरूरत है. सरकार और अन्य संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों तक सही खाद और बीज पहुंचे, ताकि किसानों को कीटनाशक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं पड़े.
 
क्षति देख करें कीटनाशक का उपयोग
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के कीट विज्ञान विभाग के कनीय वैज्ञानिक डॉ विनय कुमार बताते हैं कि ज्यादातर किसान जरूरी काम नहीं करते हैं. उन्हें हमेशा क्षति के स्तर को देखते हुए ही कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए. अगर क्षति का स्तर ज्यादा नहीं है, तो किसानों को कीटनाशक का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. जब तक बहुत जरूरी न हो, तब तक कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए. किसानों को कीटनाशक के साथ दिये गये निर्देशों को जरूर पढ़ना चाहिए. इसमें पूरी जानकारी दी जाती है. किसानों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्देशों के तहत जो मात्रा बतायी गयी है, उसके अनुरूप ही कीटनाशक का छिड़काव करें. अधिक मात्रा में छिड़काव करने पर फायदा तो नहीं होता है, लेकिन नुकसान जरूर होता है. इसके साथ बुआई या रोपाई के समय किसानों को पौधे से पौधे के बीच की दूरी पर ध्यान देना चाहिए. ऐसा करने से कीट नियंत्रण करने और कीटनाशक का इस्तेमाल करने में आसानी होती है. इससे हर पौधे की जड़ तक हवा, पानी और रोशनी पहुंचती है. किसानों को जैविक कीटनाशक के इस्तेमाल पर जोर देना चाहिए, क्योंकि यही एकमात्र ऐसा विकल्प है, जिससे हम अपने खेत और मिट्टी को सुरक्षित बचाये रख सकते हैं.