aamukh katha

  • Nov 3 2017 1:45PM

कीटनाशक से करें तौबा

कीटनाशक से करें तौबा
रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं. एक तरफ जहां यह पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर किसानों को खेती-किसानी में इससे काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. अत्यधिक नुकसान होने पर किसान डिप्रेशन में चले जाते हैं और आत्महत्या करने से भी गुरेज नहीं करते हैं. ऐसा नहीं है कि रासायनिक कीटनाशक के प्रयोग से ही खेतों में लगी फसलें रोगमुक्त होंगी, बल्कि जैविक कीटनाशक का प्रयोग करने से भी खेती-किसानी में लगे किसानों को एक साथ दोहरा लाभ मिल सकता है. एक तो खेतों की मिट्टी की उर्वरता का ह्रास नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर फसल भी बर्बाद नहीं होगी. हालांकि, आज भी बाजारों में धड़ल्ले से रासायनिक कीटनाशक दवाएं बेची जा रही हैं. किसान भाई-बहनों में रासायनिक कीटनाशक दवाओं से दूर रहने और जैविक कीटनाशकों के उपयोग को लेकर जागरूकता की जरूरत है. जानकारी होने से कई समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता है. पढ़िए समीर रंजन का यह आलेख.
कीटनाशक कीट की क्षति को रोकने, नष्‍ट करने, दूर भगाने या कम करनेवाला पदार्थ अथवा पदार्थों का एक मिश्रण होता है. उर्वरक पौधे की वृद्धि में मदद करते हैं, जबकि कीटनाशक कीटों से रक्षा के उपाय के रूप में कार्य करते हैं. कीटनाशक रासायनिक या जैविक पदार्थों का ऐसा मिश्रण है, जो कीड़े-मकोड़ों से होनेवाले दुष्प्रभावों को कम करने, उन्हें मारने या उनसे बचाने के लिए किया जाता है. इसका प्रयोग कृषि के क्षेत्र में पेड़-पौधों को बचाने के लिए अधिकाधिक क्षेत्र में किया जाता है. कीटनाशक रासायनिक पदार्थ (फास्फैमिडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरिफोस, हेप्‍टाक्‍लोर, मैलेथियान आदि) अथवा वाइरस, बैक्‍टीरिया, कीट भगानेवाले खरपतवार तथा कीट खानेवाले कीटों, मछली, पंछी तथा स्‍तनधारी जैसे जीव होते हैं. रासायनिक कीटनाशकों ने हमारी मिट्टी, पानी, हवा और पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है. सबसे गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर हुआ है. यही जहरीले रसायन फल, सब्जियां, अनाज, दाल, मसाला, खाद्य तेल, दूध, अंडा, मांस, पानी आदि के साथ-साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर सेहत को तबाह करते हैं. 

एक शोध के मुताबिक, जब कीटनाशक रसायनों का पेड़-पौधों,सब्जियों और फलों पर छिड़काव किया जाता है, तो इन रसायनों की एक फीसदी मात्रा ही सही लक्ष्य तक प्रभावी हो पाती है, शेष 99 फीसदी मात्रा रसायन पर्यावरण को प्रदूषित ही करता है. कीटनाशक के ज्यादा इस्तेमाल से भूमि की उर्वरा शक्ति भी कम होती है, वहीं कीटनाशक जमीन में रिसकर भू-जल को भी जहरीला बनाता है. कीटनाशक नदियों, तालाबों एवं अन्य जलस्रोतों में बह कर वहां के पानी को भी जहरीला बनाता है, जिससे इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और पर्यावरण को भी खासा नुकसान पहुंचता है.
 
समेकित कीट प्रबंधन
रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कई प्रकार की समस्याएं पैदा होती हैं. पर्यावरण का संतुलन तो बिगड़ता ही है, वहीं फसलों के खराब होने की स्थिति में किसानों को काफी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है. ऐसी स्थिति में टिकाऊ खेती के लिए समेकित कीट प्रबंधन की आवश्कता है, ताकि पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी हो. समेकित कीट प्रबंधन एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें तार्किक व्यवहार से पर्यावरण को क्षति पहुंचाये बिना कीड़ों का प्रंबधन कर आर्थिक लाभ को बनाये रखा जा सके.

1. कृषि कार्यगत नियंत्रण
इस पद्धति में किसानों द्वारा किये जानेवाले कृषि कार्य जैसे- खेतों की गहरी जुताई, खरपतवार को नष्ट करना, खेतों में सड़ा हुआ गोबर, कम्पोस्ट एवं करंज की खल्ली का उपयोग करना, अम्लीय मिट्टी में चूने का प्रयोग, समेकित उर्वरक का प्रयोग, स्वस्थ एवं उपचारित बीजों का व्यवहार, उचित सिंचाई का प्रंबध, फसलों की उचित समय पर बुआई एवं कटाई आदि फसलों से कीड़ों की संख्या को कम करने में मदद मिलती है. कीड़ों के व्यवहार, आवास एवं पारिस्थितिकी की पूरी जानकारी होने से कीड़ों की संख्या को घटाने में मदद मिलती है.

2. जैविक नियंत्रण
प्राकृतिक पारिस्थितिक प्रणाली में कीड़ों का नियंत्रण, उनके प्राकृतिक शत्रुओं के द्वारा स्वतः ही होते हैं. विकट परिस्थिति में कीड़ों की संख्या अधिक होने पर परजीवी एवं परभक्षी कीड़ों की संख्या को भी बढ़ाना पड़ता है, ताकि शत्रु कीड़ों की संख्या को कम किया जा सके. इसलिए जैविक नियंत्रण कार्यक्रम में परजीवी एवं परभक्षी कीड़ों के संरक्षण एवं संवर्द्धन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आजकल ट्राइकोग्रामा, क्राइसोपरला, लेडी बर्ड भृंग आदि मित्र कीड़ों को प्रयोगशाला में पाल कर इनकी संख्या को बढ़ाया जाता है. इसका उपयोग शत्रु कीड़ों के नियंत्रण में किया जाता है. इनके उपयोग के फलस्वरूप रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव में कमी होती है, वहीं लागत में भी कमी आती है एवं पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जा सकता है.

समेकित कीट प्रबंधन को सफल बनाने संबंधी मुख्य बातें
  • बीजोपचार करना
  • फसल चक्र अपनाना
  • खरपतवार को नष्ट करना
  • संतुलित मात्रा में खाद का प्रयोग
  • जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करना
  • परजीवी एवं परभक्षी का प्रयोग करना
  • गहरी जुताई कर खेतों को धूप दिखायें
  • फसलों की नियमित देखरेख करते रहना
  • नीम से निर्मित कीटनाशी का प्रयोग करना
  • स्वस्थ बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करना
  • आवश्यकतानुसार कीटनाशी का प्रयोग उचित समय एवं उचित मात्रा में करना
  • कीड़ों से सुरक्षा के लिए घर में बनाये गये कीटनाशक पर जोर देना
  • कीट व रोग नियंत्रण के लिए विभिन्न फसल चक्र अपनाना
 
 
कीट एवं रोग नियंत्रण
वर्तमान में बाजारों में कीटनाशक दवाइयों की भरमार है. हालांकि, कीट व रोग नियंत्रण के रासायनिक तरीके नाकामयाब साबित हो चुके हैं. महंगे कीटनाशकों का खर्च उठाना किसानों के बस की बात नहीं रही. इसके प्रयोग से एक साथ कई समस्याएं पैदा होती हैं. कीटों व रोगों के नियंत्रण का एक मात्र स्थायी समाधान है कि किसान भाई-बहन विभिन्न फसल चक्रों को अपनायें, ताकि प्रकृति पर आधारित कीट व फसलों का आपसी प्राकृतिक सामंजस्य बना रहे और प्रकृति का संतुलन न गड़बड़ाये.
 
कीट व रोग नियंत्रण एवं प्रबंधन
किसान भाई-बहन अगर इन बातों पर विशेष ध्यान दें, तो रासायनिक कीटनाशक के दुष्प्रभाव से काफी हद तक बचा जा सकता है.
 
  • उत्तम गुणवत्तावाले देसी बीजों व कम्पोस्ट खादों का प्रयोग करें
  • भूमि में जैविक तत्वों को बढ़ा कर केंचुए व सूक्ष्म जीवों के अनुकूल वातावरण बनायें
  • कीटों के प्राकृतिक दुश्मनों की रक्षा करें
  • कीट भक्षक जीव जैसे-पक्षी, मेढ़क, सांप तथा मित्र कीटों के बसने की पारिस्थितियां बनायें व प्रकृति में विविधता बने रहने दें
  • भूमि के एक हिस्से में ऐसी फसल उगायें, जो कीट भक्षक प्राणियों को आकर्षित करती है या उसे दूर भगाती हो
  • अपने खेतों में नियमित भ्रमण कर फसलों की देखभाल करते रहें, ताकि समय रहते उपचार किया जा सके