aamukh katha

  • Feb 1 2018 12:00PM

शिक्षा से गरीबी का करें खात्मा

शिक्षा से गरीबी का करें खात्मा

 लाख प्रयास के बावजूद नहीं सुधर रही झारखंड की शिक्षा व्यवस्था

सब पढ़ें, सब बढ़ें. बच्चे पढ़ेंगे, तभी गांव आगे बढ़ेगा. झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर कई अभियान चलाये जा रहे हैं. निजी स्कूलों की तर्ज पर प्री स्कूलिंग सिस्टम की शुरुआत की गयी है, ताकि गांव के छोटे-छोटे बच्चों में स्कूल जाने की आदत बन सके. स्कूलों में जीरो ड्रॉपआउट पर जोर दिया जा रहा है. हाल में जारी हुई प्राथमिक स्कूलों की एनुअल स्टेटस एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में अधिक संख्या में छात्र स्‍कूल जा रहे हैं. छात्रों में पढ़ने की क्षमता भी बेहतर हुई है. सबसे बेहतर स्थिति तीसरी कक्षा के बच्चों में देखी गयी है. वर्ष 2014 में तीसरी कक्षा के 40.2 फीसदी बच्चे पहली कक्षा की किताब पढ़ पाते थे, जबकि 2016 में उनकी संख्या बढ़ कर 42.5 फीसदी हो गयी है. राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 26,665 प्राथमिक विद्यालय हैं, जहां करीब 30,64,194 छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं. इन्हें पढ़ाने के लिए 34,482 शिक्षक हैं. इनमें भी पारा शिक्षकों की संख्या अधिक है. छात्र-शिक्षक अनुपात को देखें, तो 89 छात्रों पर मात्र एक शिक्षक हैं. दूसरी ओर माध्यमिक तथा प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता में भी जमीन-आसमान का अंतर है. ग्रामीण इलाकों में 400 छात्रों पर एक शिक्षक हैं. शिक्षकों की भारी कमी का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है. आमुख कथा का यह अंक गांवों की शिक्षा व्यवस्था पर फोकस है. इसके जरिये गांवों के स्कूलों की हकीकत बयां करने की कोशिश की गयी है. पढ़िए समीर रंजन की रिपोर्ट.

शिक्षा की बुनियाद प्राथमिक स्कूलों में तैयार होती है. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में 26,665 प्राथमिक विद्यालय हैं, जहां करीब 30,64,194 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं. इन्हें पढ़ाने के लिए 34,482 शिक्षक हैं. इनमें पारा शिक्षकों की संख्या अधिक है. छात्र-शिक्षक अनुपात को देखें, तो 89 छात्रों पर मात्र एक शिक्षक हैं. माध्यमिक तथा प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता में भी जमीन-आसमान का अंतर है. ग्रामीण इलाकों में 400 छात्रों पर एक शिक्षक हैं. शिक्षकों की भारी कमी का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है. गांवों में नये-नये विद्यालय भवन तो बना दिये गये हैं, लेकिन छात्रों के लिए बुनियादी और आवश्यक शर्त शिक्षक ही नहीं हैं. आधे से भी अधिक ग्रामीण स्कूलों का हाल यह है कि एक ही शिक्षक सभी पांच कक्षाओं के छात्रों को पढ़ा रहे हैं. शिक्षकों के अभाव में छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है. इसका असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है. शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि प्राथमिक शिक्षा की खराब स्थिति की वजह से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है. बावजूद इसके राज्य की साक्षरता दर में कुछ बढ़ोतरी है. वर्ष 2001 और 2011 की जनगणना से तुलना करें, तो वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, राज्य में साक्षरता दर करीब 54 फीसदी थी, वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता दर करीब 68 फीसदी है यानी 10 साल में 14 फीसदी का इजाफा. पुरुष साक्षरता दर 78.45 प्रतिशत जबकि महिला साक्षरता दर 56.21 प्रतिशत है. 

प्री स्कूलिंग सिस्टम की शुरुआत 

निजी स्कूलों की तर्ज पर राज्य सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में केजी की पढ़ाई शुरू करने के उद्देश्य से प्री स्कूलिंग सिस्टम की शुरुआत की है. इसमें तीन से पांच साल के बच्चों का नामांकन किया जा रहा है. इसका असर दिखने लगा है. रांची जिले में पांच हजार से अधिक बच्चों का नामांकन प्री स्कूल में हुआ है. बच्चों को पढ़ाई बोझ न लगे, बल्कि उसमें रुचि जगे, इसके लिए केजी के क्लास रूम को काफी आकर्षक बनाया गया है. दीवारों पर जीव-जंतुओं के रंगीन चित्र बनाये गये हैं, ताकि बच्चों को क्लास रूम में अपनापन लग सके.

प्राथमिक विद्यालय शिक्षा की पहली सीढ़ी है

राज्य के 28,010 प्राथमिक विद्यालयों में 32,47,574 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. इन्हें पढ़ाने के लिए 48,660 शिक्षक हैं, जिसमें पारा शिक्षकों की संख्या 30 हजार से भी अधिक है. मात्र 18 हजार स्थायी शिक्षकों के भरोसे राज्य की प्राथमिक शिक्षा हिचकोले खा रही है. शिक्षक-छात्र का अनुपात देखें, तो 67 बच्चों पर एक शिक्षक हैं, जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के मुताबिक यह संख्या 40 छात्रों पर एक शिक्षक होनी चाहिए. पड़ोसी राज्य बिहार में यह अनुपात औसत 63 बच्चों पर एक शिक्षक का है. 

शहर की अपेक्षा गांवों में अधिक प्राथमिक स्कूल

राज्य के शहरी इलाकों में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों की तुलना में काफी कम है. शहरी क्षेत्र में मात्र 1343 प्राथमिक विद्यालय हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 26,665 है. गांव के ज्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं और शहरी क्षेत्र के बच्चे निजी स्कूलों में. ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों की बात करें तो 30,64,194 छात्र प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ते हैं, तो शहरी इलाके में एक लाख 83 हजार 380 छात्र पढ़ते हैं. शहरी इलाकों में छात्र-शिक्षक का औसत अनुपात 86 छात्रों पर एक शिक्षक है. यह आंकड़ा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के औसत अनुपात के दोगुना से छह अधिक है. शहरी क्षेत्रों में कम प्राथमिक विद्यालय होने का मुख्य कारण बड़ी संख्या में निजी विद्यालयों का होना है.

कल्याण विद्यालय

राज्य में कक्षा छह के बाद विद्यार्थियों के ड्रॉपआउट की समस्या हमेशा बनी रहती है. इसी समस्या के निदान के लिए कल्याण विद्यालयों को कक्षा दस तक उत्क्रमित करने की तैयारी की जा रही है. इस विद्यालय में वर्ग एक से छह तक बच्चों को पढ़ाया जाता है. छठी कक्षा पास करने के बाद विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए दूसरे स्कूलों में जाना पड़ता है, लेकिन किसी न किसी कारण से कई बच्चे छठी के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पाते और उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है. बच्चों की पढ़ाई आगे भी जारी रहे, इसे ध्यान में रख कर कल्याण विद्यालयों को कक्षा दस तक बढ़ाया जा रहा है.