aamukh katha

  • Mar 15 2018 5:48PM

ऐसे खत्म हो सकता है मानव तस्करी के काले धंधे का खेल

ऐसे खत्म हो सकता है मानव तस्करी के काले धंधे का खेल

 गुरुस्वरुप मिश्रा


झारखंड में 90 फीसदी ह्यूमन ट्रैफिकिंग की शिकार हमारी आदिवासी बेटियां हो रही हैं. इनकी सादगी, भोलापन, गरीबी और अशिक्षा का बेजा फायदा उठाकर मानव तस्कर महानगरों में इनकी मासूमियत की खुलेआम बोली लगाकर मालामाल हो रहे हैं और ये नरक की जिंदगी जीने को विवश हैं. इसके बावजूद मानव तस्करी का काला धंधा आज भी बेरोक-टोक जारी है. कुछ एहतियात बरते जाएं, तो हमारी आदिवासी बहन-बेटियां दिल्ली जैसे महानगरों के बाजारों में बिकने से बच सकेंगी और मानव तस्करी के काले धंधे का खेल खत्म हो सकता है.

बेरहम दिल्ली में आदिवासी बेटियों की सौदेबाजी का दर्द
ह्यूमन ट्रैफिकिंग यानी मानव तस्करी. पशुओं की तरह इंसानों की खरीद-फरोख्त. दिल्ली जैसे महानगरों में काम दिलाने की आड़ में सौदेबाजी करने वाली अनगिनत प्लेसमेंट एजेंसियों की मंडी सजी हुई है, जहां कानून को धत्ता बता इंसान खुलेआम बिकते हैं. खासकर नाबालिग लड़कियां. यह सुनकर थोड़ा अटपटा लगेगा, लेकिन कारोबारी दुनिया का एक स्याह सच यह भी है कि खूबसूरत झारखंड की सैकड़ों भोली-भाली मासूम आदिवासी बेटियां इस बाजार में नीलाम हो चुकी हैं. मानव तस्करों की मकड़जाल इतनी मजबूत है कि दिल्ली में बेटियों की खुलेआम लग रही बोली तक नहीं गूंज पाती. कुछ बेटियां खुशनसीब निकलीं, जिन्हें रेस्क्यू कर वापस लाया जा सका और वह आज खुली हवा में सांस लेकर अपने परिवार के साथ हैं, लेकिन मानव तस्करों के चंगुल में फंसी सैंकड़ों बेटियां आज भी लापता हैं. जिनका कोई सुराग नहीं. आज भी शासन-प्रशासन के सामने उन्हें मानव तस्करी के दलदल से सकुशल वापस लाने की चुनौती बरकरार है. संदेश है कि बाहरी चमक-दमक से किसी के बहकावे में न आएं. आस-पास ही बेहतर काम की तलाश करें.

पैसे की खनक के आगे अपने भी बन गये पराये
पैसा बोलता है. इसकी खनक इस कदर तेज है कि अपनों ने भी तमाम रिश्ते-नातों को दांव पर लगाकर इनके बचपन का सौदा तक कर दिया. अब भला किस पर ऐतबार किया जाये. खूंटी की रीना, साहेबगंज की काजल, मांडर की सीता, गुमला की रानी को सगे लोगों ने छोटी-सी उम्र में पशुओं की जिंदगी जीने के लिए दिल्ली के बाजार में बेच दिया. सबक है किसी पर हद से ज्यादा यकीन नहीं करें. बाहर जाने की सूचना अपनों को जरूर दें. छुपाएं नहीं.

काम दिलाने व शादी की आड़ में होती है तस्करी
मानव तस्कर आदिवासी बहुल इलाके में काम दिलाने का प्रलोभन देकर नाबालिग लड़कियों को फांसते हैं, तो गैर आदिवासी इलाके में गरीब बेटियों से शादी कर उन्हें इस दलदल में धकेल देते हैं. सबक है कि शादी और काम पर बाहर जाने को लेकर सूझबूझ से काम लें.

पंचायत सचिव से कराएं रजिस्ट्रेशन, प्लेसमेंट एजेंसियों पर कड़ी नजर
मानव तस्करी पर रोक के लिए वर्ष 2012 में पंचायत सचिव को गांव से बाहर कमाने जानेवालों का रजिस्ट्रेशन करने का निर्देश दिया गया था. इसके तहत मजदूरों के लिए लाल कार्ड जबकि ठेकेदारों के लिए सफेद कार्ड जारी किया जाना था. इसमें इनकी पूरी जानकारी रहती. कुशल व अर्द्धकुशल श्रमिकों के बीमा की भी व्यवस्था थी. आली की राज्य समन्वयक रेशमा सिंह बताती हैं कि अगर उस वक्त यह जमीनी स्तर पर लागू हो जाता, तो कई बेटियां अपने घर के आंगन की शोभा बढ़ा रही होतीं. वह कहती हैं कि महानगरों की प्लेसमेंट एजेंसियों पर भी कड़ी नजर रखनी होगी. सबक है कि ग्राम सभा को सूचना दिए बिना काम के लिए बाहर जाने से परहेज करें.

अपने पास रखें मुसीबत में काम आनेवाले मोबाइल नंबर
दिल्ली जैसे महानगरों में घरेलू काम, पंजाब-हरियाणा में खेती-बारी, पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा में ईंट भट्ठा पर काम के लिए और बड़े शहरों एवं मलेशिया व अफ्रीका में कंस्ट्रक्शन के कार्य के लिए तस्करी की जाती है. इस क्रम में इन्हें यौन शोषण व मानसिक प्रताड़ना का भी शिकार होना पड़ता है. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम, गुमला, खूंटी, साहेबगंज, सिमडेगा, गोड्डा, रांची, धनबाद, लातेहार, लोहरदगा समेत अन्य जिलों से बड़ी संख्या में तस्करी होती है. सबक है कि मुसीबत में काम आनेवाले जरूरी मोबाइल नंबर जरूर अपने पास रखें.

पुनर्वास की नहीं है उचित व्यवस्था
रेस्क्यू कर लायी गयी नाबालिग व बालिग लड़कियों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था नहीं है. मजबूरन वह दोबारा इस काले धंधे के दलदल में उतर जाती हैं. रेस्क्यू के बाद उनकी प्रोपर मॉनिटरिंग भी नहीं हो पाती. एटसेक के राज्य प्रमुख संजय कुमार मिश्रा कहते हैं कि पुनर्वास की अच्छी व्यवस्था के साथ-साथ पीड़िताओं की नियमित निगरानी रखने की जरूरत है. झारखंड विक्टिम कंपनसेशन स्कीम के प्रति जागरूकता भी इनके लिए वरदान है. सुरक्षित पलायन की पुख्ता व्यवस्था पर जोर दिया जाना चाहिए. सबक है कि पीड़िताओं के पुनर्वास की अच्छी व्यवस्था करनी होगी.

तस्करों की कमर तोड़ने के लिए कड़ी सजा जरूरी
मानव तस्करी की काली दुनिया में पन्ना लाल, बाबा बामदेव, रोहित मुनी, प्रभा मुनि, सुरेश साहू, गायत्री साहू, पवन साहू व लता लकड़ा कुख्यात हैं. इन जैसे बड़े तस्करों पर कानून की सख्ती जरूरी है. दीया सेवा संस्था की सचिव सीता स्वांसी कहती हैं कि तस्करों की कमर तोड़ने के लिए कड़ी सजा पर जोर देना होगा, तभी इनका मनोबल गिरेगा. सबक है कि अदालत में कड़ी सजा को लेकर अभियोजन सीरियस रहे. कोई कोताही नहीं बरते.

 

लापता बच्चों के मामले को पुलिस गंभीरता से नहीं लेती
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लापता बच्चों के मामले को गंभीरता से नहीं लिया जाता. पुलिस अधिकारियों की घोर लापरवाही कई मासूमों की जिंदगी तबाह कर चुकी है. शिकायत के बाद भी पुलिस काफी मशक्कत के बाद सिर्फ सनहा दर्ज कर खानापूर्ति कर देती है. एफआइआर दर्ज नहीं की जाती. इस कारण पुलिस उनकी खोजबीन को लेकर गंभीरता नहीं दिखाती. हकीकत यह है कि राज्यभर से सैंकड़ों बच्चे-बच्चियां गुम हैं. घरवाले थाना के चक्कर लगा-लगाकर थक चुके हैं. उनकी आंखें इंतजार में पथरा गयी हैं, लेकिन अबतक उनका कोई सुराग नहीं है. वक्त रहते अगर पुलिस सक्रिय हो जाती, तो कई मासूमों का बचपन सुरक्षित हो जाता. सबक है कि पुलिस मासूमों की गुमशुदगी के मामले को पूरी गंभीरता से ले.

एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की सक्रियता बढ़े
मानव तस्करी पर नकेल कसने के लिए वर्ष 2011 में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) का गठन किया गया था. इसके तहत राज्य के आठ जिले गुमला नगर थाना, सिमडेगा नगर थाना, खूंटी नगर थाना, दुमका नगर थाना, रांची कोतवाली थाना, पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा सदर थाना, लोहरदगा सदर थाना व पलामू सदर थाने में एएचटीयू का गठन हुआ था. इसके गठित होने के बाद भी मानव तस्करी का धंधा फल-फूल रहा है. सबक है कि एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की सक्रियता इस कदर बढ़े कि तस्करों में खौफ हो.

बाल समूह, महिला समूह, सखी मंडल बनाये जायें
समाज की संवेदनहीनता खत्म करने के लिए खामोशी तोड़नी होगी. इसके लिए बच्चों के बीच बाल समूह, महिलाओं के लिए महिला स्वयं सहायता समूह व सखी मंडल अधिक से अधिक बनाये जायें, ताकि इनकी सामाजिक मजबूती बढ़े. ये आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें. हर छोटी-बड़ी बातें सबको पता चल सके. सबक है कि समूह के जरिए संवादहीनता खत्म होगी. सामाजिक एकता बढ़ेगी. इससे मुसीबत के वक्त पूरा गांव साथ होगा.

कौशल विकास कर हुनरमंद बनाएं
गांवों में काफी बेरोजगारी है. गरीबी है. अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं है. अवसर सीमित हैं. ऐसे में परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए काम तो चाहिए. मजबूरन अच्छे काम के झांसे में आकर वे मानव तस्कर के चंगुल में फंस जाते हैं. सरकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने की व्यवस्था सुनिश्चित कर ग्रामीणों का कौशल विकास किया जाये. हुनरमंद बनने के बाद बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. सबक है कि सरकार कौशल विकास को लेकर सुदूर ग्रामीण इलाके में व्यापक अभियान चलाये. अधिक से अधिक लोगों को हुनरमंद बनाये. सरकार की संवेदनशीलता, ग्रामीणों की जागरूकता, शासन-प्रशासन की गंभीरता व स्वयं सेवी संस्थाओं की सहभागिता यानी सामूहिक प्रयास से इस पर रोक संभव है