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  • Aug 17 2018 11:21AM

आजादी आैर आदिवासी

आजादी आैर आदिवासी

अनुज कुमार सिन्हा 

15 अगस्त. आजादी का जश्न. उस आजादी का, जिसे पाने के लिए लाखाें लाेगाें ने अपनी कुर्बानी दी. इसमें हर जाति, हर धर्म के लाेग थे. मकसद एक ही था- देश से किसी भी कीमत पर अंगरेजाें काे खदेड़ देना. आजाद हाेना. अंगरेजाें ने हालांकि लंबा राज किया, लेकिन उनका विराेध हाेने में बहुत विलंब नहीं हुआ था. खासताैर पर आदिवासी इलाकाें में. इनमें एक क्षेत्र था झारखंड. तब बिहार का हिस्सा हुआ करता था. इसका कारण था अधिकांश जमीन आदिवासियाें के कब्जे में थी, जिसे उन्हाेंने जंगल साफ कर बनाया था. जमीन पर आदिवासी अपना हक समझते थे.

अंगरेजाें ने कानून बना कर उनसे लगान वसूलने का फैसला किया. वहीं से विराेध आरंभ हुआ. अंगरेजाें के जुल्म के खिलाफ सबसे पहले अगर किसी ने आवाज उठायी थी, ताे वे आदिवासी ही थे. वे किसी भी कीमत पर अंगरेजाें की अधीनता स्वीकार करने के मूड में नहीं थे. बाबा तिलका मांझी को याद कीजिए. उन्हाेंने संताल परगना आैर भागलपुर के क्षेत्र में 18वीं शताब्दी के अंत में अंगरेजाें के खिलाफ बिगूल फूंका था. एक बड़ा वर्ग मानता है कि आजादी की लड़ाई ताे वहीं से आरंभ हाे गयी थी. अंगरेज पुलिस अधिकारी काे माैत के घाट उतार कर सबसे पहले बाबा तिलका मांझी ने यह संदेश दे दिया था कि अंगरेजाें का जुल्म बरदाश्त नहीं करेंगे.

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बाद में मुंडा विद्राेह, काेल विद्राेह, संताल विद्राेह, हाे विद्राेह, टाना भगत आंदाेलन समेत अनेक विद्राेह हुए. बड़ा प्रभावी आंदाेलन हुआ बिरसा मुंडा का उलगुलान. हालांकि, सिदाे-कान्हू के संताल विद्राेह का क्षेत्र बड़ा व्यापक था आैर इस आंदाेलन ने अंगरेजाें काे काफी परेशान किया था. लेकिन, बिरसा मुंडा का उलगुलान निर्णायक साबित हुआ. तमाड़-बंदगांव-खूंटी क्षेत्र में बिरसा समर्थकाें ने अंगरेजाें के खिलाफ जाे माेरचा खाेला था, जाे आक्रमण किये थे, उसने अंगरेज शासन काे बैकफुट पर आने काे मजबूर कर दिया. इस लड़ाई में कितने आदिवासी शहीद हुए, इसका सही आंकड़ा आज तक नहीं मिल पाया.

अंगरेजाें ने पारंपरिक हथियार उठाये. आदिवासियाें काे मार कर उनके शवाें काे गायब कर दिया था. एक-दाे उदाहरण ताे ऐसे हैं जिनमें बिरसा समर्थक काे जिंदा दफन कर दिया गया था. यह इन्हीं आदिवासियाें के संघर्ष का फल था कि अंगरेजाें ने कानून में बदलाव किये. आदिवासियाें के पक्ष में जमीन के कानून बनाये आैर यह स्वीकार किया कि आदिवासियाें के साथ कई मामलाें में न्याय नहीं हुआ है. यह कहना बिल्कुल सही हाेगा कि देश की आजादी में आदिवासियाें के संघर्ष खास कर झारखंड क्षेत्र में हुए संघर्ष का बहुमूल्य याेगदान रहा है.

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इसने अंगरेजाें काे पहली बार बैकफुट पर भेजा. 1942 के भारत छाेड़ाे आंदाेलन में भी झारखंड में सैकड़ाें आदिवासियाें काे जान देनी पड़ी. 1947 में जब देश आजाद हुआ, ताे हर भारतीय नागरिक की अपेक्षाएं बढ़ीं. अपना देश, अपना राज का सपना था. आदिवासियाें का मानना था कि जाे अन्याय उनके साथ अंगरेजाें के शासन में हुआ है, वह अन्याय आजादी के बाद नहीं हाेगा. न्याय मिलेगा. उनके मुद्दाें पर चर्चा हाेगी आैर उसका निदान हाेगा. इसमें बहुत काम हाेना बाकी है.

आदिवासी अब यही चाहते हैं कि देश की आजादी में उनके पूर्वजाें ने बड़ी कुर्बानी दी है आैर जब देश आजाद हाे गया है, ताे आदिवासियाें काे भी अपने मुद्दाें काे सुलझाने की आजादी चाहिए. उनके हालात बदलने चाहिए. हालांकि, सरकार ने आदिवासियाें के विकास के लिए याेजनाएं चलाने में काेई कसर नहीं छाेड़ी है, लेकिन इसका लाभ आम आदिवासी तक पहुंचाने की बड़ी चुनाैती रही है. जंगल या सुदूर गांवाें में रहनेवाले सामान्य आदिवासियाें की आवश्यकता बहुत अधिक नहीं हाेती. वे सिर्फ अपना जीवन आजादी से, अपने तरीके से, अपनी संस्कृति के साथ, अपनी माटी पर आैर प्रकृति के बीच जीना चाहते हैं. इसमें वे छेड़छाड़ नहीं चाहते. तरक्की वे भी चाहते हैं, लेकिन अपनी बर्बादी की कीमत पर नहीं. वक्त आ गया है जब समाज के सबसे पिछड़े तबकाें, गरीब आदिवासियाें काे उनका वाजिब हक मिले, ताकि उनके अंदर फिर से काेई असंताेष नहीं फैले. वे भी आगे बढ़ें. समाज के हर वर्ग की तरक्की हुए बगैर न ताे राज्य अागे बढ़ सकता है आैर न ही देश