aapne baat

  • Feb 1 2018 11:50AM

शिक्षा में बड़े सुधार व कड़ी कार्रवाई का वक्त

शिक्षा में बड़े सुधार व कड़ी कार्रवाई का वक्त


इस बात से काेई इनकार नहीं कर सकता कि बगैर शिक्षा के राज्य-देश आैर समाज का भला नहीं हाे सकता. इसी ब्रह्म वाक्य काे आधार मान कर सरकार भी याेजना चला रही है आैर हर साल शिक्षा के लिए कराेड़ाें-कराेड़ रूपये खर्च करती है. आंकड़ाें काे देखेंगे ताे संतुष्टि मिल जायेगी, क्याेंकि स्कूलाें की संख्या बढ़ी है, शिक्षकाें की संख्या बढ़ी है आैर साक्षरता दर भी अब ठीक-ठाक दिखाई देती है. जमीनी हकीकत कुछ आैर है. प्राथमिक स्कूल हाे या हाइस्कूल, हालात एक ही हैं. उच्च शिक्षा की स्थिति ताे आैर भी चिंतनीय है. सरकार ने स्कूल ताे खाेल दिया, विशेष अभियान चलाया लेकिन अधिकांश स्कूल पारा टीचर्स के बल पर चल रहे हैं.

शिक्षकाें की कमी है. जहां स्थायी शिक्षक हैं, वहां भी समय पर नहीं आते. आते भी हैं ताे पढ़ाई की गुणवत्ता नहीं हाेती. सिर्फ शिक्षकाें की बहाली करने से, स्कूल भवन बनाने से कुछ नहीं हाेनेवाला. हाइस्कूल में एक-एक शिक्षक काे 30-40 हजार रुपये (इससे अधिक भी) वेतन मिलते हैं लेकिन रिजल्ट का हाल देखिए. किसी तरह ये बच्चे मैट्रिक पास कर लेते हैं. आगे की पढ़ाई में इन बच्चाें काे अंग्रेजी मिडियम से पढ़ कर आये बच्चाें से सामना हाेता है आैर ये बच्चे पिछड़ जाते हैं. ग्रामीण इलाकाें या सरकारी स्कूल में पढ़ाने पर सरकार का अच्छा-खासा खर्च हाेता है, लेकिन बेहतर परिणाम नहीं आते.
आज से 30-40 साल पहले सरकारी स्कूल ताे ही थे. बच्चाें में पढ़ने का जुनून था आैर शिक्षकाें में पढ़ाने का जुनून. अब दाेनाें आेर से कमी है. कई ऐेसे विषय हैं, जिसमें शिक्षक ही नहीं हैं.

कई ऐसे स्कूल हैं जहां गणित के शिक्षक नहीं हैं. ऐसे बच्चाें का क्या दाेष? हद ताे तब हाे जाती है जब पता चलता है कि बच्चाें काे किताब बांटी नहीं गयी आैर उसे अगले माह फाइनल परीक्षा में बैठना है. यह सिस्टम में दाेष है. जिसकी गलती से बच्चाें काे किताब नहीं मिली, उस अफसर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हाेनी चाहिए. लेकिन कार्रवाई हाेती नहीं. सबसे खराब हालत ताे दूर-दराज के इलाकाें की है. वहां शिक्षक कभी-कभार जाते हैं. बच्चे आते हैं, खेलते हैं आैर चले जाते हैं. अफसर उन इलाकाें में जांच करने जाते ही नहीं हैं. इस हालात के लिए सिर्फ शिक्षक काे ही दाेष देना गलत हाेगा.

शिक्षकाें का काम ही बदल गया है. कभी उन्हें आदमी ताे कभी गाय-बैल गिनने में लगा दिया जाता है. मिड डे मिल के झंझट से प्रधानाध्यापक परेशान. अब समय आ गया है जब ऐसे मामलाें पर गंभीरता से विचार किया जाये. शिक्षक पैसा लेते हैं, सरकार का पैसा खर्च हाेता है, ताे इसका लाभ छात्राें काे मिलना चाहिए. तकनीक का जमाना है. शिक्षक स्कूल जायें आैर अॉनलाइन हाजिरी बनायें, ताकि पता चल सके कि वे स्कूल में हैं. जिम्मेवारी तय हाेनी चाहिए.