aapne baat

  • Feb 16 2018 12:33PM

शुद्ध पानी : बड़ी चुनाैती

शुद्ध पानी : बड़ी चुनाैती


झारखंड में पानी, वह भी शुद्ध पानी (पीने के लिए). अधिकांश लाेगाें के नसीब में नहीं. यह सरकार आैर जनता दाेनों के लिए बड़ी चुनाैती है. गरमी आयी नहीं कि पानी का संकट शुरू हाे जाता है. चाहे वह शहर का इलाका हाे या गांव का, गरमी में पानी का संकट दाेनाें जगह. अगर शुद्ध पानी (पीने याेग्य) की बात करें, ताे राज्य के बड़े तबके काे नहीं मिलता. नतीजा भुगतती है जनता. ग्रामीण क्षेत्राें में हाेनेवाली अधिकांश माैताें का बड़ा कारण प्रदूषित पानी ही है. यह बात सही है कि सरकार अब पाइप से गांवाें में पानी पहुंचाने में लगी है. सरकार का दावा मानें ताे लगभग 32 फीसदी गांवाें में पाइप से जलापूर्ति की जा रही है. यानी 68 फीसदी लाेगाें काे पीने के पानी के लिए चापाकल, तालाब, नदी, कुआं, चुआं, झरना आदि पर निर्भर रहना पड़ता है.

चापाकल का पानी शुद्ध ही हाे, इसकी गारंटी नहीं है. झारखंड के कई जिलाें में भूमिगत जल (ग्राउंड वाटर) में गड़बड़ी है. कहीं आर्सेनिक ज्यादा है, ताे कहीं फ्लाेराइड. साहिबगंज के कई इलाकाें में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गयी है. पलामू, गढ़वा, प्रतापपुर (चतरा), पाकुड़, चास, भंडरिया जैसे इलाकाें में फ्लाेराइड की मात्रा काफी है. ये सभी हेल्थ के लिए खतरनाक हैं. आर्सेनिक की मात्रा अधिक हाेने से जानलेवा बीमारियां हाे रही हैं. हालात यह है कि गढ़वा के पास के इलाकाें में कुछ गांव ऐसे हैं, जहां दूषित पानी (फ्लाेराइड युक्त) पीने से किसी का हाथ टेढ़ा हाे गया है, ताे किसी का पैर. ये विकलांग हाे रहे हैं. हालांकि इन क्षेत्राें की इस सबसे बड़ी समस्या की आेर सरकार का ध्यान पहले से है. यही कारण है कि गढ़वा-आसपास के इलाकाें में चापाकल में फ्लाेराइड से बचाव के लिए विशेष यंत्र लगाये गये हैं. पूरे राज्य में इसके लिए 25 कराेड़ रुपये खर्च करने की याेजना है. ये क्षेत्र ताे चिह्नित क्षेत्र हैं जहां पता है कि पानी में क्या गड़बड़ी है आैर किस तत्व की क्या मात्रा है. लेकिन हजाराें गांवाें में यह पता ही नहीं है कि वे जाे पानी पी रहे हैं, वह शुद्ध है या नहीं. वे खतरे से अनजान हैं. इसलिए इसका एकमात्र इलाज है पाइप से पानी की आपूर्ति करना. लेकिन इसमें भी सतर्कता बरतना.

अभी अनेक पंंचायताें में बाेरिंग कर टंकी में पानी जमा कर जलापूर्ति की जा रही है. भूमिगत जल अगर अशुद्ध है, प्रदूषित है (फ्लाेराइड, आयरन, आर्सेनिक या अन्य तत्व ज्यादा हैं) ताे इसे पहले ठीक करना हाेगा, वरना पाइप से जलापूर्ति करने के बावजूद असली समस्या का निदान नहीं हाेगा. दरअसल अधिकांश लाेगाें काे यह पता ही नहीं चलता कि वे जाे पानी पी रहे हैं, वह शुद्ध है या नहीं. यह बात शहरी आैर ग्रामीण दाेनाें इलाकाें के लिए लागू हाेती है. इसलिए पहले लाेगाें काे जागरूक हाेना हाेगा. पानी की जांच कराने की मानसिकता बनानी हाेगी. यह जिम्मेवारी सरकार की भी है कि वह लगातार पानी की जांच कराये आैर उसी के अनुसार याेजना बनाये. यह देखे कि पानी की जांच कराने के लिए पर्याप्त संख्या में लैब हाे, जाे लैब हैं, वे ठीक से काम करें. साथ ही जांच दर आम आदमी की पहुंच में हाे. अभी ऐसा नहीं है. पानी की जांच कराना आम आदमी के लिए महंगा है.
सरकार इस बात काे समझे कि शुद्ध पानी के लिए किया जा रहा खर्च बेकार नहीं जायेगा. इससे कई छाेटी-बड़ी बीमारियाें से बचाव हाेगा. इलाज पर खर्च हाेनेवाला पैसा बचने से आम आदमी का जीवनस्तर सुधरेगा. सरकार इस पर बड़ी राशि खर्च करने का प्रावधान रखे आैर अगर पाइप से ही जलापूर्ति करनी है, ताे उसकी रफ्तार तेज हाे. निर्धारित समय के भीतर तेजी से लाेगाें को शुद्ध पानी दे कर बड़ी आफत से बचा जा सकता है.