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  • Jul 17 2019 1:41PM

तीन साल का सफर

तीन साल का सफर

अनुज कुमार सिन्हा 

पंचायतनामा ने तीन साल का सफर पूरा कर लिया है. इस यात्रा में साथ देने के लिए पाठकाें का आभार-धन्यवाद. दरअसल पंचायतनामा निकालने का एक मकसद रहा है. पत्रकारिता के बदलते दाैर में शहर की खबराें का दबाव रहा है. अखबाराें में वैसी ही खबराें की भरमार रहती है, जाे शहरी पाठकाें की पसंद है. बाजारवाद का दाैर है आैर वह अखबाराें में झलकता भी है. ऐसे चाहे-अनचाहे दबाव में गांव की खबरें दब जाती थी. शहर के अखबार में ग्रामीण भारत-ग्रामीण झारखंड लगभग गायब हाे जाता था. अखबाराें की यह भारी कमी है.

पंचायतनामा के माध्यम से इस कमी काे पाटने का प्रयास किया गया. उस कमी काे दूर करने का प्रयास किया गया. आज भी देश की बड़ी आबादी गांवाें में रहती है. झारखंड में भी यही स्थिति है. भले ही गांव अब विकसित हाे रहे हैं आैर सरकार का पूरा फाेकस गांव की आेर है, लेकिन इस बात काे नहीं भूलना चाहिए कि गांवाें की आवश्यकता बिल्कुल अलग है. गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाली बड़ी आबादी गांवाें में ही रहती है. अधिकांश कृषि पर निर्भर रहते हैं. अधिकांश सरकारी याेजनाएं ग्रामीण क्षेत्राेें से जुड़ी हुई हैं. इसलिए पंचायतनामा ने तय किया था कि ग्रामीण इलाके की वैसी खबराें काे प्रमुखता दी जाये, जाे उनके जीवन काे बदलने में सहायक साबित हाे, उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर करने में सहायक हाे. गांवाें में जाे बदलाव हाे रहे हैं, उसकी जानकारी अधिक से अधिक लाेगाें तक पहुंच सके, ताकि एक-दूसरे काे देख कर प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सकें.

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पंचायतनामा ने इन तीन सालाें में सरकारी याेजनाआें की लाेगाें काे जानकारी दी. कैसे वे बेहतर खेती करें, ताकि उपज बढ़े. न सिर्फ लिखा, बल्कि ग्रामीण महिलाआें काे सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. प्रभात खबर आभारी है जेएसएलपीएस का, जिन्हाेंने कंधा से कंधा मिला कर पंचायतनामा के इस अभियान में साथ दिया. अनेकाें ऐसी दीदियाें काे पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया, जाे दूर-दराज के गांवाें में रहती हैं. हर अंक में गांवाें की दीदियाें द्वारा भेजी गयी स्टाेरी-रिपाेर्ट छपती है आैर अब ये दीदियां अपने क्षेत्र की आवाज बन चुकी हैं. यह बड़ी सफलता है.

आज स्थिति यह है कि दूर-दराज के गांवाें में रहनेवाली महिलाएं कैमरे का प्रयाेग कर, माेबाइल का प्रयाेग कर जन समस्या की तसवीर लेती है आैर उसे अखबाराें तक पहुंचाती है. उनमें गजब का आत्मविश्वास जागा है. यह पंचायतनामा की सबसे बड़ी उपलब्धि है. यह ठीक है कि गांवाें तक पंचायतनामा पहुंचाना आसान नहीं था. लाेगाें की मांग रहती है, उसके बावजूद राज्य के हर हिस्से में पंचायतनामा हम नहीं पहुंचा पा रहे थे. अब नयी व्यवस्था है आैर हर जगह पंचायतनामा जा रहा है.

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तीन सालाें में पंचायतनामा ने कृषि, पर्यटन, स्वच्छता से लेकर प्रधानमंत्री आवास याेजना पर भी विशेष अंक निकाला. ये सारे अंक संग्रहणीय हैं. ग्रामीण इलाकाें काे फाेकस कर निकाला गया पंचायतनामा न सिर्फ गांवाें के पाठकाें के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि शहरी पाठकाें में भी उतना ही लाेकप्रिय है. खास कर प्रतियाेगी परीक्षाआें की तैयारी कर रहे छात्र-छात्राआें आैर सरकारी अधिकारियाें के लिए. दरअसल पंचायतनामा निकालने का एक बड़ा उद्देश्य यह रहा है कि इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्राें में रहनेवालाें काे विकास से जुड़ी अधिक से अधिक जानकारी मिल सके. उनकी समस्याएं भी सामने आ सकें आैर उन्हें उचित जगह मिल सके, उनका समाधान हाे सके. पंचायतनामा इसमें आप सभी के सहयाेग से सफल रहा है. आगे भी पंचायतनामा आप सभी के सहयाेग से अपने अभियान को आगे बढ़ाता रहेगा

पुन: आप सभी का आभार.