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  • Dec 17 2018 4:47PM

हड़ताल का असर

हड़ताल का असर

अनुज कुमार सिन्हा

झारखंड में पारा टीचर्स हड़ताल पर हैं. लंबा समय बीत गया है, काेई समाधान नहीं निकला है. हड़ताली शिक्षक अपनी मांगाें पर अड़े हुए हैं, जबकि सरकार ने साफ कर दिया है कि शिक्षकाें की मांगाें काे पूरा करना संभव ही नहीं है. अगर यही हालात रहे, दाेनाें ने कुछ लचीला रुख नहीं अपनाया, ताे हड़ताल नहीं टूटेगी. इसका सीधा असर स्कूलाें में पढ़नेवाले बच्चाें पर पड़ने लगा है. मांग कितनी उचित है या अनुचित, यह फैसला सरकार आैर शिक्षकाें काे ही करना है, लेकिन हड़ताल खत्म जितनी जल्द हाे, इसी में सभी की भलाई है. यह जगजाहिर है कि ग्रामीण इलाकाें में स्कूल पारा शिक्षकाें के बल पर ही चलते रहे हैं. पहले से स्कूलाें में शिक्षकाें की कमी रही है. अब पारा शिक्षकाें के हड़ताल पर जाने से अधिकांश स्कूलाें में पढ़ाई ही ठप है.

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सरकार दावा करती है कि वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है. टेट पास युवक-युवतियाें काे रखा जा रहा है, लेकिन असलियत कुछ आैर है. टेट पास सिर्फ दाे हजार लाेगाें ने आवेदन दिया है. काेई भी इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहता. इस बात की आशंका सभी के मन में है कि जब वे स्कूल में पढ़ाने जायेंगे, ताे वहां के पारा शिक्षकाें (हड़ताली) से अनावश्यक विवाद हाेगा, मारपीट भी हाे सकती है. यह डर मन में है. दूसरा बड़ा कारण है कि सुदूर गांवाें में टेट पास काेई जाना नहीं चाहता. इसलिए ताे पारा शिक्षकाें की बहाली की गयी थी, ताकि गांव के लाेग ही पढ़ायें.

 

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इसका असर क्वालिटी एजुकेशन पर पड़ है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता. फायदा यह हुआ था कि गांव में स्कूल खुलते थे, थाेड़ी-बहुत पढ़ाई भी हाेती थी, जाे अब बिल्कुल बंद है. अधिकांश बच्चे सिर्फ मिड डे मील के लिए स्कूल जाते थे. जब स्कूल बंद है, ताे खाना भी बंद. अब देखिए. इन बच्चाें काे पारा शिक्षकाें की मांगाें से काेई मतलब नहीं था, लेकिन इसका असर इनके खाने पर पड़ रहा है. कुछ स्कूल सिर्फ मिड डे मील के लिए कुछ समय के लिए खुलते हैं. कुछ बच्चाें काे खाना जरूर मिल जाता है, लेकिन पढ़ाई नहीं हाेती. कुछ समय बाद बच्चाें की परीक्षा हाेगी. जब पढ़ेंगे ही नहीं, ताे क्या परीक्षा देंगे? बिना पढ़ाई के अगली कक्षा में चले भी गये, ताे ऐसी पढ़ाई से क्या लाभ हाेनेवाला है? ये सब गंभीर बातें हैं, जिन पर विचार हाेना चाहिए. जब आरंभ में ही कमजाेर पढ़ाई के कारण बच्चे कमजाेर हाे जायेें, ताे आगे की पढ़ाई में वे बड़े आैर निजी स्कूलाें के बच्चाें से कैसे मुकाबला कर पायेंगे? समय रहते चेत जाना चाहिए. हर शिक्षक अपना दायित्व निभाये.

 

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सरकार इस हड़ताल की गंभीरता काे समझे. विपक्षी दल इस हड़ताल काे लेकर राजनीति करने आैर इससे फायदा उठाने की जगह इसे खत्म कराने में सहयाेग करे. ऐसे सार्थक प्रयास आरंभ हाे जायें. इसमें जितना भी विलंब हाेगा, नुकसान हर किसी का हाेगा. बच्चाें का भविष्य खराब हाे रहा है. अभी भी बहुत वक्त नहीं बिगड़ा है. गंभीर पहल हाे, पारा शिक्षक भी अपनी जिम्मेवारी काे समझें, सरकार-अधिकारी भी हड़ताल खत्म कराने का प्रयास करें, ताे रास्ता निकल सकता है.