aapne baat

  • Dec 23 2016 8:40AM

नोटबंदी और गांव

नोटबंदी और गांव
पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट बंद होने के बाद शहरों खासकर बड़े शहरों में हाहाकार है. गांवों में परेशानी तो है, लेकिन बड़े शहरों जैसी स्थिति तो कतई नहीं है. झारखंड के 20-22 हजार गांवों की जो रिपोर्ट है, उसके मुताबिक फिलहाल कोई बड़ी परेशानी नहीं है. यही है गांवों की असली ताकत. गांव-गांव तक उपभोक्तावाद की मार के बावजूद अपने देश के गांवों की वह ताकत अब तक कायम है, यह नोटबंदी के बाद की स्थिति से स्पष्ट है. 
 
गांवों को अपनी इस ताकत को समझना होगा. गांवों की अपनी ताकत है. इसी ताकत के कारण सरकार से लेकर बाजार तक के केंद्र में गांव हैं. यूपीए के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में गांवों में रोजगार के लिए मनरेगा शुरू हुई. इस योजना में गांव को बदलने की ताकत है. लेकिन मनरेगा के नाम पर लूट का कारोबार शुरू हो गया. कुआं बनाने से लेकर तालाब बनाने का काम कागजों पर चलने लगा. किक्रेट सचिन तेंदुलकर के नाम से जॉब कॉर्ड बन गये. मतलब विकास के लिए जो पैसा था, उसका 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. झारखंड में तो पंचायती राज चुनाव नहीं हुए थे. 
 
इस कारण मनरेगा में मनमानी की छूट भ्रष्ट अधिकारियों को मिली हुई थी. पंचायती राज चुनाव हो गये, तो मनरेगा में हो रही लूट पर अंकुश लगना शुरू हुआ. लेकिन अभी तक पंचायती राज के ढीले-ढाले रवैये के कारण मनरेगा को ग्राम पंचायत में प्रभावी नहीं बनाया जा सका है. छह वर्षों के अनुभवों के बाद यह तय हो गया कि ग्राम पंचायतों में मनरेगा की योजनाओं का लाभ आम लोगों के मिले, इसके लिए ग्राम पंचायतों को बड़ी भूमिका निभानी होगी. झारखंड में अब वह वक्त आ गया है, जब ग्राम पंचायतों को विकास की गाड़ी की स्टियरिंग संभालनी होगी. 
 
पिछले महीने योजना बनाओ अभियान में पंचायतों को अपनी पंचायतों के विकास के लिए दृष्टि पत्र बनाने से लेकर अगले तीन साल की योजना बनाने का काम सौंपा गया था. अब तक जिन पंचायतों की रिपोर्ट बनी है, उसके मुताबिक करीब 56 प्रतिशत पंचायतों ने अपने विकास की योजनाओं का प्राथमिकीकरण बहुत ही उम्दा तरीके से किया है. बस, अब यह तय करना है कि इन योजनाओं को सरकार की किस योजना से धन मिलेगा और उसे कौन-सी एजेंसी बनायेगी. योजना बनाओ अभियान में करीब 80 प्रतिशत योजनाओं का क्रियान्वयन मनरेगा से होना है. 
 
अब पंचायतों की जिम्मेवारी है कि वे इन योजनाओं की निगरानी बेहतर तरीके से करें. तभी गांवों में बदलाव आ सकेगा. मनरेगा के तहत भी कई बदलाव किए गये हैं. अब सार्वजनिक योजनाओं के बदले व्यक्तिगत लाभ वाली योजनाओं का चयन हो रहा है. इससे गांवों में समृद्धि की नयी कहानी लिखी जा सकती है. मुखिया से लेकर प्रखंड प्रमुख तक की जिम्मेवारी है कि मनरेगा में चयनित योजनाओं को सही तरीके से क्रियान्वित किया जाये. झारखंड के मनरेगा आयुक्त तो कहते हैं कि गांव का कोई भी आदमी मनरेगा में अगर कहीं भ्रष्टाचार हो रहा है, तो अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है. इन शिकायतों पर कार्रवाई निश्चित होगी.
 
तो उठिए. और, जहां भी मनरेगा में भ्रष्टाचार दिखे शिकायत जरूर कीजिए.
 
नमस्कार,
संजय मिश्र
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