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  • Jan 19 2017 10:02AM

किसानों का बढ़ेगा आत्मविश्वास डेयरी व्यवसाय का होगा विकास

किसानों का बढ़ेगा आत्मविश्वास डेयरी व्यवसाय का होगा विकास
26 नवंबर राष्ट्रीय दुग्ध दिवस
दूध उत्पादन किसानों के बीच पारदर्शिता बनाये रखना दूध उत्पादकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने में महत्वपूर्ण कारक साबित होता है. किसानों के उत्पाद को बाजार देना, समय पर भुगतान और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना मुख्य है. झारखंड के किसान दूध उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर तभी होंगे जब उन्हें इन चीजों की सहूलियत मिलेगी. स्वच्छ दुग्ध उत्पादन पर विशेष जोर दिया जाना जरूरी है, क्योंकि इसके बिना दूध को स्वच्छ नहीं रखा जा सकता. दूध उत्पादक किसानों को उपयुक्त बाजार के साथ-साथ निर्धारित समय पर भुगतान, दूध से बने सामान का समुचित वितरण, पशुओं की विशेष देखभाल व उनके खानपान की व्यवस्था हो, तो राज्य भी श्वेत क्रांति की ओर अग्रसर हो सकता है. राज्य में दूध उत्पादक किसानों की स्थिति, उत्पादन, वितरण व पशुओं की विशेष देखभाल पर झारखंड मिल्क फेडरेशन के प्रबंध निदेशक बीएस खन्ना से समीर रंजन ने विस्तार से बातचीत की. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :
 
सवाल : दूध उत्पादन के क्षेत्र में झारखंड किस तरह से आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है.
 
जवाब : झारखंड को दूध उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से 27 जून 2013 को झारखंड राज्य सहकारी दुग्ध उत्पादक महासंघ यानी जेएमएफ का गठन हुआ. इसका उद्देश्य है राज्य के दूध उत्पादक किसानों को बेहतर प्लेटफार्म मुहैया कराना है, जहां किसान अपने दूध को बेच सके. साथ ही किसानों में अात्मविश्वास बनाये रखने के लिए पंचवर्षीय योजना पर काम शुरू हुआ. सबसे पहले सरकार के अधीन रांची के आेरमांझी में चल रहे डेयरी प्लांट को एक अगस्त 2014 को जेएमएफ के अधीन किया गया. इसके बाद एक सितंबर 2014 को कोडरमा और देवघर जिला सहकारी दुग्ध संघ की प्रमुख गतिविधियों को इसके अधीन किया गया. उक्त डेयरियों के अधिग्रहण का उद्देश्य उन क्षेत्रों के दूध उत्पादक किसानों को अच्छा बाजार देना था, ताकि किसान दूध उत्पादन के क्षेत्र में अधिक से अधिक रुचि दिखायें. साथ ही किसानों में आत्मविश्वास जगाना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बिना राज्य में श्वेत क्रांति की ओर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है.
 
सवाल : डेयरी विकास के क्षेत्र में दूध उत्पादक को किस तरह से लाभ मिलता है.
 
जवाब : मेरा मानना है कि दूध उत्पादकों को मिलने वाले लाभ का अंदाजा इसी बात से लगता है जब दूध उत्पादक किसान अपने दूध को बेचने के लिए ज्यादा परेशान ना दिखें. इसके लिए जेएमएफ ने कुछ गांवों को मिलाकर एक कलस्टर बनाया. उस सेंटर में ही किसानों के दूध का टेस्ट हुआ और उसके हिसाब से ही बैंक अकाउंट के माध्यम से उनका भुगतान हुआ. इसका लाभ यह हुआ कि जिस गांव में पहले दूध का उत्पादन कम होता था, वहीं अब उत्पादन दोगुना हो गया. इसका मुख्य कारण है दूध उत्पादकों के साथ पारदर्शी तरीके से काम करना. साथ ही बल्क मिल्क कूलर की भी व्यवस्था की गयी ताकि दूध प्लांट तक लाने में खराब ना हो. किसानों के साथ हमेशा संवाद कायम रखने का ही परिणाम रहा कि दूध उत्पादक किसान अपनी पशुओं की संख्या में बढ़ोतरी करने लगे. राजधानी रांची के नगड़ी के पास एक गांव है हरी. इस गांव में पहले दूध उत्पादन नहीं के बराबर होता था लेकिन जब जेएमएफ वहां पहुंची तो अब इस गांव में करीब डेढ़ हजार लीटर प्रतिदिन दूध का उत्पादन हो रहा है. वहीं धरवाटांड़ गांव में प्रतिदिन 40 लीटर दूध का उत्पादन होता था लेकिन अब वही गांव तीन हजार लीटर प्रतिदिन दूध का उत्पादन कर रहा है. यह तो कुछ बानगी है. ऐसे ही कई और गांव हैं जहां के किसान दूध उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर काम रहे हैं और यह सब हुआ है दूध उत्पादकों के साथ पारदर्शिता बरतने के कारण. पशुओं को साइलेज खिलाने पर ज्यादा जोर दिया जाता है ताकि गाय को गुणवत्तापूर्ण चारा मिल सके. इसके अलावा किसानों को आहार संतुलित कार्यक्रम पर भी ध्यान देने के लिए जागरूक किया जा रहा है. इससे किसानों को यह फायदा होगा कि वे अपने पशुओं को जरूरत के हिसाब से खाना दे जिससे उन पशुओं में दूध की पैदावर अधिक हो सके. इस काम के लिए ग्रामीण युवक-युवतियों को प्रशिक्षण देकर काम पर लगाया गया है ताकि गांवों में दूध के उत्पादन में इजाफा हो.
 
सवाल : दूध उत्पादकों के विकास के लिए आपके पास क्या-क्या योजनाएं है.
 
जवाब : फेडरेशन की हमेशा सोच रही है कि दूध उत्पादन के क्षेत्र में किसानों में सकारात्मक सोच बरकरार रहे. झारखंड मिल्क फेडरेशन बनने से पहले राज्य के करीब चार सौ करोड़ रुपये बिहार सरकार के माध्यम से वहां के किसानों के पास पहुंच रही थी. अगर यही चार सौ करोड़ रुपये झारखंड के किसानों को मिले तो राज्य को दूध उत्पादन के क्षेत्र में स्वावलंबी बनने से कोई नहीं रोक सकता. इस संदर्भ में मुख्यमंत्री रघुवर दास से भी बात हुई. मुख्यमंत्री का सहयोग मिलने के बाद फेडरेशन आज राज्य के किसानों के बीच करीब 112 करोड़ रुपये दूध के माध्यम से वितरित कर रहा है. राज्य में फेडरेशन का वार्षिक टर्नओवर 140 करोड़ रुपये का है.
 
फेडरेशन किसानों के विकास के प्रति कृतसंकल्पित है. गांवों में किसानों को दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गयी है. जिसके तहत दूध एकत्रित करना, पशुओं में दूध देने की क्षमता विकसित करना, डेयरी व्यवसाय से जुड़ी नयी तकनीक का प्रशिक्षण समेत अन्य प्रशिक्षण किसानों को दिया जा रहा है. फेडरेशन द्वारा किसानों के अलावा उपभोक्ताओं की पसंद-नापसंद पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है. जानवरों के चारे, उचित देखभाल, टीकाकरण, गर्भाधारण पर भी किसानों को जागरूक किया जा रहा है. दूध उत्पादकों को डेयरी विकास से जुड़ी अन्य जानकारियों को जानने के लिए गुजरात और सिलीगुड़ी भेजा जा रहा है. गुजरात में दूध उत्पादन के संबंध में जहां जानकारी मिलती है तो वहीं सिलीगुड़ी में पशुओं के रख-रखाव की बारे में जानकारी मिलती है. स्वच्छ दुग्ध उत्पादन पर विशेष जोर दिया जाता है क्योंकि इसके बिना दूध को स्वच्छ नहीं रखा जा सकता. फेडरेशन ने दूध उत्पादकों को दूध एकत्रित करने के लिए पांच और दस लीटर का एसएस कैन उपलब्ध कराया है ताकि दूध को साफ रखा जा सके.
 
सवाल : जेएमएफ राज्य के कितने गांवों में काम कर रही है.
 
जवाब : झारखंड राज्य मिल्क फेडरेशन राज्य के तकरीबन 15 सौ गांवों में अपना काम कर रही है. दूर-दराज के दूध उत्पादन घनत्व वाले गांवों पर विशेष नजर रखी जाती है क्योंकि यहीं से दूध अधिक मात्रा में मिल सकता  है.
सवाल : क्या है साइलेज.
जवाब : साइलेज एक संरक्षित हरा चारा है, जिसमें नमी की मात्रा करीब 65 प्रतिशत होती है. इस प्रक्रिया में घुलनशील शर्करा यानी सुक्रोस, ग्लूकोस, फ्रक्टोस और फ्रक्टन्स से युक्त हरे चारे की फसलों की कुट्टी काट कर वायुरहित स्थिति में कम से कम 45 दिनों तक भंडारण किया जाता है, जिससे चारे में मौजूद बैक्टीरिया और शर्करा किण्वन के तहत लैक्टिक अम्ल में बदल देता है और यही लैक्टिक अम्ल इस चारे को संरक्षित रखने में सहायक सिद्ध होता है. यही कारण है कि संरक्षित साइलेज का भंडारण करीब दो साल तक किया जा सकता है. चारे की फसलें जैसे - मक्का, ज्वार, जई, चारा बाजरा और संकर नेपियर घास साइलेज बनाने के लिए उपयुक्त फसल है.
सवाल : ग्रामीण डेयरी व्यवसाय को आजीविका के रूप में कैसे अपना सकते हैं.
 
जवाब : देखिये, सरकारी स्कीम के तहत काम धरातल पर तभी नजर आयेगा जब ग्रामीणों को लाभ मिलेगा. वहीं ग्रामीणों को भी यह समझना होगा कि सरकार उनके विकास के लिए ही इन योजनाओं को उनके पास लायी है.
 
सवाल : प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अन्य ब्रांडेड दूध से मेधा दूध किस तरह मुकाबला कर रहा है. इस दूध के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाने की क्या योजना है आपके पास.
 
जवाब : अन्य ब्रांडेड दूध की बात करें तो कुछ के ब्रांड लंबे समय से बाजार में है. उनका रिटेल आउटलेट भी है, जिसके सहारे वो लोगों के बीच है. मेधा को बाजार में आये अभी कुछ ही समय हुआ है लेकिन लोगों का सकारात्मक सहयोग मिल रहा है. साथ ही महिलाओं के बीच इस दूध को ले जाने की भी योजना है क्योंकि घर-घर तक इस दूध को पहुंचाने में यह एक सशक्त माध्यम है.
 
सवाल : राज्य में श्वेत क्रांति को कैसे बढ़ावा मिलेगा.
 
जवाब : राज्य में श्वेत क्रांति को तभी बढ़ावा मिलेगा जब डेयरी प्लांट की संख्या में इजाफा हो क्योंकि सिर्फ किसानों को दूध उत्पादन पर ही जोर नहीं दे बल्कि उनके दूध को बाजार तक पहुंचाने में आने वाली प्रक्रिया पर भी ध्यान देना जरूरी है. फेडरेशन की भी पंचवर्षीय योजना में चार डेयरी प्लांट लगाने की योजना है. दूध उत्पादक किसानों को उपयुक्त बाजार के साथ-साथ निर्धारित समय पर भुगतान, दूध से सामानों का समुचित वितरण, पशुओं की विशेष खानपान व देखभाल के बिना श्वेत क्रांति की बात बेमानी होगी.