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  • Jan 27 2017 9:09AM

23 दिसंबर : किसान दिवस : किसानों का बहता पसीना खेत उगलता सोना

23 दिसंबर : किसान दिवस : किसानों का बहता पसीना खेत उगलता सोना
23 दिसंबर को राष्ट्रीय किसान दिवस है. इस खास दिन को ध्यान में रखकर पंचायतनामा का यह अंक किसानों पर केंद्रित है. इस अंक में हमने खेती-किसानी से जुड़ी उन सभी योजनाओं को आपके सामने रखने का काम किया है, जो खेती को बढ़ावा देने के लिए है, किसानों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं. 
 
देश की आजादी से ठीक पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है. भारत गांवों का देश है. आंकड़ों के लिहाज से यह ठीक भी है. गांवों और किसानों के लिए योजनाएं भी बहुत सारी बनी है, आगे भी बनेंगी, लेकिन आजादी के 70 साल में किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री के लिए सुरक्षा सलाहकार होते है, आर्थिक सलाहकार होते हैं, लेकिन उनका कोई कृषि सलाहकार नहीं होता है. देश में बहुत सारे आयोग है-बाल आयोग, महिला आयोग, पिछड़ा आयोग, दलित आयोग, मानवाधिकार आयोग और न जाने कितने, लेकिन कोई किसान आयोग नहीं है, जो किसानों का प्लेटफार्म हो. जहां किसानों की समस्या का समाधान हो. 
 
तीन दिन पहले अखबारों में छपी तसवीरों में व टेलीविजन पर हमने देखा कि कैसे छत्तीसगढ़ के किसानों से 25 पैसे प्रति किलो टमाटर भी व्यापारी खरीदने को तैयार नहीं हैं. मजबूरन किसानों ने अपने टमाटर को सड़कों पर बिखेर दिया और अपने टैक्ट्ररों से रौंद डाला. हर साल इस तरह की खबरें आती है. हम इन खबरों को देखते हैं और फिर समय के साथ भूल जाते हैं. आपको याद दिला दें कि सालाना स्तर पर होने वाले राष्ट्रीय सैंपल सर्वे में देश के 60 प्रतिशत से अधिक किसान अब खेती नहीं करना चाहते हैं. खेती घाटे का सौदा नहीं, मौत का सौदा बन गयी है. इन सवालों के बीच में हर साल किसान दिवस मनाया जाता है, लेकिन बहुत ही रस्मी तौर पर. देश के हर व्यक्ति के लिए भोजन उपलब्ध कराने वाले किसान की स्थिति बहुत खराब है. इस खराब स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है. इस पर हमें गंभीर चिंतन की जरुरत है. 
 
झारखंड के किसानों ने पिछले पांच सालों में कमाल कर दिया है. पहले झारखंड को धान उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया. सब्जियों के मामले में झारखंड तो अपने पड़ोसी राज्यों को सप्लाई कर रहा है. मछली उत्पादन में झारखंड आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चला है. दूध उत्पादन में इजाफा हुआ है. मधु, खासकर करंज के फूलों से बने मधु, की मांग तो पूरे देश में है. कुल मिलाकर देखें, तो झारखंड के किसानों ने अपने दम पर राज्य का पेट भरने में कोई कसर नहीं रखा है. आंकड़े बताते हैं कि झारखंड के किसानों ने अपनी मेहनत से लगातार परती जमीन को उपजाऊ बनाने का काम जारी रखा है. हर साल खेती का रकबा बढ़ रहा है. 
 
झारखंड के किसानों को सरकारी योजनाओं की सही और पुख्ता जानकारी देने की कोशिश पंचायतनामा ने इस अंक में की है. पंचायतनामा अपने राज्य के किसानों को यह बताना चाहता है कि उनके लिए कई योजनाएं हैं. इन योजनाएं का लाभ उठाना चाहिए. अगर इन योजनाओं का लाभ देने से कोई विभाग या अधिकारी इनकार करता है, रोड़े अटकाता है, तो उसकी लिखित शिकायत बड़े अधिकारियों से कीजिए. ऐसे अधिकारियों-कर्मचारियों की करतूतों को पंचायतनामा के साथ सांझा कीजिए. 
 
पंचायतनामा का यह अंक आपको कैसा लगा, आप अपने सुझाव व प्रतिक्रियाएं हमें जरुर दीजिए, ताकि पंचायतनामा का हर अंक हम आपके लिए उपयोगी बना सकें.
 
नमस्कार,
संजय मिश्र
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