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  • Apr 21 2017 1:06PM

अपनी बात

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झारखंड एक ऐसा राज्य है, जहां बारिश तो बहुत होती है. इस साल भी जहां देश के बाकी हिस्सों में मॉनसून 95 फीसदी के करीब होगा यानी सामान्य से पांच फीसदी तक कम वर्षा होगी, वहीं झारखंड, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में सामान्य बारिश की संभावना है, लेकिन गरमी के दिनों में पीने का पानी नहीं मिलता है. खेती के लिए तो पानी मिलना लगभग नामुमकिन है. यह हालात क्यों हैं? इस पर बातचीत करने के लिए पंचायतनामा की टीम पिछले दिनों बुंडू प्रखंड में किसानों, महिलाओं और समाज के दूसरे लोगों से मिलने पहुंची. बातचीत का लब्बोलुआब यह रहा कि पानी सभी को चाहिए, लेकिन पानी बचायेगा कौन? इस सवाल से कोई जूझना नहीं चाहता है. 

पंचायत प्रतिनिधियों के पास पानी बचाने को लेकर कोई नीति नहीं है. उन्हें जागरूक करने की कोशिश भी नहीं की जा रही है. पंचायतनामा ने तकरीबन 200 ग्रामसभाओं के प्रधानों से यह पूछा कि पानी बचाने के लिए उनके गांव में क्या काम हो रहा है? ग्राम प्रधानों का जवाब था कि सरकार डोभा बना रही है, लेकिन डोभा बनाने का गांववाले काफी विरोध कर रहे हैं. गांववालों का कहना है कि डोभा बनाने में उनकी जमीन चली जाती है. साथ ही बच्चों और मवेशियों के उसमें डूब कर मरने की घटनाएं होती हैं. इस कारण कई गांवों में सरकार के पैसे से जो डोभा खोदा गया था, उसे गांववालों ने भर दिया है. इस तरह जागरूकता की कमी के कारण सरकारी पैसे की बर्बादी हो रही है. इस बर्बादी को रोकने का कारगर उपाय पंचायतों को पानी के मामले में संवेदनशील बनाना है. पंचायत प्रतिनिधियों को इस बात का प्रशिक्षण मिलना चाहिए कि वे अपने गांववालों को यह समझा सकें कि डोभा बनने से उनकी जो जमीन बेकार चली गयी है, उस जमीन से ज्यादा आमदनी उन्हें उनका डोभा दे सकता है. डोभा के दो-तीन बड़े फायदे हैं. एक तो खेत में सालों भर नमी होती है. इस नमी के कारण पैदावार बढ़ती है. दूसरा फायदा यह होता है कि डोभा के मेड़ पर आप सब्जियां लगा सकते हैं. इससे आपको सालभर हरी सब्जी मिलती है. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इस तरह के डोभा में आप मछली भी पाल सकते हैं.  मछली पालन से आमदनी होगी और आपको खाने के लिए भी मछली मिल जाया करेगी. डोभा के इन तीन फायदों के बारे में गांववालों को बताने वाला कोई नहीं है. उल्टे डोभा के खिलाफ प्रचार चल रहा है. इस प्रचार का असर है कि कोई भी अपने खेत में अपनी मरजी से डोभा नहीं खुदवाना चाहता है. 

भले ही राज्य सरकार ने यह नारा दिया है कि गांव का पानी गांव में, लेकिन जब तक इस नारे के साथ पंचायत प्रतिनिधि नहीं जुड़ेंगे, पानी को गांव में नहीं सहेजा जा सकता है. अब गांव चापाकल से आगे डीप बोरिंग कराने की बात कर रहे हैं. यह अगर इसी तरह चलता रहा, तो स्थिति बहुत ही भयावह होगी. तमाम कानून धरे रह जायेंगे और गांव-जवार बिन पानी सून की स्थिति में होंगे. पानी को सहेजने के सहज उपाय से लेकर सरकारी योजनाओं की जानकारी इस बार के पंचायतनामा के अंक में हमने रखने की कोशिश की है. उम्मीद है यह अंक भी आपके लिए उपयोगी साबित होगा.

पंचायतनामा का यह अंक आपको कैसा लगा, हमें जरूर बताइयेगा. हमें आप ई मेल, मोबाइल, व्हाट्सअप पर भी अपनी प्रतिक्रिया या अपने सुझाव भेज सकते हैं. आप मोबाइलवाणी के नंबर पर भी मिस्ड कॉल करके अपनी या सार्वजनिक समस्या अथवा अपने को रिकार्ड करा सकते हैं. आपकी आवाज को हम संबंधित अधिकारियों तक पहुंचायेंगे, ताकि आपकी समस्याओं का समाधान हो सके.

नमस्कार,

संजय मिश्र

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