aapne baat

  • Sep 13 2017 1:23PM

अपनी बात

गांवों की क्या कहें, बड़े शहरों की भी मलीन बस्तियों में मलेरिया से रोगी की मौत हो जाती है. डायरिया के कारण बच्चों की मौत तो सामान्य बात है. बहुत ही छोटी-छोटी गलतियों के कारण हम और हमारे बच्चों की जान पर बन आती है. गांवों में मामला ज्यादा खराब और हो जाता है, क्योंकि वहां के स्वास्थ्य केंद्रों में डाॅक्टर हैं, तो दवाइयां नहीं है. डाॅक्टर कभी-कभार ही स्वास्थ्य केंद्रों पर पहुंचते हैं. पारा मेडिकल स्टाफ जैसे नर्स, कंपाउंडर, एएनएम की सुविधाएं केवल कहने भर की है. इस स्थिति में हमारी थोड़ी सी लापरवाही बहुत ही महंगी साबित होती है. 

गांव व पंचायत में आम लोगों के स्वास्थ्य को लेकर शायद ही कोई चिंतित नजर आता है. गांव के लोगों को मालूम है कि गंदगी होगी, तो बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा. नालियों में अगर पानी जमा रहेगा, तो मच्छरों का प्रकोप बढ़ेगा. गंदे हाथों से खाने से संक्रमण का खतरा निश्चित है. इसके बावजूद गांवों में आम लोगों की सेहत के लिए न तो कोई ग्रामसभा बुलायी जाती है और न ही इसके लिए लोगों को जागरूक करने की कोशिश होती है. ले दे कर गांवों में सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं या सरकारी व्यवस्था के भरोसे लोग रहते हैं.

परेशान लोग सरकारी व्यवस्था में बदइंतजामी को जी भर के कोसते हैं. बस. सेहत को लेकर पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका न के बराबर है. पंचायत भवन, स्वास्थ्य केंद्र या स्कूल की बाहरी दीवारों पर सेहत को लेकर स्लोगन लिखा रहता है, जो हर बारिश के मौसम में थोड़ा और धुंधला हो जाता है. 

पंचायत प्रतिनिधियों से पूछिए कि उनके पंचायत में आम लोगों के स्वास्थ्य की क्या स्थिति है, तो उनके पास न कोई जवाब है और न ही कोई दृष्टि. ऐसे पंचायत प्रतिनिधियों की भी कोई गलती नहीं है. दरअसल उन्हें यह बताया भी नहीं गया है कि पंचायती राज के एजेंडे में सेहत भी कोई चीज है. वे तो बस सड़क, नाली, चापाकल के फंड के चक्कर में पड़े हैं. इस स्थिति को लेकर पंचायतनामा ने यह नया अंक तैयार किया है. इस अंक का मकसद ही है कि सेहत कैसे आपकी मुट्ठी में हैं. सेहतमंद गांव-पंचायत के लिए हमें क्या करना चाहिए. थोड़ी सी समझदारी से हम कैसे बड़े रोगों से अपना और अपने परिवार का बचाव कर सकते हैं. 

आपको यह अंक कैसा लगा, हमें जरूर बताइएगा. आप टेलीफोन, मोबाइल, ई-मेल और व्हाट्सएप पर हमसे संपर्क कर सकते हैं.

नमस्कार,

संजय मिश्र

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