aapne baat

  • Nov 20 2017 12:34PM

अपनी बात

अपनी बात

अब वह दिन नहीं रहा जब किसान सिर्फ धान, गेंहू, मकई या दलहन की खेती कर अपना जीवन चलाते थे. समय बदला. हर किसी की तरह किसान भी आय बढ़ाना चाहते हैं. सरकार ने भी कृषि काे बढ़ावा देने के लिए कई नयी याेजनाआें काे लागू किया है. इसी क्रम में फल-फूल की खेती के लिए नेशनल बागवानी मिशन चल रहा है. इसका लाभ किसानाें काे मिल रहा है, उनकी रूचि बढ़ी है आैर आय कई गुनी बढ़ी है.

इसी मिशन का एक हिस्सा है फूलाें की खेती. पंचायतनामा के इस अंक में हमने प्रयास किया है कि किसानाें काे यह जानकारी दी जाये कि फूलाें की खेती से उन्हें कितना लाभ हाे सकता है, फूलाें का कितना बड़ा बाजार है, फूल की खेती में कितने अवसर छिपे हैं. जानकारी के अभाव में किसान फूलाें की खेती नहीं करते हैं. उहापाेह में रहते हैं कि झारखंड में फूल की खेती हाे पायेगी या नहीं, लाभ हाेगा या नहीं, फूलाें काे कहां बेचेंगे, बिकेगा या नहीं. इसी उहापाेह काे हमने दूर करने का प्रयास किया है.

झारखंड के किसानाें के पास इसमें लीड लेने का अवसर है. झारखंड की जलवायु फूल की खेती के अनुकूल है. कम मेहनत आैर कम पूंजी में फूलाें की अच्छी खेती हाे सकती है, अच्छा आैर निश्चित बाजार मिल सकता है. इस राज्य में जाे लाेग फूलाें की खेती कर रहे हैं, उन्हें इसका लाभ पता है. पूरी दुनिया में फूलाें की मांग है आैर विकसित देश बड़े पैमाने पर इसकी खेती कर रहे हैं. नीदरलैंड, अमेरिका, स्वीडन, जर्मनी आैर डेनमार्क जैसे देश फूलाें की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं.

नीदरलैंड का पहला आैर भारत का दुनिया में 10वां स्थान है. पूरे भारत में 9000 कराेड़ रुपये का फूलाें का बाजार है. लगभग 70,581 हेक्टेयर में 2236000 मिट्रिक टल फूलाें की खेती (वर्ष 2016) हाेती है. इसमें तमिलनाडु सबसे आगे है. केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक के साथ-साथ पश्चिम बंगाल आैर आेड़िशा में फूलाें की मांग ज्यादा है. दरअसल मंदिराें में बड़े पैमाने पर फूल चढ़ाये जाते हैं. इन्हीं कारणाें से दक्षिण में मांग ज्यादा है. 

झारखंड में भी असीम संभावना है. यहां बाबा मंदिर (देवघर) में ही साल में पांच कराेड़ से ज्यादा के फूल चढ़ते हैं. शादी, सजावट आैर धार्मिक कामाें के लिए दूसरे राज्याें खास कर बंगाल से झारखंड में फूल मंगाना पड़ता है. अगर झारखंड में ही पर्याप्त मात्रा में फूलाें की उपज हाेती ताे यह पैसा झारखंड में ही रहता. हालांकि रांची, देवघर, पूर्वी सिंहभूम समेत कई जिलाें में फूलाें की खेती आरंभ की गयी है, लेकिन मांग की तुलना में उत्पादन बहुत ही कम हाे रहा है. पंचायतनामा के इस अंक में फूलाें की खेती पर अधिक से अधिक जानकारी देने आैर किसानाें काे प्राेत्साहित करने का प्रयास किया गया है. इस अंक में ताजगी लाने के लिए कुछ बदलाव किये गये हैं. कुछ स्तंभ जाेड़े गये हैं. अब हर अंक में खेती-बारी आैर ग्रामीण विकास या पंचायत से जुड़े विशेषज्ञ या अधिकारी पंचायतनामा के पाठकाें के लिए विशेष ताैर पर लिखा करेंगे. इसी क्रम में इस अंक में पद्मश्री अशाेक भगत का विशेष लेख आप पढ़ेंगे. हमारा प्रयास हाेगा कि पंचायतनामा में ऐसी सामग्री दी जाये जाे समाज के हर तबका के लिए पठनीय हाे. ऐसा इसलिए क्याेंकि अब गांव बदल रहे हैं, पंचायत बदल रहे हैं, उनकी जरूरतें बदल रही हैं. इन सब चीजाें काे ध्यान में रख कर हम समय-समय पर इसमें बदलाव करते रहेंगे.

अनुज कुमार सिन्हा

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