aapne baat

  • Jan 22 2018 2:12PM

हमारी रफ्तार धीमी क्याें ?

हमारी रफ्तार धीमी क्याें ?


इसमें काेई दाे राय नहीं कि आजादी के बाद 70 साल में भारत में बहुत बदलाव हुए हैं, लेकिन यह भी सही है कि बदलाव की जाे रफ्तार हाेनी चाहिए थी, वह नहीं है. यही कारण है कि कई क्षेत्राें में भारत आज भी पीछे है. तमाम प्रयासाें के बावजूद ग्रामीण इलाकाें में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. 1947 में भारत आजाद हुआ था, उसी के अासपास चीन (1949), इस्त्राइल (1948) जैसे देश आजाद हुए थे. सिंगापुर जैसे देश ताे भारत के 17 साल बाद आजाद हुए, लेकिन आज दुनिया के विकसित देशाें में गिने जाते हैं. ऐसी बात नहीं है कि भारत में कुछ काम हुआ ही नहीं है. जाे देश आजादी के पहले इस्पात काे छाेड़ कर अन्य सभी चीजाें के लिए दूसरे देशाें पर निर्भर करता था, उस देश में आज लड़ाकू विमान बन रहे हैं. भारत परमाणु संपन्न राष्ट्र बन गया है, एक से एक उपग्रह अंतरिक्ष में छाेड़ रहा है. सिर्फ अपने देश का नहीं, दूसरे देशाें का भी. दुनिया की 10 बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन चुका है भारत. ये सब आंकड़े बताते हैं. संताेष करने के लिए इन आंकड़ाें का हम अपनी सुविधानुसार उपयाेग करते हैं. जमीनी हकीकत कुछ आैर कहती है. शहरी क्षेत्राें का विकास ताे हाे रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाके उपेक्षित हैं. कुछ सड़कें जरूर बन गयी हैं, लेकिन जब तक लाेगाें की आय नहीं बढ़ेगी, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा नहीं मिलेगी, उसका जीवन स्तर कैसे सुधरेगा. भारत की बड़ी आबादी गांवाें में निवास करती है अाैर वहां के लाेगाें का जीवन बड़े उद्याेगाें से नहीं चलता. वे खेती करते हैं, लेकिन बड़े इलाकाें में पानी की कमी रहती है. अगर किसी प्रकार पानी की व्यवस्था कर भी लें, ताे उनकी फसल का सही मूल्य नहीं मिलता. बिचाैलिये हावी रहते हैं. आंकड़े बताते हैं कि इतने सारे गांवाें में बिजली पहुंच गयी है. 20-22 घंटे किसानाें काे बिजली मिलती है, जबकि 8-10 घंटे बिजली के लिए किसान तरसते हैं. ऐसे में कैसे गांवाें रहनेवाले आगे बढ़ेंगे. स्कूल है ताे शिक्षक नहीं जाते. कुछ पारा टीचर्स के भराेसे सब छाेड़ दिया गया है. स्वास्थ्य केंद्राें में डॉक्टर नहीं जाते. इलाज के अभाव में लाेग दम ताेड़ते हैं. सरकार का कराेड़ाें कराेड़ रुपये पानी में जाता है. जिन लाेगाें के लिए याेजनाएं बनायी जा रही हैं, उन तक पहुंच नहीं पाती. झारखंड की बात करें, ताे पंचायत व्यवस्था यहां लागू है. सारी जवाबदेही पंचायताें पर है. ग्रामसभा की बगैर सहमति के कुछ नहीं हाे सकता. विकास का काम उन्हें देखना है. ये व्यवस्था इसलिए की गयी, ताकि सत्ता लाेगाें के हाथाें में रहे. अफसराें का दबदबा कम हाे, लेकिन हाे रहा है उलटा. अधिकांश मुखिया अफसराें के साथ मिल कर पैसा कमाने में लग गये हैं. देखना है ताे देखिए कि कैसे मुखियाजी का घर अचानक दाे मंजिला हाेने लगा, कैसे नयी-नयी गाड़ी उनके घर आ गयी. कैसे कुबेर उनसे खुश हाे गये. अगर गांव आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं ताे इसके लिए सिर्फ सरकार जिम्मेवार नहीं है. वह व्यवस्था जिम्मेवार है जिसके हिस्से हम सभी हैं.
यह सही है कि हर किसी काे बेहतर जिंदगी जीने का अधिकार है. उसका सपना हाेता है. विकास में वह अपना हिस्सा खाेजता है. उसके मन में सवाल उठता है. इस्त्राइल का झारखंड (अफसराें पर) पर बड़ा प्रभाव है. यहां के किसान इस्त्राइल जा भी रहे हैं. ताे जरूर देखिए कि इस्त्राइल के गांव कहां खड़ा हैं, पूरा इस्त्राइल कैसे विकसित हुआ है. कैसे वहां के लाेगाें में जुनून है. वे देश के लिए साेचते हैं. काेई मुफ्त का खाना नहीं चाहता, काम कर, राष्ट्रीय आय में अपना याेगदान करने के बाद ही अपना हिस्सा लेता है. तभी ताे इस्त्राइल में संपन्नता है. वहां 99.8 प्रतिशत परिवार के पास फ्रीज है, 96.1 फीसदी के पास वाशिंग मशीन है, 87.5 फीसदी के पास टेलीविजन है, 96.9 फीसदी के पास माेबाइल फाेन है. ये सभी संपन्नता के प्रतीक हैं. झारखंड में आैर यहां के ग्रामीण इलाकाें में भी आगे बढ़ने की पर्याप्त क्षमता है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक ईमानदारी (सरकार से लेकर मंत्री-विधायक, सांसद-मुखिया तक) दिखानी हाेगी. हर नागरिक काे अपनी जिम्मेवारी निभानी हाेगी. विजन दिखाना हाेगा आैर बड़े साेच के साथ आगे बढ़ना हाेगा.
अनुज कुमार सिन्हा
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