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  • Apr 16 2018 1:22PM

जज्बा हाे, ताे बदल जायेगी गांवाें की तसवीर

जज्बा हाे, ताे बदल जायेगी गांवाें की तसवीर


अनुज कुमार सिन्हा 

 पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के पीछे मकसद ही था- शासन का अधिकार उनके हाथ में. गांव के लाेग यह तय करें कि वे क्या चाहते हैं. गांव की प्राथमिकताएं क्या हैं. उनके भाग्य का फैसला जनता या उनके द्वारा चुने गये प्रतिनिधि करें, अफसर नहीं. अब यही सपना ताे झारखंड में साकार हाे रहा है. झारखंड में दाे-दाे बार पंचायत चुनाव हाे चुके हैं. अब सारा कुछ तय इन्हीं पंचायत प्रतिनिधियाें काे करना है. कर भी रहे हैं. समय के साथ-साथ पंचायताें काे कई विभागाें के अधिकार दिये जा चुके हैं. जहां बेहतर मुखिया या अन्य प्रतिनिधि हैं, जुनूनी हैं, ईमानदार हैं, विजन है, वहां बेहतर काम हाे रहे हैं, दिख भी रहे हैं. जहां नहीं हैं, वहां की स्थिति आज भी बदतर है. एक दाैर था जब गांव की याेजनाएं शहर के एसी कमरे में बैठ कर बनायी जाती थी, गांव के फैसले शहर के कार्यालयाें में अधिकारी लेते थे. गांव की असली प्राथमिकताएं क्या हैं, यह जाने बगैर निर्णय थाेप दिये जाते थे. अब ऐसा नहीं हाे सकता. गांव के लाेग तय करते हैं कि कैसे हाे विकास. यही ताे पंचायती राज है. हालांकि अभी भी हालात हर जगह ठीक नहीं हैं.

 

जीवन में खुशियां लाता डेयरी उद्याेग

ग्रामसभा सर्वाेपरि है आैर इसे ही फैसला लेना है. जहां गड़बड़ी हाे रही है वहां कागज पर ग्रामसभा की बैठक हाे जाती है, ग्रामीणाें काे पता नहीं चलता. जिस गांव के लाेग जागरूक हैं, वहां ऐसी स्थिति नहीं है. सबसे बड़ी चिंता की बात है पंचायताें में भ्रष्टाचार. कई मुखिया गड़बड़ी के आराेप में जेल जा चुके हैं. कई पर गंभीर आराेप है. अब जिनके हाथ में विकास की जिम्मेवारी है, वही अफसराें के साथ मिल कर गड़बड़ी करने लगे, ताे इसका काेई निदान नजर नहीं आता. पंचायताें काे अधिकार जरूर मिल गये, लेकिन इसका दुरुपयाेग नहीं हाे, यह सुनिश्चित करना सबसे कठिन काम है. स्कूलाें में पढ़ाई हाे रही है या नहीं, यह देखना पंचायत का काम है. शिक्षक आते हैं या नहीं. यह पंचायताें काे मिले अधिकार का ही परिणाम है कि दूरदराज के गांवाें में भी शिक्षकाें काे जाना पड़ता है. यह बच्चाें के भविष्य से जुड़ा मामला है. इसमें लापरवाही का मतलब है बच्चाें का भविष्य खराब करना. पंचायताें काे अब सीधे सरकार की आेर से बड़ी राशि जा रही है. अब यह पंचायत प्रतिनिधियाें पर निर्भर करता है कि उस पैसे का सही उपयाेग हाे. गांव में पानी की व्यवस्था है या नहीं, सिंचाई के साधन है या नहीं, हेल्थ सुविधा है या नहीं आदि. संताेष की बात यह है कि मुखिया अब अपनी जिम्मेवारी काे समझने लगे हैं आैर दुनिया में हाे रहे बदलाव काे अपने यहां लागू करने के लिए ललायित हैं. अभी हाल ही में गुमला के अनेक मुखिया ने केरल के गांवाें का दाैरा किया आैर वहां का विकास मॉडल देखा. न सिर्फ देखा, बल्कि वहां जाे सीखा, लाैट कर गांव के लाेगाें काे उसे बताया भी. देश के कई इलाकाें में अच्छे काम हाे रहे हैं. अगर इन्हें साझा किया जाये, ताे इसका लाभ अन्य गांवाें काे भी मिलेगा. यह काम हाे रहा है. एक समस्या रही है कि पंचायत प्रतिनिधियाें के प्रशिक्षण की. अधिकांश मुखिया काे लंबे समय तक यह पता ही नहीं था कि वे मुखिया ताे बन गये, करेंगे क्या, करेंगे कैसे. लगातार बेहतर प्रशिक्षण से इस समस्या का निदान हाे सकता है. पंचायत प्रतिनिधि जितने समझदार हाेंगे, जागरूक-जिम्मेवार हाेंगे, गांव की आम जनता की जितनी कड़ी निगरानी हाेगी, वह गांव-पंचायत उतना ही बेहतर हाेगा. वहां उतने ही अच्छे काम हाेंगे. सरकार ने बेहतर पंचायताें काे पुरस्कृत करने की घाेषणा कर उनका मनाेबल बढ़ाने का प्रयास किया है. अब जबकि पंचायताें में सुविधाएं बढ़ रही हैं, पंचायत सचिवालय काम करने लगा है, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि झारखंड के गांवाें की तसवीरें तेजी से बदलेंगी.