aapne baat

  • Mar 6 2018 11:47AM

महिलाआें काे आैर सशक्त किये बिना समाज का भला नहीं हाेगा

महिलाआें काे आैर सशक्त किये बिना समाज का भला नहीं हाेगा

इसमें काेई दाे राय नहीं कि पहले की तुलना में महिलाएं सशक्त हुई हैं, उनके अधिकार बढ़े हैं. लेकिन यह भी सच है कि जितना अधिकार महिलाआें काे मिलना चाहिए, चाहे वह राजनीतिक अधिकार हाे या सामाजिक अधिकार, वह नहीं मिल पाया है. जब तक महिलाएं सशक्त नहीं हाेंगी, उनके साथ न्याय नहीं हाेगा, निर्णय लेने के अधिकार में उन्हें शामिल नहीं किया जायेगा, न ताे समाज का भला हाेगा आैर न ही देश का.

अभी थाेड़ा काम हुअा है, इस विषय पर बहुत काम करने की जरूरत है. पहले राजनीतिक अधिकार, राजनीतिक हिस्सेदारी की बात करें. राजनीतिक दल बात भले ही बड़ी-बड़ी करते हाें, महिलाआें के सबसे बड़े हितैषी हाेने का दावा करते हाें, लेकिन आज तक महिलाआें काे 33 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक संसद से पारित नहीं हाे सका. देश में महिलाआें की अाबादी लगभग 50 फीसदी, लेकिन 33 फीसदी आरक्षण देने में आनाकानी.

अगर झारखंड की बात करें, ताे लाेकसभा के 14 सदस्य हैं, लेकिन वर्तमान में संसद में झारखंड की एक भी महिला सांसद नहीं. अगर यूपी आैर महाराष्ट् (दाेनाें जगह 13-13 महिला सांसद हैं) काे छाेड़ दें, ताे बाकी राज्याें में स्थिति आैर भी खराब है. भला हाे पंचायत चुनाव (झारखंड) का, जिसमें 50 फीसदी आरक्षण के कारण महिलाआें का बाेलबाला है. अगर आंकड़ाें काे देखें, ताे झारखंड में लगभग 2300 महिला मुखिया, 2820 महिला पंचायत समिति सदस्य, 28,632 महिला ग्राम पंचायत समिति की सदस्य आैर 281 महिलाएं जिला परिषद में हैं. यह शुभ संकेत है आैर उम्मीद जगाता है.

एक संकट है. संवैधानिक बाध्यता के कारण महिलाआें काे प्रतिनिधि ताे बना दिया गया है, लेकिन इनमें से अधिकांश आजादी से काम नहीं कर पाती. किसी के पति, किसी के परिवार के पुरुष सदस्य निर्णय लेते हैं. चलती उन्हीं की है. इन जनप्रतिनिधियाें काे खुद निर्णय लेने की आजादी देनी हाेगी, तभी असली बदलाव दिखेगा.

इतिहास ताे यही बताता है कि महिलाएं ज्यादा बेहतर तरीके से जनता की समस्याआें काे समझती हैं, उनका बेहतर हल निकालती हैं. जब भी माैका दिया गया, काम काे बखूबी निभाया. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लाेकसभा अध्यक्ष, रक्षा मंत्री आैर बड़े प्रशासनिक पद (आइएएस, आइपीएस, आइएफएस) जैसे पद से देश की सेवा करती रहीं, ताे दूसरी आेर बड़ी-बड़ी कंपनियाें, बैंकाें में शीर्ष पद पर रह कर ऐतिहासिक काम किया. काेई काम एेसा नहीं जाे वह नहीं कर सकती. अब ताे सबसे कठिन कामाें से एक यानी लड़ाकू विमान उड़ाने का काम भी कर लिया. अंतरिक्ष में भी गयीं. ये बात हुई, उन महिलाआें काे, जिनके पास अच्छी शिक्षा रही थी-है. बड़ी आबादी गांवाें में रहती हैं. उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलता. शिक्षा में पुरुषाें की तुलना में पीछे हैं.

झारखंड की बात करें, ताे महिला साक्षरता में सुधा के बावजूद पुरुष-महिला की साक्षरता दर में 21.42 फीसदी का फासला है. इस फासले काे कम करना हाेगा. झारखंड में जहां महिला साक्षरता दर 55.42 फीसदी है, वहीं महाराष्ट्र में 75.87 फीसदी आैर गुजरात में 70.73 फीसदी है. जाहिर है उन राज्याें में महिलाआें काे ज्यादा अवसर मिल रहे हैं. झारखंड में इस पर जाेर देना हाेगा, खास कर ग्रामीण इलाकाें में. सबसे महत्वपूर्ण है महिलाआें काे सम्मान आैर सुरक्षा देने का, ताकि वे खुल कर अपने मन के मुताबिक काम कर सकें.

झारखंड का लिंगानुपात 948 है, जाे राष्ट्रीय आैसत से बेहतर है. लिंगानुपात (सेक्स रेसियाे) में झारखंड दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे कई राज्याें से आगे है जाे गर्व की बात है. ऐसा इसलिए हुआ है, क्याेंकि झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है, जहां लड़का-लड़की में फर्क नहीं किया जाता. झारखंड अगर लिंगानुपात में बेहतर है, ताे इसका श्रेय यहां के ग्रामीण इलाकाें काे जाता है. सरकार आैर समाज का सामूहिक सार्थक प्रयास रहा, ताे इसमें काेई दाे राय नहीं कि यहां की महिलाएं इतिहास रचती रहेंगी.