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  • Nov 2 2018 1:56PM

जैविक खेती से बढ़ी उपज व आमदनी, पांडु खुश

जैविक खेती से बढ़ी उपज व आमदनी, पांडु खुश

रवींद्र यादव

प्रखंड: नोवामुंडी

जिला: पश्चिमी सिंहभूम

पश्चिमी सिंहभूम जिला अंतर्गत नोवामुंडी प्रखंड स्थित नोवामुंडी बस्ती के एक किसान हैं पांडु सुरेन. वह बहुफसली खेती में जैविक खाद का उपयोग कर हर साल आमदनी बढ़ा रहे हैं. 10 एकड़ जमीन पर सब्जी, गेहूं, गर्मा व बरसाती धान से सात लाख रुपये सालाना आमदनी कर रहे हैं. इसी तरह प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में नाडेफ, वर्मी कंपोस्ट बनाने व मनरेगा से 463 पीट का निर्माण कराया है, जिससे 463 किसानों की आय में भी बढ़ोतरी हो रही है. इसके साथ ही जैविक खेती कर रहे किसानों की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है. वहीं रोजगार सृजन होने से पलायन में कमी आयी है.

खेतों से ही बिक जाती हैं सब्जियां
नोवामुंडी में टाटा स्टील माइंस होने के कारण कर्मचारी खुद खेतों में आते हैं और ताजी सब्जियां व फसल साथ ले जाते हैं. इससे बाजार में जाकर बेचने की चिंता पांडु सुरेन को नहीं होती है. अब लोग जैविक सब्जियों व फसलों की उपयोगिता को अच्छी तरह जानने लगे हैं.

खेतों में दो साल तक बरकरार रहती है उर्वरा शक्ति
जैविक खाद के प्रयोग से खेतों में दो साल तक उर्वरा शक्ति बनी रहती है. एक बार जैविक खाद का खेतों में प्रयोग करने से दूसरे साल खाद देने की जरूरत नहीं पड़ती है. अगर लगातार दूसरे साल भी जैविक खाद खेतों में डाला जाता है, तो पौधों में अधिक वृद्धि होती है और पौधे जमीन पर गिर जाते हैं. इस कारण जैविक खाद का उपयोग एक-एक साल के अंतराल पर करने से पौधे व जमीन अच्छी रहती है.

जैविक खाद खुद बनाते हैं किसान पांडु सुरेन
पांडु सुरेन के खेत में ही जैविक खाद निर्माण के लिए संरचना बनी हुई है. पांडु जैविक खाद खुद बनाते हैं. वह बताते हैं कि केवल गोबर से जैविक खाद बनाते हैं. कृषि विज्ञान केंद्र से जैविक खाद बनाने के लिए केंचुआ मुफ्त में मिल जाता है. इस खाद से खेतों में लगातार दो साल तक ऊर्वरता बनी रहती है. खाद बनाने के लिए बने पीट में गोबर भरने के बाद केंचुआ डाला जाता है, जो तीन माह में उर्वरा शक्ति से भरपूर खाद तैयार हो जाती है. उन्होंने पेड़-पौधों की पत्तियों से बनी जैविक खाद की अपेक्षा गोबर से बनायी गयी जैविक खाद की गुणवत्ता को सर्वोत्तम करार दिया.

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सिंचाईं के लिए वरदान है सालोंभर बहनेवाला पहाड़ी झरना
नोवामुंडी बस्ती में पहाड़ी झरना है. यहां सालोंभर पानी बहता है. इस पानी का उपयोग किसान खेती-बारी में करते हैं. इससे गर्मा धान की भी अच्छी खासी उपज होती है. इसी तरह पहाड़ीनुमा आयरन ओर के पत्थरों को काट कर किसानों ने खेती योग्य भूमि में तब्दील किया है, जहां सालोंभर खेती-बारी होती है. इसके अलावा खेतों के बीच बने तालाब से मत्स्य व बत्तख पालन से भी अच्छी आमदनी हो जाती है. इसके अलावा पांडु सुरेन लाह की भी खेती करते हैं. करीब एक एकड़ भूमि पर उन्होंने लाह की खेती की है. सिमुलतला व कुसुम पौधों से सालाना करीब एक लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है.

मेहनत की बदौलत बने प्रगतिशील किसान
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची में पांडु सुरेन ने आठ दिवसीय प्रशिक्षण लिया. इसी प्रशिक्षण के आधार पर पांडु ने खेती-बारी को अपना रोजगार का साधन बना लिया. बहुफसली और जैविक खेती के सहारे आज पांडु की अपनी अलग पहचान है. अब पांडु सूकर पालन भी करने लगे हैं. खेती-बारी के प्रति पूरी तरह समर्पित पांडु की मेहनत को देखते हुए प्रखंड कृषि कार्यालय ने उन्हें प्रगतिशील किसान के रूप में सम्मानित भी किया.

जैविक खेती से फसल की उपज व गुणवत्ता में लगातार होता इजाफा : पांडु सुरेन
प्रगतिशील किसान पांडु सुरेने कहते हैं कि हाइब्रिड से उत्पादित सब्जियां व अन्य अनाज की तुलना में जैविक खाद से उत्पादन व गुणवत्ता में काफी बढ़ोतरी हो रही है. अब किसान जैविक व रासायनिक खाद के उपयोग का महत्व समझने लगे हैं. जैविक खेती से उपजे कृषि उत्पाद कई दिनों तक ताजा रहते हैं, जबकि रासायनिक खाद युक्त कृषि उत्पाद जल्द ही खराब हो जाते हैं. अब खेती-बारी के लिए किसानों का रासायनिक खाद पर निर्भरता घटी है. किसान अपने खेतों में ही जैविक खाद बना रहे हैं.